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फ्लैट समय पर न देने पर बिल्डर की गिरफ्तारी का आदेश सही

नई दिल्ली, श्याम सुमन First Published:19-10-2016 08:42:44 PMLast Updated:19-10-2016 09:33:07 PM
फ्लैट समय पर न देने पर बिल्डर की गिरफ्तारी का आदेश सही

खरीददार को समय पर फ्लैट या पैसे वापस न देने के मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने एक रियल स्टेट कंपनी के अधिकारियों की गिरफ्तारी के आदेश को सही बताया है। इस मामले में पंजाब राज्य उपभोक्ता आयोग ने 27 जुलाई 2016 में नोएडा की रियल स्टेट कंपनी के महाप्रबंधक और निदेशक के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 82 के तहत कार्रवाई कर उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया था। इसके बाद राज्य आयोग ने उन्हें गिरफ्तार करने के आदेश दिए ताकि उनके खिलाफ उपभोक्ता संरक्षण कानून, 1986 की धारा 27 के तहत आदेश की अनुपालना की कार्रवाई की जा सके।

राज्य अदालत के इस आदेश को कंपनी ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी। राष्ट्रीय आयोग ने उनकी अपील खारिज कर दी और आदेश में कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून के अनुसार उपभोक्ता अदालतों द्वारा पारित किए गए आदेशों का धारा 25 और 27 के अनुपालन करवाया जाता है। ऐसे मामले में प्रतिवादियों के लिए यह विकल्प नहीं होता कि आदेशों की अनुपालना किस तरीके से करेंगे। उनका यह कर्तव्य है कि वह राज्य आयोग के समक्ष पेश हों और वहां अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करें। प्रतिवादियों द्वारा राज्य आयोग के सामने कई अर्जियां दायर की गई थीं जिनमें सेटलमेंट कर देय रकम की किश्तें बांधने का आग्रह किया गया था लेकिन ये उपभोक्ता के राजी न होने के कारण अर्जियां खारिज कर दी गईं। बीसी गुप्ता की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आयोग ने कहा कि यदि वे कोई वैकल्पिक पेशकश करना चाहते थे तो उन्हें राज्य आयोग के आदेश को राष्ट्रीय आयोग में चुनौती देनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने ऐसा करना उचित नहीं समझा। इसलिए उनकी अपली खारिज की जाती है।

मामला
मोहाली के इंदरदीप सिंह सेखों ने नोएडा में बिल्डर के पास एक फ्लैट बुक करवाया था और इसके लिए 23, 92000 रुपये भी जमा कर दिए थे। लेकिन तय समय बीतने तथा तीन माह के ग्रेस अवधि समाप्त होने के बावजूद बिल्डर ने फ्लैट नहीं दिया। इसके खिलाफ उन्होंने 2014 में उपभोक्ता अदालत में अर्जी दी। उन्होंने कहा कि उन्हें मूलधन तथा उस पर 24 फीसदी ब्याज के साथ पैसा वापस दिलवाया जाए। राज्य आयोग ने 2015 में आदेश दिया कि बिल्डर मूलधन और उस पर 12 फीसदी ब्याज के साथ रकम लौटाए। साथ ही उन्हें उपभोक्ता को 25 हजार रुपये का मुकदमा खर्च भी देने को भी कहा गया। इसके बाद उपभोक्ता ने आयोग के समक्ष इस आदेश की अनुपालना अर्जी दायर की जिसे आयोग ने 27 जुलाई 2016 को निर्णित कर दिया और उक्त आदेश पारित किया।

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