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आडवाणी तो निपट गए, अब विपक्ष की बारी आएगी

निर्मल पाठक- राजनीतिक संपादक, हिंदुस्तान
आडवाणी तो निपट गए, अब विपक्ष की बारी आएगी

बाबरी विध्वंस मामले में सप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सर्वाधिक राजनीतिक नुक़सान यदि किसी को होगा तो वह पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और पूर्व मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी को। जिन अन्य के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश का मुकदमा चलना है उनमें से कुछ राजनीतिक तौर पर उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं और कुछ की अभी पारी बाक़ी है।

प्रधानमंत्री बनने की सभी सम्भावनाएँ समाप्त होने के बाद भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य आडवाणी को उम्मीद थी कि जुलाई 2017 में उनके भी अच्छे दिन आ सकते हैं। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है इसलिए पार्टी की ओर से उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने की उनकी इच्छा जायज़ भी थी। 

इस घटनाक्रम के बाद लगता है उनकी यह इच्छा भी अब शायद ही पूरी हो पाए। शायद कहना इसलिए ज़रूरी है कि राजनीति में जब तक अंतिम फ़ैसला न हो जाए कुछ भी पक्का नहीं होता। कुछ लोगों ने तर्क दिया है कि भाजपा को इस फ़ैसले के बहाने 2019 तक अपने हिंदुत्व के अजेंडा को गरम रखने में मदद मिलेगी। सप्रीम कोर्ट ने दो साल के भीतर मामला निपटाने के निर्देश दिए हैं। मतलब अप्रेल 2019 से पहले इस पर फ़ैसला आ जाएगा। मई 2019 में लोकसभा के चुनाव होंगे और भाजपा इसे चुनाव में भुनाएगी। यह दूर की कौड़ी है, मगर इसे ख़ारिज नहीं कर सकते। 

इस नज़रिए से देखें तो आडवाणी को राष्ट्रपति बनाकर भाजपा और ज़्यादा फ़ायदा उठा सकती है। भाजपा निश्चित ही फ़ायदा उठाने की कोशिश करेगी लेकिन यह 2019 में तब के हालात पर ज़्यादा निर्भर करेगा। एक बार सोच कर देखिए कि उमा भारती के उलट भाजपा के वर्तमान नेतृत्व से ख़फ़ा आडवाणी चुनाव के ठीक पहले या कोर्ट में यदि यह कहें कि उन्हें अपने किए पर वाक़ई पश्चात्ताप है तो उनके इस बयान से भाजपा को फ़ायदा होगा या नुक़सान? आडवाणी ने समय समय पर साबित किया है कि वह इस तरह के हैरत में डालने वाले फ़ैसले करते हैं। 

अभी सच्चाई यह है कि आडवाणी और जोशी दोनों फँस गए हैं। जोशी उप राष्ट्रपति पद के दावेदार हो सकते थे। अब उसकी भी सम्भावना नहीं है। यह कहना ग़लत होगा कि आडवाणी और जोशी को शीर्ष पदों पर उनकी दावेदारी से बाहर करने के लिए उन्हें फँसाया गया। तर्क है कि सीबीआइ चाहती तो प्रकरण को कमज़ोर कर सकती थी। सच्चाई यह है कि संघ व भाजपा में दोनों की दावेदारी को कभी भी गंभीरता से लिया ही नहीं गया। ऐसे में उन्हें दावेदारी से बाहर करने की बात हज़म नहीं होती। इसी से यह सवाल भी उठता है कि मोदी सरकार क्या दिखाना चाह रही है या उसकी मंशा क्या है। इस पर अभी से कुछ कहना  हालाँकि जल्दबाज़ी होगी पर कुछ संभावनाएँ हैं। 

इस फ़ैसले से एक संदेश यह भी गया है कि सरकार किसी के साथ भेदभाव नहीं कर रही भले उसके अपने लोग क्यों न फँस रहे हों। सप्रीम कोर्ट ने समयबद्ध सुनवाई कर फ़ैसला देने की परम्परा शुरू कर दी है। 84 के दंगों से लेकर अयोध्या में मंदिर प्रकरण और इससे महत्वपूर्ण नेशनल हेरल्ड का मामला कोर्ट में  है। विपक्ष को आडवाणी या जोशी के बजाय इसकी चिंता ज़्यादा होनी चाहिए। 

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  • Web Title:advani is over now its turn to opposition parties