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FILM REVIEW: 'एयरलिफ्ट' देखने से पहले पढ़ें इसका रिव्यू

विशाल ठाकुर First Published:22-01-2016 12:23:21 PMLast Updated:22-01-2016 10:08:25 PM
FILM REVIEW: 'एयरलिफ्ट' देखने से पहले पढ़ें इसका रिव्यू

एक्शन कुमार, खिलाड़ी कुमार आदि नामों से प्रसिद्ध अभिनेता अक्षय कुमार की किसी फिल्म में एक्शन न हो तो शायद उनके प्रशंसकों को निराशा हो सकती है। लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं कि 'एयरलिफ्ट' अक्षय कुमार के करियर में एक ऐसी फिल्म बनने जा रही है, जिसमें भले ही उनके चिर-परिचित अंदाज का एक्शन न हो, लेकिन रोमांच भरपूर है।

एक सच्ची घटना से प्रेरित इस फिल्म में अक्षय का एक अलग ही रूप देखने को मिलेगा, जो हल्का-सा उनकी पिछली कुछ फिल्मों से मेल खाता दिखता है। इनमें 'स्पेशल 26', 'हॉलीडे' और पिछले साल ही आयी 'बेबी' जैसी फिल्मों के नाम शामिल किये जा सकते हैं। अब तक आप जान चुके होंगे कि यहां अक्की बाबा के कौन से रूप की बात की जा रही है। इस फिल्म में अक्षय द्वारा निभाए गये रंजीत कटियाल के रोल में कॉमेडी या हंसोड़पंती की कोई गुंजाइश नहीं है और ये पूरी फिल्म एक नियंत्रण के साथ आगे बढ़ती है और अंत तक बांधे रखती है।

फिल्म की कहानी है 1990 में कुवैत में रह रहे एक भारतीय बिजनेसमैन रंजीत कटियाल (अक्षय कुमार) की है, जिसकी आंखों के सामने उसके ड्राइवर नायर की हत्या कर दी जाती है। वो कुछ नहीं कर पाता। इराक द्वारा कुवैत पर हमले के बाद वहां रह रहे भारतियों की जान खतरे में पड़ गयी है। कुवैत स्थित भारतीय उच्चायोग भी उनकी कुछ मदद नहीं कर पा रहा है और भारत में संपर्क कर मदद की गुहार की कोशिशें भी नाकाम हो गयी हैं।

ऐसे में रंजीत को कुवैत छोड़ कर जाने का एक मौका मिलता है। वो अपनी पत्नी अमृता (निमरत कौर) और छह साल की बेटी सिमु को लेकर कुवैत छोड़ने के तैयार भी हो जाता है, लेकिन ऐन मौके पर उस मन बदल जाता है। उसे अहसास होता है कि वह कुवैत में फंसे डेढ़ लाख से ज्यादा भारतियों को यूं ही अकेला छोड़ कर नहीं जा सकता। रंजीत किसी भी तरह से इन सभी भारतियों को वहां से निकालना चाहता है। इसके लिए वह इराक के एक मेजर खलाफ बिन जाएद (इनामुकहक) से बात भी करता है, लेकिन वो इतनी बड़ी रकम की मांग करता है, जिसके जुगाड़ ऐसे हालात में करना नामुमकिन है।

रंजीत के अलावा बाकी लोगों में से कुछेक के पास ही इतना पैसा है। इधर, भारत में उसका संपर्क एक अधिकारी संजीव कोहली (कुमुद मिश्रा) से होता है, जो उसकी मदद करना तो चाहता है, लेकिन मंत्रियों और बाबुओं के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के चलते वो भी बेबस है। कहीं से भी मदद न मिलते देख वह एक अंतिम कोशिश के लिए बगदाद जाता है ताकि वह वहां उच्चाधिकारियों से बात कर कुवैत से निकलने का कुछ इंतजाम कर सके। बातचीत के बाद उसे एक आशा की किरण दिखती है। उसे भारत से रसद लेकर कुवैत आ रहा एक पानी के जहाज टीपू सुल्तान में भारतियों को ले जाने की अनुमति मिल जाती है। लेकिन ये खुशी भी ज्यादा देर तक नहीं टिकती। कुवैत संकट के मद्देनजर जब संयुक्त राष्ट्र का हस्तक्षेप होता है तो टीपू सुल्तान को वापस जाने के लिए कह दिया जाता है।

भारत लौटने के सारे रास्ते जब बंद हो जाते हैं तभी एक रात संजीव कोहली के प्रयास रंग लाते हैं। वो रंजीत को फोन पर कहता है कि वह सभी भारतियों को लेकर ओमान आ जाए, जहां से एयर इंडिया के विमान द्वारा उन्हें एयरलिफ्ट करा लिया जाएगा। ये जानते बूझते कि या सारा काम नामुमकिन है, रंजीत तमाम लोगों की मदद से एक बड़े काफिले के रूप में ओमान की ओर कूच कर जाता है।

एक अभिनेता के रूप में अक्षय कुमार इन दिनों दो तरह की फिल्मों में काम कर रहे हैं। एक वो जो आम जनता के लिए सस्ते और फार्मूलों से लबरेज मनोरंजन परोसती हैं और दूसरी वो जो किसी खास विषय-मुद्दे या असल कहानी से प्रेरित होती हैं। ऐसी फिल्मों में उनका रूटीन से अलग मूड दिखाई देता है। 'एयरलिफ्ट' अक्षय के उसी दूसरे मूड की फिल्म है, जिसे निर्देशक राजा कृष्ण मेनन ने काफी अच्छे ढंग से बनाया है।

यह फिल्म अपने विषय की वजह से ध्यानाकर्षण करती है। किसे पता था कि 1990 में कुवैत-इराक संकट के दौरान एक भारतीय के साहस से 1,70,000 भारतियों की जान इस तरह से बची थी। ऐसी कहानी जब परदे पर आती है तो रोमांच होना लाजिमी है।

हालांकि फिल्म का कथानक और स्टाइल 1993 में आयी स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म 'शिंडलर्स लिस्ट' और 2012 में आयी 'आरगो' से काफी मिलती-जुलता है, लेकिन इसे देरी रंग देने में राजा ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। हालांकि इंटरवल से पहले और बाद में कुछेक पलों के लिए ऐसा भी लगता है कि फिल्म आगे नहीं बढ़ रही है। लेकिन 2 घंटे की इस फिल्म में ये कमीं ज्यादा नहीं खलती।

यह फिल्म केवल अक्षय की ही नहीं है। इसमें निमरत कौर ने भी अच्छा काम किया है। हालांकि उनके लिए केवल एक मौका आया है, जब उन्होंने अपना जौहर दिखाया है। मेजर खलाफ बिन जाएद के रोल में अभिनेता इनामुकहक ने आस जगाई है। ये किरदार फनी है, लेकिन हमेशा एक डर सा पैदा किये रहता है।

अक्षय के दोस्त इब्राहिम के रोल में पूरब कोहली और कूरियन के रोल में निनाद कामत ने बेहद सधा हुआ अभिनय किया है। फिल्म में एक किरदार है जॉर्ज का, जिसे प्रकाश बेलावड़ी ने अदा किया है। ये किरदार झुंझलाहट पैदा करता है। ऐसा लगता है कि ऐसे किरदार हर दौर में होते होंगे। शायद आपका पाला भी ऐसे किरदारों से पड़ा हो, जो संकट के समय भी रूटीन जिंदगी और अपने अक्खड़ बर्ताव का दाम न नहीं छोड़ते।

फिल्म में एक कमीं दिखती है और वो इसका कथानक, जिसे कई जगह उलझा दिया गया है। बेशक, यह एक रोमांच से भरपूर कहानी है, लेकिन इसमें मानवीय पहलू और संकट के समय में अक्सर दिखने वाले भावनात्मक दर्शन को पूरी तरह से नहीं निभाया गया है। बावजूद इसके कि करीब एक महीने से कोई रोमांच से भरपूर फिल्म नहीं आयी है, जिसकी कमीं इस हफ्ते 'एयरलिप्ट' ने पूरी कर दी है।
सितारे : अक्षय कुमार, निमरत कौर, पूरब कोहली, प्रकाश बेलावड़ी, निनाद कामत, कुमुद मिश्रा
निर्देशक : राजा कृष्ण मेनन
निर्माता : अरुणा भाटिया, भूषण कुमार, निखिल आडवाणी
संगीत : अमाल मलिक, अंकित तिवारी
गीत : कुमार
लेखक : सुरेश नायर, राहुल नांगिया, रितेश शाह, राजा कृष्ण मेनन
रेटिंग 3.5 स्टार

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