class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हाशिमपुरा कांड के दस्तावेज किसने जलाए, बैठी जांच

हाशिमपुरा कांड के दस्तावेज नष्ट करने के प्रकरण में मेरठ पुलिस के खिलाफ जांच शुरू की गई है। प्रधान लिपिक एसएसपी कार्यालय और अन्य कर्मचारियों से स्पष्टकरण मांगा गया है। साथ ही उस समय का पूरा रिकार्ड भी जुटाया जा रहा है। किन नियमों के तहत रिकार्ड नष्ट किया गया और किसका आदेश था, ये सारा ब्यौरा जुटाया जा रहा है। कोर्ट ने इस प्रकरण में जवाब तलब किया था और पूछा गया था कि दस्तावेज क्यों नष्ट किए गए। इस मामले के कुछ दस्तावेज सीबीसीआईडी के पास भी मौजूद हैं, जिसके लिए पत्राचार शुरू कर दिया गया है और जानकारी मांगी गई है।

मेरठ के हाशिमपुरा कांड को लेकर मेरठ पुलिस की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही हैं। इस प्रकरण में हाईकोर्ट ने हाशिमपुरा कांड से जुड़े दस्तावेज के बारे में मेरठ पुलिस से जानकारी मांगी थी। मेरठ के पूर्व एसएसपी दिनेश चंद दूबे की ओर से जवाब दाखिल किया गया था कि दस्तावेज नष्ट कर दिए गए। तर्क दिया गया कि इस प्रकरण को 15 साल से ऊपर का समय हो चुका था, इसलिए दस्तावेज नष्ट किए गए। कोर्ट ने इसी बात को लेकर आपत्ति जताई। कोर्ट ने पूछा था कि किसके आदेश पर केस के दस्तावेज नष्ट किए गए। आदेश की प्रति और अन्य सूचना भी मांगी गई। इसके बाद मेरठ पुलिस ने पुराना रिकार्ड खंगालने शुरू किए। अब इसी प्रकरण में सीओ कार्यालय वंदना मिश्रा ने आला अधिकारियों के निर्देश पर जांच शुरू कर दी है। पुलिस कार्यालय के प्रधान लिपिक और दस्तावेज सेक्शन से जुड़े अन्य कर्मचारियों से लिखित में जवाब मांगा गया है। पुराने रिकार्ड के सभी दस्तावेज भी मांगे गए हैं।

सीबीसीआईडी के पास हैं दस्तावेज

कुछ कर्मचारियों का कहना है कि चूंकि केस की जांच शुरू से ही सीबीसीआईडी कर रही थी। ऐसे में पूर्व में ही ज्यादातर दस्तावेज सीबीसीआईडी ले गई थी। जिले में जो भी रिकार्ड था, उसे पांच साल समय पूरा होने के कारण नष्ट किया गया। इस बात की जानकारी पर सीबीसीआईडी से भी पत्राचार शुरू किया गया है। सूचना मांगी गई है कि केस से जुड़े कौन-कौन से दस्तावेज सीबीसीआईडी के पास हैं।

हाशिमपुरा कांड एक नजर

मई 1987 में मेरठ में सांप्रदायिक दंगा हुआ था और कर्फ्यू लगा था। आरोप है कि हापुड़ रोड पर गुलमर्ग सिनेमा के सामने हाशिमपुरा मोहल्ले से 22 मई 1987 को 43 लोगों को पीएसी जवान उठाकर ले गए और गोली मारकर मुरादनगर गंगनहर में फेंक दिया था। जुल्फिकार, बाबूदीन, मुजीबुर्रहमान, मोहम्मद उस्मान और नईम गोली लगने के बावजूद जिंदा बच गए थे। बाबूदीन ने ही गाजियाबाद के लिंक रोड थाने पहुंचकर रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इस मामले में 161 लोग गवाह बनाए गए थे। वर्ष 1996 में गाजियाबाद के चीफ ज्यूडिशयल मजिस्ट्रेट के सामने इस मामले में अभियोग पत्र दाखिल किया गया। पीड़ितों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2002 केस दिल्ली हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया था। पीएसी के 19 जवानों और अधिकारियों पर वर्ष 2006 में आरोप तय किए गए। हालांकि 20 मार्च 2015 को कोर्ट ने सभी आरोपियों को साक्ष्य अभाव में बरी कर दिया। पीड़ित और उत्तरप्रदेश सरकार इस आदेश के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट गए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Hashimpura case, who burned documents, sitting investigation
From around the web