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नई सरकार के पहले सत्र में नहीं दिखा विधायकों के प्रशिक्षण का असर

- योगी को छोड़ कई मौकों पर सरकार पर भारी नजर आया विपक्ष

- संसदीय कार्य मंत्री सहित कई मंत्री अनुभवी और वरिष्ठ होने के बावजूद खास प्रभाव नहीं छोड़ सके

- दो जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बाद पहली बार नजदीक दिखे सपा-बसपा के विधायक

- विधानसभा चुनाव में गठबंधन के बावजूद सपा और कांग्रेस सदस्यों की बीच नजर आईं दूरियां

गोलेश स्वामी - राज्य मुख्यालय

नई सरकार के पहले विशेष सत्र में नए विधायकों के प्रशिक्षण का सदन के अंदर कोई खास असर नहीं दिखा। विपक्षी विधायकों के मामले में माना जा सकता है कि उन्हें हंगामा रास आएगा, लेकिन सत्ता पक्ष के तमाम विधायकों को यह तक नहीं मालूम था कि जब उनके मंत्री या वरिष्ठ मंत्री खड़े हैं या बोल रहे हैं, उन्हें खड़े नहीं होना चाहिए या बीच में नहीं बोलना चाहिए। कई मंत्री भी सदन में टीका-टिप्पणी करने में पीछे नहीं दिखे।

विपक्ष की छोड़िए, विपक्ष की तो ज्यादातर चाहत होती है कि सरकार घिरे, लेकिन सत्ता पक्ष की यह कोशिश होनी चाहिए कि विपक्ष को उकसावे का मौका न दिया जाए। कई बार तो सत्ता पक्ष के ही सदस्यों ने सदन में हास्यास्पद स्थिति पैदा कर दी जिसे विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने अपनी कुशलता से संभाला।

नए विधायकों का जब दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ तो उसमें विषय विशेषज्ञों के रूप में बड़े-बड़े लोगों ने उन्हें नसीहतें दीं। उस समय जिस तरह धीर-गंभीर होकर सत्ता और विपक्ष के विधायकों ने इसमें भाग लिया था तो लगा था कि इस बार विधानसभा के अंदर नजारा बदला हुआ होगा, राज्यपाल का अभिभाषण इस बार शालीनता से सुना जाएगा, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात रहे।

पहले दिन से ही वही हंगामा, नारेबाजी, नारे लिखी तख्तियां, कागज के गोले बनाकर राज्यपाल पर निशाना बनाकर फेंकना। यही नहीं, इस बार को विरोध में विपक्ष एक हाथ आगे निकल गए। यहां तक कि एक विधायक ने सीटी बजाकर सबको हैरान कर दिया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा राज्यपाल राम नाईक के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर दिया गया जवाब जरूर प्रभावी रहा लेकिन उनको छोड़ दिया जाए तो सरकार के तमाम मंत्री कोई विशेष छाप नहीं छोड़ सके। कई मौकों पर विपक्ष हावी होता दिखा। मुख्यमंत्री श्री योगी और लंबे अरसे तक नेता विपक्ष रहे कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य और वरिष्ठ मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने भी कई बार स्थिति को संभाला। नेता विपक्ष राम गोविंद चौधरी ने अपना अनुभव प्रभावी रूप से दर्शाया।

सुकून की बात यह है कि 17वीं विधानसभा में भी कई नए विधायकों ने अच्छे वक्ता होने का सुबूत दिया। साथ ही इस बार पक्ष विपक्ष के बीच बहस तो हुई, लेकिन कटुता नहीं दिखी। एक खास बात और नजर आई, जिसे यूपी की राजनीति की दशा और दिशा बदल सकती है, दो जून 1995 के बाद से सपा व बसपा के बीच जो दूरी सदन के अंदर और बाहर दिखती थी, इस बार नहीं नजर आई। यहां तक कि नेता विपक्ष व नेता बसपा ने एक- दूसरे की बातों का सदन के अंदर समर्थन तक किया। हां, सपा और कांग्रेस के बीच विधानसभा चुनाव में रहे गठबंधन के बावजूद नोकझोंक हुई।

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