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लविवि में शंकराचार्य

हमारे शिक्षणतंत्र में ढेरों खामियां: शंकराचार्य

-लखनऊ विवि में पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य का छात्रों से सीधा संवाद

-शंकराचार्य ने दिए छात्रों के सवालों के जवाब

लखनऊ। विदेशियों की जिस कूटनीति को हम वरदान समझ रहे हैं, दरअसल वह अभिशाप है। मगर वह यहां पनप रहा है क्योंकि हमारे पास न अपनी शिक्षानीति है, न रक्षानीति, न अर्थनीति। सबकुछ विदेशों से उधार लिया हुआ। जबकि हमारे पास सारे संसाधन हैं और दुनिया को विकास का रास्ता हमने ही दिखाया।

ये बातें पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने लखनऊ विवि में बुधवार को छात्रों से सीधा संवाद करते हुए कहीं। उन्होंने बताया कि पुरी पीठ के 143वें शंकराचार्य ने 'वैदिक मैथमैटिक्स' किताब लिखी थी। उनके अपने 10 ग्रंथ हैं जिनमें '0' को भावांक सिद्ध किया गया है। पुरी पीठाधीश्वर के एक अंग्रेजी शिष्य ने ही कम्प्यूटर का अविष्कार किया और बाइनरी नंबर सिस्टम की खोज का श्रेय वैदिक मैथमैटिक्स को ही जाता है। आजकल के राजनेता वैदिक ज्ञान-विज्ञान को साम्प्रदायिक बताते हैं जबकि अमेरिका, इंग्लैंड, कोरिया तक से गणितज्ञ इसे सीखने यहां आते हैं। यही कारण है कि हमारी मेधा विदेशों में जा रही है।

शांत की छात्रों की जिज्ञासा: लखनऊ मैनेजमेंट एसोसिएशन, सेवा समिति व लविवि के संयोजन में मालवीय सभागार में आयोजित संवाद कार्यक्रम में लविवि के कुलपति प्रो. एसबी निमसे ने शंकराचार्य का स्वागत किया और उसके बाद बिना किसी प्रवचन या भूमिका से संवाद का सत्र शुरू हो गया। छात्रों ने शंकराचार्य से सवाल पूछे, जिनके जवाब में उन्होंने न सिर्फ छात्र की जिज्ञासा शांत की बल्कि धर्म, आचरण, सदाचार, भक्ति, कर्त्तव्य आदि के मायने भी समझाए।

सवाल-जवाब:

अद्वैत-द्वैत में क्या सम्बंध है?

द्वैत की अभिव्यक्ति जिससे होती है वह अद्वैत है। गणित के सिद्धांत में समझें तो जिस तरह 1 के बिना 2 का और 0 के बिना 1 का महत्व नहीं है, उसी तरह द्वैत जगत का अद्वैत परमात्मा के बिना कोई महत्व नहीं।

विश्वविद्यालय में धर्म की शिक्षा देने के लिए संस्थान होने चाहिए या नहीं?

आजकल यह कहा जाता है कि जो संकीर्ण है, वह धार्मिक है। दरअसल धर्म को लेकर कई भ्रांतियां हैं। संस्थान की बात करें तो यह कुलपति के अधिकार क्षेत्र में है कि विवि में इसकी जरूरत है या नहीं और वही तय करें। रही बात धर्म की तो किसी भी व्यक्ति की जो उपयोगिता है वही उसका धर्म है। उदाहरण के लिए शेर की बात करें तो पराक्रमी होता है लेकिन वह भी आग से डरता है, सांप लाख जहरीला हो लेकिन अग्नि से डरता है मगर जब वही आग राख हो जाए तो चींटी भी उससे नहीं डरती अर्थात आपका धर्म वही है जो आपकी उपयोगिता तय करे।

वर्ण व्यवस्था की क्या उपयोगिता है? ब्राह्मण वर्ण है या गुण?

वर्ण व्यवस्था पर आज के दौर में बहुत बहस हो रही है। ये ठीक है कि आप पारम्परिक वर्ण व्यवस्था को न मानें लेकिन यह भी सत्य है कि संसार में व्यवस्था बनाए रखने के लिए वैकल्पिक वर्ण व्यवस्था माननी पड़ेगी क्योंकि हर काम के लिए किसी न किसी को तो आगे आना होगा। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र के काम निर्धारित हैं फिर वो गुण से हों या वर्ण से। हर व्यक्ति की जीविका उसके जन्म से ही आरक्षित है और यही सनातन धर्म है।

छात्रों ने क्या समझा.....(छात्रों के फोटो हैं-)

'हमारा कर्म ही हमारा धर्म है और जब तक हमारे अंदर कुछ उपयोगी गुण बाकी हैं, तब तक हम धर्म का पालन कर रहे हैं।'

प्रियंका गौतम, बीएससी

'बतौर छात्र हमारा उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, अपने गुणों से धर्म और राष्ट्र विकास में सहयोग देना है।'

शिवानी शुक्ला, बीएससी

'विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में धर्म की शिक्षा देने वाले संस्थानों की जरूरत है, क्योंकि आजकल छात्रों को इसके बारे में कहीं नहीं बताया जाता।'

अम्बरीष, असिस्टेंट प्रोफेसर, एमबीए

'धर्म की शिक्षा जरूर दी जाने चाहिए क्योंकि वास्तव में धर्म ही युवाओं को सही रास्ता दिखाता है लेकिन धर्म के नाम पर जातिवाद न हो'

दीपक कुमार, एमबीए

कोट

'शंकराचार्य महाराज को यहां लाने के पीछे समिति का उद्देश्य हिन्दू समाज में धर्म के प्रति भक्तिभाव जागृत करना और युवाओं को आध्यात्म दर्शन से जोड़ना है।'

जर्नादन अग्रवाल, सेवा समिति

'समिति की कोशिश है कि युवा राष्ट्रप्रेम की भावना, संस्कृति आदि को समझें। साथ ही एक सामाजिक चेतना का प्रसार भी हो।'

भारती गुप्ता, सेवा समिति

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  • Web Title:LU shankaracharya
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