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जीवन में स्थाई खुशी व शांति के लिए आध्यात्मिक बनो : पूनम बहन

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लखनऊ। हिन्दुस्तान संवाद

यदि जीवन में स्थाई खुशी एवं शान्ति चाहते है तो व्यक्ति को आध्यात्मिक बनना ही होगा। पदार्थो में सुख है, आनन्द नहीं। आनन्द भीतर की चीज है इसे भीतर खोजो और वह आध्यात्म से ही आ सकता है, बाहर से नहीं। आपको आध्यात्मिक होना ही पडेगा। यह बात तनाव मुक्ति शिविर में शनिवार को ब्रह्मकुमारी पूनम बहन ने बताई। ब्रह्मकुमारीज, जानकीपुरम की ओर से आकांक्षा परिसर में चल रहे अलविदा तनाव शिविर के आठवें दिन विश्व सद्भावना दिवस के रूप में मनाया गया। इस मौके पर विभिन्न धर्मों के लोग उपस्थित रहे।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए पूनम बहन ने कहा कि जो आध्यात्मिक होते है उनमे रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, उनका मन शान्त व शक्तिशाली होता है। जो आध्यात्मिक होता है उसको सब चीज अपने अनुकूल दिखती है। वह सकारात्मक होता है और जो आध्यात्मिक नही है वो हर चीज में शिकायत करता है। आध्यात्मिकता में शार्ट-कट नहीं होता। पूनम बहन ने कहा कि मनुष्य ने आज हर चीज का बहुत विस्तार कर लिया है। चाहे वह धन सम्पत्ति का हो, पदार्थो का, कारोबार का, मित्र संबंधियों का या अपनी इच्छाओं का। उसने इन सब बातों का इतना विस्तार कर लिया है कि वह स्वयं तो उसमे उलझ ही गया है लेकिन अपने बाद वालों को भी उसमें उलझा दिया है। कब्र में पैर है फिर भी धन का लोभ नहीं जाता। जबकि उसे मालूम है कि यह सब हमारे साथ नहीं जाता है। साथ जाता है हमारा पुण्य कर्म, दुआओ का खाता। कितनी विडम्बना है कि जो साथ नहीं जायेगा उसके लिए तो हम सम्पूर्ण जीवन लगा देते हैं और जो चीज साथ जानी है उसके लिए कहते है कि हमारे पास समय नहीं।

यदि आप सचमुच बुद्धिमान है तो चिन्तन कीजिए कि आखिर हमारा समय कहां जा रहा है? जीवन में जहां हम सब बातों के लिए समय देते हैं वहां अपनी लाइफ का कुछ समय आध्यात्मिक को भी दे। क्योंकि इसी से ही जीवन को सही दिशा व दशा मिलती है, इससे हम वर्तमान तो सुख से जीते हैं लेकिन भविष्य भी सुरक्षित होता है। क्षमा-भाव का महत्व बताते हुए पूनम बहन ने कहा कि दूसरे के द्वारा की गई गलती की गांठ हम वर्षो तक अपने मन में बाधे रहते है जिसके कारण कई सुनहरे अवसरों पर अपने को अकेला पाते है। जबकि घटना बदल जाती है, व्यक्ति बदल जाते है, समय बदल जाता है, सबकुछ बदल जाता है लेकिन हमारे मन मे जो नफरत और बदले की गांठ है वो हम नहीं बदल पाते। बदला लेना तो इस संसार में हर कोई जानता है, दूसरो को शिक्षा देना भी हर कोई जानता है लेकिन महान वह है जो दूसरों की गलतियो को क्षमा कर दें। क्षमा करना ही सच्ची शिक्षा देना है। क्षमा कीजिए और दूसरों को अपना बना लीजिए। एक बार क्षमा करके देखें तो सही सारा संसार अपना नजर आयेगा। वर्षों पुराने बिगड़े संबंध सुधर जाएंगे।

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साधकों ने अनुभव सुनाए

तनाव शिविर के आठवें दिन साधको ने शिविर से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। साधकों ने कहा शिविर मे आने के बाद मेरी सोच बदल गयी, अब मै जीना चाहता हूँ, मुझे जीवन मे पहली बार ऐसा लग रहा है कि मेरे जन्म का भी कोई उद्देश्य है। किसी ने कहा मुझे वर्षो से नीद नही आती थी और मेरी ऐसी मानसिकता बन गयी थी कि गोली खाने पर ही नींद आयेगी लेकिन शिविर मे आने के दो दिन पश्चात् ही मै जीवन में सुख की नीद सोया।

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