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घरवालों को पता ही नहीं ‘हीरा’ है उनकी बेटी शीला
First Published:17-05-12 01:26 AM
बेलीपार (गोरखपुर), दीपक त्रिपाठी। अपनी कमी को ताकत बनाकर देश-विदेश में नाम कमाने वाली बेलीपार के मेहरौली गांव की शीला को बाहर शायद किसी परिचय की जरूरत न हो लेकिन उसके परिवारीजन उसकी उपलब्धि से बिल्कुल अनजान हैं। यहां तक की उसके पिता भी उसकी अनूठे उपलब्धि से नावाकिफ हैं।
उसके घरवालों को यह पता तक नहीं कि सिंगापुर में चित्रकारी प्रतियोगिता में शामिल हुए 12 भारतीयों में एक उनकी बेटी भी थी। सिंगापुर में माउथ एंड फुट पेंटिंग एसोसिएशन की तरफ से एक अंतरराष्ट्रीय पेंटिंग प्रतियोगिता आयोजित थी जिसमें शीला ने भी अपने हुनर का लोह मनवाया।
इस प्रतियोगिता में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भारत, मलेशिया, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया समेत अनेक देशों से प्रतियोगियों ने भाग लिया था। इसकी खबर अखबारों में छपने के बाद शीला के घर बधाई देने वालों का तांता लग गया। लेकिन यहां चिराग तले अंधेरा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।
इस बारे में पूछने से उसके परिवारीजनों की पहली प्रतिक्रिया आई कि क्या हमें कुछ पैसा मिलेगा। क्योंकि उन्हें लग रहा है कि उनकी बेटी ने कुछ पैसा कमा लिया है। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार आ जाएगा। शीला के पिता प्रह्लाद पासवान कोल इण्डिया में काम करते थे और अब रिटायर हो चुके हैं।
1964 में ट्रेन की चपेट में आकर शीला ने अपनी मां, भाई व अपने दोनों हाथ गंवा दिए थे। अभावों से जूझते हुए वह कक्षा पांच तक गांव में रहकर पढ़ी और उसके बाद लखनऊ के राजकीय महिला संरक्षण गृह ने उसे गोद ले लिया और यहीं से उसका नया सफर शुरू हो गया।
उसने अपना रोज का काम बाएं पैर से करने का अभ्यास किया। पांव को इतना कुशल बनाया कि उंगलियों में कलम पकड़कर लिखने लगी।शीला को मिले हैं यह पुरस्कार- मेनका गांधी द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार - यूपी सरकार के हस्तशिल्प विभाग से पुरस्कार - राज्य संस्कृति विभाग से मिल चुकी है फेलोशिप- मानव संसाधन विकास मंत्रालय की फेलोशिप- 12 साल में देश भर में एकल व सामूहिक प्रदर्शनी लगा चुकी है शीला
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