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वनों में भड़की आग हुई बेकाबू, बारिश पर टिकी उम्मीद
उत्तरकाशी, एजेंसी
First Published:14-06-12 12:22 PM
उत्तराखंड के जंगलों में धधक रही आग की लपटों ने हजारों हेक्टेयर वन भूमि और पशु पक्षियों को तबाह करने के साथ ही चुभन पैदा करने वाली शीतल हवा की सनसनाहट से गुंजायमान रहने वाली ठंडी वादियों में पसीना बहाने वाली गरमी ला दी है और पहाड के सुहाने मौसम तथा प्राकृति सौंदर्य को नष्ट कर दिया है।
पहाड़ का समूचा जंगल आग की आगोश में है। हर तरफ धुआं फैला है और धधक चुके वन राख का पहाड़ दिख रहे हैं। करीब 1500 मीटर की ऊंचाई पर बसे नई टिरही जैसे कई शहरों में दिन रात पंखे चल रहे हैं और उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर आदि शहरी क्षेत्रों का तापमान 44 डिग्री सेल्सियस से अधिक चल रहा है।
उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग का ब्योरा एकत्रित करने के लिए वन विभाग के नोडल अधिकारी के एस सावंत का कहना है कि राज्य में मई में आग की 980 घटनाएं हुई हैं जिसके कारण 2250 हेक्टेयर वन भूमि आग की चपेट में आई है। पिछले एक पखवाडे में आग ने और विकराल रूप धारण किया है लेकिन इससे जंगलों को कितना नुकसान हुआ है इसका आंकडा उनके पास नहीं है।
उन्होंने कहा कि आग के कारण वन उपज की क्षति और वन्य जीवों को हुए नुकसान का आकलन आग बुझने के बाद ही किया जा सकेगा। विभाग के पास आग पर काबू पाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए अधिकारी बारिश का इंतजार कर रहे हैं ताकि आग बुझ सके और नुकसान का जायजा लिया जा सके।
उत्तराखंड के मुख्य वन संरक्षक आर बी एस रावत का कहना है कि विभाग के पास आग पर काबू पाने के लिए बजट नहीं है इसलिए संसाधन नहीं जुटाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद विभाग ने 38 मुख्य नियंत्रण कक्ष तथा आग पर काबू पाने के 1200 स्टेशन बनाए हैं। प्रत्एक स्टेशन पर आठ से दस कर्मचारी तैनात हैं और अपने स्टेशन पर आग बुझाने के लिए प्रयास करते हैं।
विभाग के एक दूसरे बडे अधिकारी श्रीकांत चंदोला का कहना है कि अविभाजित उत्तर प्रदेश में वर्ष 1995 में पहाड के जंगलों में भीषण आग लगी थी। उस दौरान विभाग को आग पर काबू पाने के लिए चार करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई थी लेकिन इस राशि का इस्तेमाल आग बुझाने के उपकरण खरीदने अथवा आग पर काबू पाने के लिए उपाय करने के बजाय गाडियां खरीदने और वायरलेस सेट खरीदने के लिए किया गया।
आग लगने के कारण पर पूछे गए सवाल के जवाब में सावंत ने कहा कि स्थानीय लोग अक्सर अच्छे चारे की उम्मीद तथा बेकार घास को नष्ट करने के लिए जंगलों में आग लगा देते हैं। कई बार किसान अपने खाली खेत पर उगे खर पतवार तथा उसके आसपास की झाडियों को काटकर उसमें आग लगाते हैं जिससे आग जंगल में फैल जाती है। जानकारों का कहना है कि वन तस्कर तथा स्वयं वन विभाग के कर्मचारी भी जंगलों में आग लगाने के लिए जिम्मेदार हैं।
राज्य के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा एक बयान में पहले ही कह चुके हैं कि जंगल में आग लगाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। आश्चर्य की बात यह है कि अब तक इस मामले में किसी को न पकडा़ गया है और न ही किसी के खिलाफ कार्रवाई हुई है।
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