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हैप्पी राखी
क्षमा शर्मा
First Published:31-07-12 11:48 AM
अगले दिन रक्षाबंधन था। मम्मी सवेरे से खाना पका रही थीं। दादी ने सेंवई और खीर बना दी थी। पापा ने सलाद काट दिया था। दीपक घर को सजाने में लगा था। ईशी ने उसके लिए सुंदर मोतियों वाली राखी खरीदी थी और छिपाकर रखी थी।
ईशी को मम्मी ने पुकारा- ‘जल्दी आकर दूध पी लो।’ उसने कंधे उचकाए और भाग गई। बाहर से पापा ने पुकारा- ‘ईशी, देखो कितनी अच्छी रंग-बिरंगी चिड़िया, छोटी सी है तुम्हारी तरह। और हां, तितलियां भी हैं।’
मगर क्या मजाल कि वह सुन ले। आंगन में बैठी दादी बोलीं- ‘आ बेटा, तुझे जल्दी से नहला दूं।’ मगर ईशी थी कि किसी की सुन ही नहीं रही थी। मम्मी फिर बोलीं- ‘जल्दी से तैयार हो जाओ। तुम्हारे लिए रक्षाबंधन की ड्रेस खरीदनी है।’ जब इस पर भी वह कुछ नहीं बोली तो मम्मी नाराज हो गईं- ‘अरे, क्या हो गया? किसी की बात का जवाब नहीं दे रही। क्या मुंह में ढेर सारी टॉफी भरी पड़ी हैं कि बोल ही नहीं पा रही है। मैंने बुलाया, पापा ने बुलाया, दादी ने बुलाया, मगर बोलती ही नहीं। क्या हो गया। कुछ पता तो चले।’
डांट पड़ी तो ईशी बोली- ‘नहीं बोलना मुझे किसी से। मैं नाराज हूं।’ ‘किस बात पर हमारी नन्ही बुलबुल ने मुंह फुला लिया। कल ही तो चिड़ियाघर घुमाकर लाए थे। अब कौन सी डिमांड है।’ -पापा बोले। ‘हां, मुझे ड्रेस नहीं चाहिए। चिड़ियाघर से ही कुछ चाहिए।’- ईशी बोली।
‘चिड़ियाघर से। वहां से हम क्या दिलवा सकते हैं, शेर?’ पापा हंसे-‘फिर शेर जब मुंह फाड़कर तेरे सामने आएगा तो भागती फिरेगी।’
‘नहीं जी, मुझे शेर नहीं चाहिए।’
‘तो क्या तोता, गिलहरी, ऊदबिलाव, खों-खों करता बंदर या कि उल्लू,भालू, चिम्पांजी, मगरमच्छ.’
‘नहीं, सब मेरा मजाक क्यों बना रहे हैं?’ -ईशी का मुंह कुछ और फूल गया।
‘सब कहां, दादी-मम्मी ने तो कुछ कहा ही नहीं।’ -पापा ने जैसे उसे और चिढ़ाया।
‘पापा, मैं भी तो हूं।’ साथ खड़े दीपक ने कहा तो पापा बोले- ‘हां, बेचारे दीपक ने भी कुछ नहीं कहा। नहीं तो तू हमेशा की तरह उसी का नाम लगा देती।’
ईशी और नाराज हो गई- ‘हां हां, मैं तो हमेशा झूठी-मूटी नाम लगा देती हूं उसका।’
‘ले बेटा, अब आई तेरी मुसीबत।’ - दादी सब्जी छीलती हंसीं।
‘मुझे किसी से भी बात नहीं करनी।’ वह ठुनकी तो पापा ने मनाया- ‘कोई बात नहीं, बता न, तुझे क्या चाहिए? एक बार फिर से चलें चिड़ियाघर।’
‘कोई बात नहीं, मुझसे तो बात कर ले।’ दीपक ने उसे मनाने की कोशिश की- ‘मुझे तो बता, क्या चाहिए?’ -दीपक बोला।
‘मुझे मोर चाहिए। चिड़ियाघर में इतना अच्छा नाच रहा था। पंख फैलाकर। मैं भी उसके साथ नाचूंगी।’ -ईशी ने हाथ फैलाए नाचने के लिए।
‘मगर मोर को कैसे पालेंगे। पुलिस पकड़ ले जाएगी। मोर को पालना मना है।’-पापा ने समझाया।
‘मुझे कुछ नहीं पता, मोर लाकर दो।’ -ईशी ने जिद पकड़ ली।
मोर कहां से आए? न मम्मी को समझ में आया, न दादी को, न पापा को ही। अब क्या करें?
‘मैं तेरी स्कर्ट या टॉप पर मोर काढ़ दूं?’
-दादी ने पूछा तो ईशी ने कहा कि उसे तो बस जीता-जागता मोर चाहिए।
खैर, थोड़ी देर बाद वह अपनी जिद भूल गई और दीपक के साथ कार्टून फिल्म देखने लगी। फिर बाहर खेलने चली गई। थोड़ी देर बाद मम्मी उसे और दीपक को रक्षाबंधन की शॉपिंग कराने बाहर ले गईं। वहां कई दुकानों और मॉल्स पर उन्होंने मोर वाली ड्रेस ढूंढ़ने की कोशिश की, मगर ऐसा कुछ नहीं मिला। ईशी को लगा, उसने जिद करके ठीक नहीं किया। मम्मी बेकार में परेशान हो रही हैं। वह बोली- ‘मम्मी रहने दो, नहीं चाहिए मुझे मोर।’
अगले दिन रक्षाबंधन था। मम्मी सवेरे से खाना पका रही थीं। दादी ने सेंवई और खीर बना दी थी। पापा ने सलाद काट दिया था। दीपक घर को सजाने में लगा था। ईशी ने उसके लिए सुंदर मोतियों वाली राखी खरीदी थी और छिपाकर रखी थी। दीपक तैयार होकर आया- ‘ईशी, जल्दी राखी बांध। सवेरे से नाश्ता भी नहीं किया।’ मम्मी ने ईशी को रोली-चावल से सजी हुई थाली दी। उसमें मोतियों वाली राखी भी थी।
ईशी ने राखी बांध दी तो पापा उसे देने के लिए दीपक को पैसे देने लगे। दीपक बोला-‘ठहरिए पापा।’ फिर वह अपने कमरे में सुंदर पैकिंग से सजा एक डिब्बा उठाकर लाया।
‘क्या है?’ -ईशी ने पूछा।
‘देख ले न खोलकर।’
‘इसकी पैकिंग फट जाएगी।’ -ईशी ने उसकी सुंदर पैकिंग को देखते हुए कहा।
‘कोई बात नहीं, कभी तो खोलेगी।’
ईशी ने खोला तो उसकी आंखें फटी रह गईं। उसमें सलमें सितारों से सजा कपड़े का एक मोर रखा था। मम्मी, पापा, दादी भी हैरान। दीपक कब इस मोर को कहां से ढूंढ़कर लाया।
‘देख ले ईशी, तेरा भाई तुझे कितना प्यार करता है।’ -दादी ने दीपक की ओर प्यार से देखते हुए कहा।
‘दीपक, तू इसके पैसे ले ले। अभी तू कमाता थोड़े ही है।’ पापा ने कहा तो दीपक बोला- ‘नहीं पापा, मैंने अपने पॉकेटमनी से जो पैसे बचाए थे, उसी से इसे लाया हूं। यह इसका राखी गिफ्ट है।’
एक बार भी तो ईशी ने नहीं कहा कि मुझे नहीं चाहिए यह वाला मोर। मुझे तो असली ही चाहिए। उसने तो मोर को उठाया और दौड़ चली अपनी सहेलियों को दिखाने। जाते-जाते बोली- ‘थैंक्यू भइया। हैप्पी राखी।’
मगर क्या मजाल कि वह सुन ले। आंगन में बैठी दादी बोलीं- ‘आ बेटा, तुझे जल्दी से नहला दूं।’ मगर ईशी थी कि किसी की सुन ही नहीं रही थी। मम्मी फिर बोलीं- ‘जल्दी से तैयार हो जाओ। तुम्हारे लिए रक्षाबंधन की ड्रेस खरीदनी है।’ जब इस पर भी वह कुछ नहीं बोली तो मम्मी नाराज हो गईं- ‘अरे, क्या हो गया? किसी की बात का जवाब नहीं दे रही। क्या मुंह में ढेर सारी टॉफी भरी पड़ी हैं कि बोल ही नहीं पा रही है। मैंने बुलाया, पापा ने बुलाया, दादी ने बुलाया, मगर बोलती ही नहीं। क्या हो गया। कुछ पता तो चले।’
डांट पड़ी तो ईशी बोली- ‘नहीं बोलना मुझे किसी से। मैं नाराज हूं।’ ‘किस बात पर हमारी नन्ही बुलबुल ने मुंह फुला लिया। कल ही तो चिड़ियाघर घुमाकर लाए थे। अब कौन सी डिमांड है।’ -पापा बोले। ‘हां, मुझे ड्रेस नहीं चाहिए। चिड़ियाघर से ही कुछ चाहिए।’- ईशी बोली।
‘चिड़ियाघर से। वहां से हम क्या दिलवा सकते हैं, शेर?’ पापा हंसे-‘फिर शेर जब मुंह फाड़कर तेरे सामने आएगा तो भागती फिरेगी।’
‘नहीं जी, मुझे शेर नहीं चाहिए।’
‘तो क्या तोता, गिलहरी, ऊदबिलाव, खों-खों करता बंदर या कि उल्लू,भालू, चिम्पांजी, मगरमच्छ.’
‘नहीं, सब मेरा मजाक क्यों बना रहे हैं?’ -ईशी का मुंह कुछ और फूल गया।
‘सब कहां, दादी-मम्मी ने तो कुछ कहा ही नहीं।’ -पापा ने जैसे उसे और चिढ़ाया।
‘पापा, मैं भी तो हूं।’ साथ खड़े दीपक ने कहा तो पापा बोले- ‘हां, बेचारे दीपक ने भी कुछ नहीं कहा। नहीं तो तू हमेशा की तरह उसी का नाम लगा देती।’
ईशी और नाराज हो गई- ‘हां हां, मैं तो हमेशा झूठी-मूटी नाम लगा देती हूं उसका।’
‘ले बेटा, अब आई तेरी मुसीबत।’ - दादी सब्जी छीलती हंसीं।
‘मुझे किसी से भी बात नहीं करनी।’ वह ठुनकी तो पापा ने मनाया- ‘कोई बात नहीं, बता न, तुझे क्या चाहिए? एक बार फिर से चलें चिड़ियाघर।’
‘कोई बात नहीं, मुझसे तो बात कर ले।’ दीपक ने उसे मनाने की कोशिश की- ‘मुझे तो बता, क्या चाहिए?’ -दीपक बोला।
‘मुझे मोर चाहिए। चिड़ियाघर में इतना अच्छा नाच रहा था। पंख फैलाकर। मैं भी उसके साथ नाचूंगी।’ -ईशी ने हाथ फैलाए नाचने के लिए।
‘मगर मोर को कैसे पालेंगे। पुलिस पकड़ ले जाएगी। मोर को पालना मना है।’-पापा ने समझाया।
‘मुझे कुछ नहीं पता, मोर लाकर दो।’ -ईशी ने जिद पकड़ ली।
मोर कहां से आए? न मम्मी को समझ में आया, न दादी को, न पापा को ही। अब क्या करें?
‘मैं तेरी स्कर्ट या टॉप पर मोर काढ़ दूं?’
-दादी ने पूछा तो ईशी ने कहा कि उसे तो बस जीता-जागता मोर चाहिए।
खैर, थोड़ी देर बाद वह अपनी जिद भूल गई और दीपक के साथ कार्टून फिल्म देखने लगी। फिर बाहर खेलने चली गई। थोड़ी देर बाद मम्मी उसे और दीपक को रक्षाबंधन की शॉपिंग कराने बाहर ले गईं। वहां कई दुकानों और मॉल्स पर उन्होंने मोर वाली ड्रेस ढूंढ़ने की कोशिश की, मगर ऐसा कुछ नहीं मिला। ईशी को लगा, उसने जिद करके ठीक नहीं किया। मम्मी बेकार में परेशान हो रही हैं। वह बोली- ‘मम्मी रहने दो, नहीं चाहिए मुझे मोर।’
अगले दिन रक्षाबंधन था। मम्मी सवेरे से खाना पका रही थीं। दादी ने सेंवई और खीर बना दी थी। पापा ने सलाद काट दिया था। दीपक घर को सजाने में लगा था। ईशी ने उसके लिए सुंदर मोतियों वाली राखी खरीदी थी और छिपाकर रखी थी। दीपक तैयार होकर आया- ‘ईशी, जल्दी राखी बांध। सवेरे से नाश्ता भी नहीं किया।’ मम्मी ने ईशी को रोली-चावल से सजी हुई थाली दी। उसमें मोतियों वाली राखी भी थी।
ईशी ने राखी बांध दी तो पापा उसे देने के लिए दीपक को पैसे देने लगे। दीपक बोला-‘ठहरिए पापा।’ फिर वह अपने कमरे में सुंदर पैकिंग से सजा एक डिब्बा उठाकर लाया।
‘क्या है?’ -ईशी ने पूछा।
‘देख ले न खोलकर।’
‘इसकी पैकिंग फट जाएगी।’ -ईशी ने उसकी सुंदर पैकिंग को देखते हुए कहा।
‘कोई बात नहीं, कभी तो खोलेगी।’
ईशी ने खोला तो उसकी आंखें फटी रह गईं। उसमें सलमें सितारों से सजा कपड़े का एक मोर रखा था। मम्मी, पापा, दादी भी हैरान। दीपक कब इस मोर को कहां से ढूंढ़कर लाया।
‘देख ले ईशी, तेरा भाई तुझे कितना प्यार करता है।’ -दादी ने दीपक की ओर प्यार से देखते हुए कहा।
‘दीपक, तू इसके पैसे ले ले। अभी तू कमाता थोड़े ही है।’ पापा ने कहा तो दीपक बोला- ‘नहीं पापा, मैंने अपने पॉकेटमनी से जो पैसे बचाए थे, उसी से इसे लाया हूं। यह इसका राखी गिफ्ट है।’
एक बार भी तो ईशी ने नहीं कहा कि मुझे नहीं चाहिए यह वाला मोर। मुझे तो असली ही चाहिए। उसने तो मोर को उठाया और दौड़ चली अपनी सहेलियों को दिखाने। जाते-जाते बोली- ‘थैंक्यू भइया। हैप्पी राखी।’
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