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बवासीर में राहत दिलाएगा सूर्य नमस्कार
कौशल कुमार, योगाचार्य
First Published:20-12-12 10:57 AM
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अनियमित जीवनशैली, लगातार बैठकर काम करने की मजबूरी, लम्बे समय तक कब्ज की शिकायत बवासीर के कारण बनते हैं। सूर्य नमस्कार के अभ्यास से इस बीमारी से मुक्त हो सकते हैं।

पाचन प्रणाली की निचली पाचन नलिका में दोष उत्पन्न होने के कारण एक बीमारी होती है, जिसे बवासीर कहते हैं। यह बादी और खूनी दो प्रकार का होता है, जो अत्यन्त पीड़ादायी होता है। इस रोग में मलद्वार की शिराओं में सूजन या फूलने से मटर के दाने जैसे मांस के अंकुर निकल आते हैं।

कारण व उपचार
योग में इस रोग का प्रमुख कारण अनियमित जीवन शैली, श्रम व व्यायाम न करना, ज्यादा देर तक बैठे रहना तथा कब्ज एवं अजीर्ण की शिकायत है। योग के नियमित अभ्यास से इस रोग को जड़ा से दूर किया जा सकता है।

आसन
प्रतिदिन सूर्य नमस्कार के 8 से 10 चक्रों (सुविधानुसार) का अभ्यास करने से पाचन प्रणाली के सभी रोगों में मदद मिलती है। तीव्र बवासीर की समस्या के समाधान में पवनमुक्तासन, कौआ चाल, कटिचक्रासन, तिर्यक भुजंगासन तथा उदराकर्षण आदि का अभ्यास बहुत फायदेमंद साबित होता है।

तिर्यक भुंजगासन की अभ्यास विधि
पेट के बल जमीन पर लेट जाएं। दोनों पैरों को आपस में जोड़ दें। दोनों हाथ की हथेलियों को कन्धों के बगल में जमीन पर रखें। हाथों के सहारे धड़ को जमीन से इस प्रकार उठाएं कि दोनों हाथ बिल्कुल सीधे हो जाएं। यह भुजंगासन है। भुजंगासन में स्थित होकर सिर को दांयी ओर अधिकतम पीछे की ओर इस प्रकार रखें कि पैर की एड़ी नजर आ जाएं। थोड़ी देर इस स्थिति में रुककर वापस नीचे आ जाएं। यही क्रिया बांयी ओर भी करें। प्रारम्भ में इसकी दो आवृत्तियों का अभ्यास करें। धीरे-धीरे इसकी 8-10 आवृत्तियों का अभ्यास करें।

हठ योग
इसे दूर करने में हठ योग की उड्डियान बंध तथा अश्विनी मुद्रा रामबाण साबित होती है।

उड्डियान बंध की अभ्यास विधि
ध्यान के किसी भी आसन में रीढ़, गला व सिर को सीधा कर लें। आंखों को ढीली बंद कर मुंह से सारी श्वास बाहर निकालकर बाहर ही रोक (बहिर्कुम्भक) लें। बहिर्कुम्भक लगाकर हाथ को घुटनों पर तान कर रखते हुए पेट को अधिकतम अंदर की ओर खींच कर रखें। जब तक श्वास को आसानी से बाहर रोककर रख सकें, रखें।  असुविधा होने के पहले ही पेट तथा हाथ सामान्य कर श्वास को अन्दर लें। इसकी तीन-चार आवृत्तियों का अभ्यास करें।

सीमाएं
उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, हार्निया तथा अल्सर से पीडित लोग इसका अभ्यास न करें।

अश्विनी मुद्रा
इस मुद्रा का अभ्यास उठते-बैठते, चलते-फिरते कभी भी किया जा सकता है। इसमें गुदाद्वार को हल्का सा ऊपर की ओर खींचकर रखना चाहिए।

आहार
गेहूं, ज्वार या चने की चोकर सहित बनी रोटी, दलिया, जौ एवं अन्य साबुत अनाजों को भोजन में शामिल करना चाहिए। फलों में अंजीर, बेल, अनार, कच्चा नारियल, केला तथा आंवले का भरपूर सेवन करना चाहिए। सब्जियों में तोरई, चौलाई, परवल, कुलथी, टमाटर, गाजर, पालक तथा चुकंदर का नियमित सेवन करें। अमरूद, छाच, करेले का रस, मूली तथा पपीते का सेवन करें। खून जाने की तकलीफ हो तो धनिए के रस में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पिएं।

 
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