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भस्त्रिका और चन्द्रभेदी प्राणायाम
सुनील सिंह, योग गुरु
First Published:22-06-11 12:29 PM
Last Updated:22-06-11 12:30 PM
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मोटापा दूर करना है तो भस्त्रिका प्राणायाम करें और शरीर में शीतलता चाहिए तो चन्द्रभेदी प्राणायाम अचूक उपाय है

भस्त्रिका प्राणायाम

भस्त्रिका का मतलब है धौंकनी। इस प्राणायाम में सांस की गति धौंकनी की तरह हो जाती है। यानी श्वास की प्रक्रिया को जल्दी-जल्दी करना ही भस्त्रिका प्राणायाम कहलाता है।

विधि: पद्मासन या फिर सुखासन में बैठ जाएं। कमर, गर्दन, पीठ एवं रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए शरीर को बिल्कुल स्थिर रखें। इसके बाद बिना शरीर को हिलाए दोनों नासिका छिद्र से आवाज करते हुए श्वास भरें। फिर आवाज करते हुए ही श्वास को बाहर छोड़ें। अब तेज गति से आवाज लेते हुए सांस भरें और बाहर निकालें। यही क्रिया भस्त्रिका प्राणायाम कहलाती है। हमारे दोनों हाथ घुटने पर ज्ञान मुद्रा में रहेंगे और आंखें बंद रहेंगी। ध्यान रहे, श्वास लेते और छोड़ते वक्त हमारी लय ना टूटे।

लाभ व प्रभाव: इस प्राणायाम के अभ्यास से मोटापा दूर होता है। शरीर को प्राणवायु अधिक मात्र में मिलती है और कार्बन-डाई-ऑक्साइड शरीर से बाहर निकलती है। इस प्राणायाम से रक्त की सफाई होती है। शरीर के सभी अंगों तक रक्त का संचार भली-भांति होता है। जठराग्नि तेज हो जाती है। दमा, टीवी और सांसों के रोग दूर हो जाते हैं। फेफड़े को बल मिलता है, स्नायुमंडल सबल होता है। वात, पित्त और कफ के दोष दूर होते है। इससे पाचन संस्थान, लीवर और किडनी की मसाज होती है।

सावधानियां: उच्च रक्तचाप, हृदय रोगी, हर्निया, अल्सर, मिर्गी स्ट्रोक वाले और गर्भवती महिलाएं इसका अभ्यास ना करें।

विशेष: अभ्यास से पहले 2 गिलास जल अवश्य लें। शुरू-शुरू में आराम लेकर अभ्यास करें। ज्यादा लाभ उठाना हो तो इसे योग गुरु के सान्निध्य में ही करें।

चन्द्रभेदी प्राणायाम

इस प्राणायाम के अभ्यास से इड़ा नाड़ी यानी चन्द्र नाड़ी की शुद्धि होती है। यह भी कहा जा सकता है कि चन्द्रनाड़ी का भेदन चन्द्रभेदी प्राणायाम कहलाता है।

विधि: जमीन पर पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं। कमर, गर्दन और रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें। शान्तचित्त होकर बैठ जाएं। बायें हाथ को बायें घुटने पर ज्ञान मुद्रा में रखें और फिर दायें हाथ के अंगूठे से दायें छिद्र को दबाकर बंद करें। इसके बाद बायें नासिका छिद्र से लम्बी गहरी श्वास भरें और हाथ की अंगुलियों से बायें नाक के छिद्र को भी बंद कर लें। अपनी क्षमतानुसार आप जितनी देर आसानी के साथ श्वास रोक सकते हैं रोकें, ना रोक पाने की अवस्था में दायें नसिका छिद्र से श्वास बाहर निकालें। इस तरह कम से कम 10 चक्रों का अभ्यास अवश्य करें।

लाभ व प्रभाव: इस प्राणायाम के अभ्यास से शरीर और मस्तिष्क की गर्मी दूर होती है। शरीर में शीतलता का आभास होता है। खट्टी डकारें बंद हो जाती हैं। पाचन संस्थान जनित रोग दूर हो जाते है।

यह प्राणायाम हृदयरोग में रामबाण का काम करता है।

सावधानियां: दमा के रोगी इसका अभ्यास ना करें। हृदय रोगी योग गुरु के सान्निध्य में ही इसका अभ्यास करें।

 
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