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क्या बच्चा रंग नहीं पहचानता
अशोक कुमार मिश्र
First Published:01-08-12 01:05 PM
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कलर ब्लाइंडनेस आंखों की एक गंभीर समस्या है, जो बच्चों में अधिक पाई जाती है। इस बीमारी से प्रभावित बच्चे को रंगों में अंतर करने में परेशानी होती है। समय रहते इसका इलाज करा लिया जाए तो बड़ी आसानी से इससे मुक्ति मिल सकती है। अशोक कुमार मिश्र का आलेख

कहा जाता है कि बच्चों की दुनिया बेहद रंगीन होती है। हर बच्चा अपनी इन्हीं रंगों की दुनिया में खोया हुआ रहता है, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि कहीं आपके बच्चे के यही रंग उसके दुश्मन तो नहीं हैं। अगर वे रंगों को पहचाने में सहज नहीं हों तो सावधान हो जाएं। हो सकता है कि आपके बच्चे को कलर ब्लाइंडनेस की समस्या हो।

अधिकतर मामलों में यह बीमारी जन्म से ही होती है। इस बीमारी से पीड़ित बच्चे ज्यादातर लाल और हरे रंगों में भेद नहीं कर पाते। ऐसे बच्चे लाख कोशिश के बावजूद रंगों को पहचान नहीं पाते। यही रोग कलर ब्लाइंडनेस या वर्णाधता कहलाता है।

हाल ही में प्राप्त हुए आकड़ों के अनुसार देश में लगभग एक करोड़ 80 लाख लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। इनमें से 3.25 प्रतिशत लोग तो अकेले दिल्ली में ही हैं। इस रोग के साथ अगर आपका बच्चा बड़ा होता है तो भविष्य में उसके सामने कई दिक्कतें आ सकती हैं। सौंदर्य तथा फैशन उद्योग में करियर बनाने की चाह रखने वाले बच्चों की कार्यक्षमता रंगों को पहचानने की शक्ति पर ही निर्भर करती है।
 
महाराजा अग्रसेन हॉस्पिटल के वीट्रो रेटीना सर्जन डॉ. अंकुर अग्रवाल के अनुसार, यह बीमारी अधिकतर मामलों में अनुवांशिक ही होती है। इस रोग के कारण कुछ अन्य रोग भी हो सकते हैं। जैसे मोतियाबिंद। मधुमेह व उच्च रक्तचाप के कारण भी यह रोग हो सकता है। बढ़ती उम्र के साथ-साथ आंखों की पुतलियों में सिकुड़न, लेंस का पीलापन और मैकुला में जमाव जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। इन सबसे भी यह समस्या हो सकती है।
डॉ. अग्रवाल के अनुसार, हमारी आंखों में दो प्रकार के फोटोसेंटिव रिसेप्टर होते हैं- राड्स और कोन्स। राड्स कम रोशनी में देखने में मदद करते हैं, जबकि कोन्स द्वारा हम सामान्य प्रकाश में देख पाते हैं। यही कोन्स रंगों की पहचान भी करता है। रेटिना में ऑप्टिक नसें भी होती है। इन नसों का निर्माण अनगिनत स्नायु तंतुओं के मिलने से होता है। किसी संदेश को मस्तिष्क तक पहुंचाने का काम इन्हीं नसों का होता है। प्रकाश की अलग-अलग तरंगों में अंतर कर पाने की क्षमता से ही रंगों की उत्पत्ति होती है। यह बीमारी तभी होती है, जब आंखें विभिन्न तरंगों में अंतर नहीं कर पाती हैं।
 
बचपन में इलाज है आसान
बचपन में पता चल जाए तो इस बीमारी से मुक्ति पाई जा सकती है। बच्चों में इस रोग का अंदेशा होते ही तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें। इसके प्रति लापरवाही न बरतें। बीमारी का पता बचपन में चलने पर बच्चों में विजुअल रिसेप्टर लगा कर इसका इलाज किया जा सकता है।

कहीं भविष्य न बिगड़ जाए
हाल ही में प्राप्त हुए आकड़ों के अनुसार देश में लगभग एक करोड़ 80 लाख लोग वर्णाधता से पीड़ित हैं। इनमें से 3.25 प्रतिशत लोग तो अकेले दिल्ली में ही हैं। इस रोग के साथ अगर आपका बच्चा बड़ा होता है तो भविष्य में उसके सामने कई दिक्कतें आ सकती हैं।

 
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