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हम क्यों नहीं वैसे...
संजय श्रीवास्तव
First Published:28-07-12 12:22 PM
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हर चार साल बाद हम एक दर्द से रू-ब-रू होते हैं। हर ओलंपिक के आसपास। 100 करोड़ से ऊपर की जनसंख्या वाला ये देश वैसा क्यों नहीं कर पाता, जो मामूली जनसंख्या वाले फिजी, त्रिनिडाड, हवाई द्वीप, जमैका जैसे न जाने कितने ही देश कर ले जाते हैं। इन छोटे देशों के पास तो वैसा खेल ढांचा भी नहीं है, जैसा हमारे पास है। कई देशों का खेल बजट हमारे खेल बजट का एक फीसदी भी नहीं। अफ्रीका के ज्यादातर देशों में भुखमरी और गरीबी के अलावा कुछ नहीं है, लेकिन हर ओलंपिक में वो एक बड़ी ताकत के तौर पर सामने आते हैं।

पिछले पांच ओलंपिक खेलों में हमने हॉकी को छोड़ कर दूसरे खेलों में एकाध पदक जरूर जीते हैं। बीजिंग में इसकी संख्या मामूली तौर पर थोड़ी और बढ़ी। वर्ष 1928 के बाद पहली बार हॉकी की बजाय दूसरे खेल में  निशानेबाजी में गोल्ड जीता। अक्सर जब विदेशी कोच और खेल विशेषज्ञ भारत आते हैं तो पहली नजर में उन्हें हमारे खेल ढांचे में कहीं कमी नहीं दिखती, बड़ी संख्या में स्टेडियम, मैदान, सुविधाएं, कोच। कमी कहीं और ही नजर आती है।
 
बेशक हम स्पोर्ट्स टेक्नोलॉजी में अमेरिका और यूरोपीय देशों की तुलना नहीं कर सकते, खिलाड़ियों की फैक्ट्री बनाने में चीन के आसपास नहीं ठहर सकते। खेल के सुपर पावर देशों को भी छू नहीं सकते तो फिर क्या कर सकते हैं- हमने खेलों को ऊपर उठाने के लिए ढेर सारे प्रयोग कर लिए। खेलों के विकास के लिए स्वायत्त फेडरेशन बनाए। इन्फ्रास्ट्रक्चर की देखरेख और उपकरणों की सहज आपूर्ति के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण खड़ा किया, लेकिन ये सभी काम के कम, सफेद हाथी ज्यादा बन गए। हां, एक बात जरूर दिखी है, जहां भी कोचों ने नये तरह से बढ़िया काम किया, वहां परिणाम अच्छे निकले। चाहे वो बात हैदराबाद में बैडमिंटन की कोचिंग दे रहे पुलेला गोपीचंद और रियाज की करें या फिर भिवानी में बॉक्सिंग एकेडमी में जाने कितनी ही प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने वाले कोच जगदीश शर्मा की। कुश्ती में वैसी ही प्रतिबद्धता महाबली सतपाल और यशवीर सिंह जैसे कोचों ने दिखाई, मगर ये महज चंद उदाहरण हैं।
 
शायद हमारे पास अच्छे कोचों का ही अभाव ज्यादा है। अस्सी फीसदी की दिलचस्पी खेलों में ज्यादा कुछ करने की बजाय महज नौकरी करने में है। इनमें से आधे से ज्यादा अनफिट मिलेंगे, दस मिनट मैदान पर दौड़ा दें तो वो शायद ही ऐसा कर पाएं। हमारे यहां कोच बनाने की प्रक्रिया भी कम हास्यास्पद नहीं। जो भी नेशनल प्रतियोगिताओं में महज तीन बार हिस्सेदारी कर ले, वह पटियाला के नेताजी सुभाष चंद बोस खेल संस्थान में कोच का डिप्लोमा लेने का पात्र हो जाता है। हमारे विश्वविद्यालयों और प्रदेशों की खेल टीमें कैसे बनती हैं, उनमें किस तरह सिफारिश, जोड़-जुगाड़ हावी रहता है, यह किसी से छिपा नहीं। ये सिफारिशी खिलाड़ी ही आमतौर पर कोच बनते हैं, जिनके कंधों पर हमारे खेलों के भविष्य को सुनहरा बनाने की जिम्मेदारी होती है। खेलों में सफलता का जितना आधार सुविधाएं और इन्फ्रास्ट्रक्चर हैं, उतना ही ग्रासरूट स्तर पर अच्छे कोचों की मौजूदगी।

चीन ने अस्सी के दशक तक अपने दरवाजे अंतरराष्ट्रीय खेलों के लिए बंद किए हुए थे। जब खोले तो उसकी ताकत देख कर दुनिया चकित रह गई। चीन ने कभी यूरोपीय देशों की नकल नहीं की, बल्कि खुद का सिस्टम बनाया, खुद कोचों का नेटवर्क खड़ा किया। चीन में खिलाड़ियों को तलाशने की प्रक्रिया भी चार साल की उम्र से शुरू हो जाती है। लिहाजा12-13 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते खिलाड़ी चैंपियन के तौर पर ढल चुका होता है। 2020 ओलंपिक के लिए चीन की तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं। चार साल बाद ब्राजील में होने वाले ओलंपिक के लिए भी वो चार साल पहले से मिशन पर लग गए हैं। इसके उलट हमारे यहां जब तक खिलाड़ी तैयार होता है, उसकी उम्र निकल जाती है।

तीन दशक पहले भारतीय खेल प्राधिकरण ने अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों की खासियतों के हिसाब से प्रतिभाएं तलाशने का काम शुरू किया था। इसने रंग भी दिखाया, लेकिन जल्द ही यह योजना भी बंद हो गई। बॉक्सिंग, शूटिंग में हमने पिछले कुछ सालों में बहुत बढ़िया काम तो किया है, लेकिन उसकी भी असलियत पर मुहर ये ओलंपिक लगाएगा।

 
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