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शादी के बाद पहचान का सवाल?
जयंती
First Published:19-07-12 12:39 PM
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शादी के बाद एक लड़की की जिंदगी ही नहीं, पहचान भी बदल जाती है। सालों तक चला आ रहा उसका सरनेम सात फेरे पड़ते ही बदल जाता है। अब कुछ महिलाएं इस पर ऐतराज करने लगी हैं। बता रही हैं जयंती

कंप्यूटर इंजीनियर पायल शुभंकर ने सगाई से पहले अपने ससुराल वालों से स्पष्ट कह दिया था कि वह शादी के बाद अपना नाम नहीं बदलेगी। पायल का तर्क था, ‘मैं नहीं चाहती कि बाद में इस बात को ले कर कोई बात बने।’ पायल को यह बात नागवार गुजरती है कि शादी के बाद लड़कियों को अपने नाम के साथ भी समझौता करना होता है। जिस नाम के साथ वह बड़ी हुई, अपना काम शुरू किया, बैंक, पासपोर्ट और बाकी सभी कागजात बने, उसे क्यों बदलना चाहिए?

शादी के बाद लड़कियों का सरनेम या नाम बदलने का रिवाज सिर्फ हमारे देश में नहीं है। पश्चिम के लगभग सभी देशों में विवाह के बाद पत्नी पति का सरनेम लगाती है। इस विषय पर समाज शास्त्री डॉ. उमापति वर्मा कहते हैं, ‘विवाह का शुरू से संबंध पारिवारिक संपत्ति और सामाजिक दायित्व से रहा है। कबीलाई संस्कृति में भी अगर लड़की दूसरे कबीले के लड़के से शादी करती थी तो उस कबीले की परंपरा के अनुसार उसका नाम बदल दिया जाता था। इसलिए भी कि उसे नए कबीले में एक पहचान मिल सके और संपत्ति की हिस्सेदार बन सके।’ उन्नीसवीं सदी में यूरोप में महिलाओं के एक समूह ने शादी के बाद सरनेम बदलने के रिवाज का विरोध किया। बाद में यह लहर अमेरिका में भी फैल गई। कुछ महिलाएं अपने सरनेम को ना छोड़कर पति का सरनेम जोड़ कर लगाने लगीं, जो आजकल हमारे यहां भी लोकप्रिय हो रहा है।

ऐश्वर्या राय बच्चन की तरह ही पेशे से बैंकर तूलिका वाजपेयी ने शादी के बाद अपना नाम तूलिका वाजपेयी शर्मा कर लिया है। तूलिका कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि शादी के बाद पति का सरनेम लगाना चाहिए, पर अपनी पहचान भी नहीं खोनी चाहिए।’ तूलिका को अपने बदले हुए नाम की वजह से पासपोर्ट, लाइसेंस और दूसरे महत्वपूर्ण दस्तावेज फिर से बनवाने पड़े। दिल्ली की वकील सुषमा श्री कहती हैं, ‘शादी के तुरंत बाद युवतियों को अपने बदले नाम की रजिस्ट्री करवा लेनी चाहिए। इससे बाद में उनका काम आसान हो जाता है।’ सुषमा बताती हैं कि महाराष्ट्र के फैमिली कोर्ट में कुछ समय पहले तक पति और पत्नी का कोई भी मामला तब तक नहीं लिया जाता था, जब तक दोनों का सरनेम एक ना हो। वे कहती हैं, ‘हालांकि अब इस तरह का कोई दबाव नहीं है। पिछले कुछ सालों से ऐसी स्त्रियों की तादाद बड़ी है, जो अपने नाम के साथ समझौता नहीं करना चाहती।’

कानून नहीं कहता कि तलाक के बाद पत्नी को अपने भूतपूर्व पति का सरनेम नहीं लगाना चाहिए। किसी व्यक्ति का नाम क्या हो, वह खुद तय करता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में कई स्थानों पर शादी के बाद पत्नी का सरनेम ही नहीं, नाम भी बदल दिया जाता था। लेकिन अब इस प्रथा में कमी आई है। शिक्षित युवतियां नहीं चाहतीं कि उनका पहला नाम या वो पहचान जिससे पूरी दुनिया उन्हें जानती है, बदल जाए।

क्या कहता है कानून
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में दिए गए एक निर्णय के अनुसार महिलाएं शादी के बाद अपना सरनेम बदलने या नहीं बदलने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। साथ ही यह जरूरी नहीं है कि अपना सरनेम बदलने के बाद आप कोर्ट में एफिडेविट दें ही। पर, एफिडेविट उस समय आपके लिए मददगार साबित हो सकते हैं जब आपको बैंक में नया खाता खुलवाना हो या फिर आपको वीजा के लिए आवेदन देना हो।

 
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