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मां बदली-बदली-सी नजर आती है
क्षमा शर्मा
First Published:10-05-12 12:21 PM
अम्मा, मां, मम्मी, मॉम..वक्त के साथ मां अलग-अलग नामों से पुकारी जाने लगी, तो मां ने भी वक्त के साथ खुद को बदला। मां समय के साथ कदमताल करना जानती थी, शायद यही वजह है कि होममेकर से वर्किग मदर तक के सफर को वो इतनी आसानी से तय कर गई। मदर्स डे के मौके पर मां में आए बदलावों को बता रही हैं, क्षमा शर्मा
कुछ दिन पहले एक छोटे बच्चे ने घर में रहने वाली अपनी मां से कहा- मम्मी आप नौकरी क्यों नहीं करतीं? आप क्यों दूसरों की तरह सनग्लास नहीं लगातीं? आप क्यों कार ड्राइव नहीं करतीं? बच्चे के इन सवालों में बदली मां की तस्वीर छिपी है। आज के बच्चे को वह मां नहीं चाहिए, जो उसकी पहली पीढ़ियों ने देखी है। बच्चों के लिए कामकाजी मां होने का मतलब है- एजुकेशन, समाज में एक स्टेटस। आमदनी और जरूरतों की पूर्ति। इसमें एक यह बात भी दिखाई देती है कि स्त्रियां चाहे घर में खटकर अपना जीवन होम कर दें, लेकिन घरेलू काम को काम नहीं, कर्तव्य के रूप में देखा जाता है और कर्तव्य का यह निर्वाह चूंकि हर माह बैंक बैलेंस को नहीं बढ़ाता है, इसलिए कोई उसे काम नहीं मानता।
इस बदली हुई मां की एक छवि हमें बॉलीवुड के अंदर भी नजर आती है। अब स्मार्ट मां और स्मार्ट बेटी एक साथ उम्र के बंधनों को तोड़ ग्लैमर के फील्ड में अपने पांव जमाए रख सकती हैं। इस उदाहरण के रूप में अपनी मशहूर मां के साथ मॉडलिंग करती अमृता सिंह की बेटी सारा, शर्मिला टैगोर की बेटी सोहा और जया बच्चान की बेटी श्वेता के चित्र आपने देखे होंगे। ये अपने आप में सशक्त मांएं हैं, जिन्होंने काम-काज और घर के दोनों मोर्चे एक साथ संभाले हैं। आम कामकाजी औरत इन दोनों मोर्चों को संभालते कभी-कभी सैंडविच बन जाने की शिकायत करती है। कई बार उसे बीते जमाने की उन मांओं का जीवन ज्यादा आसान और सुकून भरा लगता है, जिनकी दुनिया घर से घर तक ही सीमित थी। मगर बदली परिस्थितियों में आज कोई भी लड़की सिर्फ और सिर्फ घर में नहीं रहना चाहती है। वह सिर्फ घर में रहकर पति और बच्चों की देखभाल नहीं करना चाहती। उसे भी अपनी पहचान चाहिए। पहचान के अलावा आत्मनिर्भरता और दूसरे के सामने हाथ न फैलाने का आत्मसम्मान भी।
मां जो कहती थी, सच कहती थी
हालांकि आज की लड़की जब गए जमाने को याद करती है तो हर पल ही तो उसे अपनी मां याद आती है। और ये यादें भी कैसी-कैसी होती हैं- अरे मां तो कद्दू मेथी से छौंकती थी। मां तो कहती थी कि गरमी में बाहर से आकर पसीना सुखाने के लिए तुरंत पंखे में नहीं खड़ा होना चाहिए, न ही ठंडा पानी पीना चाहिए। अरे लू लग जाने पर मां ने पुदीने और भुने जीरे का कच्चे आम का पना पिलाया था। मां तो कैसे आटे में नमक मिलाकर फटाफट पूरियां तलती थी। सिर्फ खान-पान ही नहीं, मां की कही बहुत-सी अच्छी और बुरी बातें भी याद आती हैं। मां कहती थी कि कभी किसी का एहसान नहीं भूलना चाहिए। कभी किसी से कड़वा नहीं बोलना चाहिए। काम को समय से पहले निपटाना चाहिए। कल का क्या पता कि कौन-सा नया काम आ जाए। यदि कोई मेहमान आए तो उसका पूरा सत्कार करना चाहिए, क्योंकि कोई कितना थक-मांदकर आपके घर आया हो, वह कुछ खाने-पीने की लालसा से नहीं आया। सच तो यह है कि जिंदगी के हर पल मां ही याद आती है, पिता नहीं। मां पीटती है तब भी बच्चा मां की तरफ ही भागता है। मां है तो सभी समस्याओं का हल है
आज की मां में जहां पुराने जमाने की मां के जीन्स हैं, वहीं उसने जमाने के साथ भी चलना सीख लिया है। ये बातें खाना पकाने से लेकर परंपरा के निर्वाह के रूप में भी दिखते हैं। वहीं यह मां अपने बच्चों की रुचियों के अनुसार बदल भी रही है। उसकी पाक कला रोटी-सब्जी और दाल-चावल तक ही सीमित नहीं है। वह दक्षिण भारतीय खाना पका सकती है, चाइनीज बनाना जानती है। नूडल्स की तो बात ही क्या, भेल-पूरी, ढोकला और हर तरह की नॉन वेज डिश हाजिर है। यही नहीं, जरूरत पड़े तो ड्राइव करके बर्थ डे मनाने से लेकर, थिएटर और स्विमिंग क्लास तक ले जा सकती है। नौकरी की भाग-दौड़ के बावजूद पीटीएम में जा सकती है। बच्चों के साथ बैडमिंटन भी खेल सकती है और पहाड़ पर भी चढ़ सकती है। बेटी अगर किसी मुसीबत में फंस गई है तो उसे दोषी ठहराए बिना मुसीबत से निकालने में लौह स्तम्भ की तरह खड़ी है। इन माताओं ने हर मोर्चे की जिम्मेदारी संभालने के बाद अपने शौक और हसरतों को भी जिंदा रखा है। उन्हें पूरा करने की कोशिश भी करती हैं। बहुत सी बार यह भी देखा गया है कि बेटियों ने भी अपनी मां की किसी भूली-बिसरी इच्छा या शौक को जगाया है और उसे पूरा करने में मां का हर कदम साथ दिया है। नृत्य, संगीत और अधूरी पढ़ाई को पूरी करने की ख्वाहिश वाली माएं आसानी से नजर आ जाती हैं। मां के लिए करें कुछ खास 1. क्या आपको पता है कि आपकी मां को जासूसी उपन्यास या रोमांटिक उपन्यास पढ़ने का कभी जबरदस्त शौक था? तो फिर आप एक काम यह कीजिए, उनके लिए उनके पसंदीदा उपन्यास खरीद लाएं और उन्हें सरप्राइज गिफ्ट करें।
2. पुराने अलबमों में कई जगह मां के हाथ में आपने सितार या गिटार देखा होगा। लेकिन पिछले कई सालों से उनका शौक घर-गृहस्थी के चक्कर में कहीं पीछे रह गया है। आप उन्हें इस बात के लिए तैयार करें कि फिर से
वे किसी हॉबी क्लास में जा कर अपना शौक जारी रखें।
3. अगर आप कमाते हैं, तो इस मदर्स डे पर अपनी मां का पूरा हैल्थ चैकअप कराएं और गिफ्ट में दें हैल्थ पॉलिसी।
4. हर स्त्री के अंदर एक अनकहा सपना बसा होता है। अपनी मां से पता लगाएं कि उनका सपना क्या है। अगर उनका सपना एक बार हवाई यात्रा करने, समुद्र देखने या विदेश घूमने का है तो आप उनके इस स्वप्न को पूरा करने की जरूर कोशिश करें। दुनिया हमारी
मां का दूध बच्चे को बचाता है कैंसर से
मां के दूध से बच्चे को ढेरों फायदे होते हैं, पर अब आप इस लिस्ट में एक और फायदा जोड़ सकते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, मां का दूध बच्चे को कई तरह के कैंसर से बचाने का काम भी करता है। इस शोध के मुताबिक, मां के दूध में कैंसर से लड़ने वाले टीएनफी की काफी ज्यादा मात्र पाई गई है। इस शोध के लिए शोधकर्ताओं ने कोलोस्ट्रम (बच्चे को पिलाया गया मां का पहला दूध) और कुछ वक्त बाद मां के दूध का सैंपल लिया था। मां का दूध बच्चे को होने वाले कई तरह के कैंसर, जैसे ल्यूकेमिया आदि से उसे बचाने में मदद करता है। यह शोध जर्नल ऑफ ह्यूमन लैक्टेशन में प्रकाशित हुआ है। मां हमेशा सच कहती है
हालांकि जब मां कुछ कहती है तो जरूरी नहीं कि हमेशा वे बातें अच्छी ही लगती हों। अक्सर युवाओं को मां की टोकाटाकी पसंद नहीं आती। देर से लौटने पर अक्सर मां कहती है कि समय पर घर आया करो। अब तक कहां थी, किसके साथ थी, खाना कहां खाया, फोन क्यों नहीं किया, इतनी देर से फोन क्यों बंद था? फिल्म देखने की बात पहले क्यों नहीं बताई। दोस्त कौन हैं? क्या करते हैं? कहां जाते हैं? कहां रहते हैं? पढ़ने में कैसे हैं? लड़कियां कैसे कपड़े पहनें, मां अकसर इस बात पर भी कुछ कहती है, टोकती है। ओवर एक्सपोजर के कपड़े पहनने पर नाराज होती है। फेसबुक पर कम और अपनी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दो। किचन का कुछ काम भी सीखो, क्योंकि बाहर का खाना हमेशा नहीं खा सकते। इससे बीमार पड़ते हैं। पैसे भी खर्च होते हैं। रात-दिन क्या इसीलिए मेहनत करती हो कि फालतू चीजों पर पैसे लुटाओ। पूरे साल पढ़ाई किया करो। इम्तिहान के दिनों में रात-रात भर जगने से सेहत खराब हो जाती है। लेकिन अनुभव यह भी बताता है कि मां की जो बातें उस समय बुरी लगती थीं, वे मां-बाप बनते ही याद आने लगती हैं। कई बार तो लगता है कि हम अपनी मां की भाषा ही बोल रहे हैं। यह भी मालूम पड़ता है कि मां की जो बातें अपनी स्वतंत्रता में बाधक जान पड़ती थीं, वे दरअसल अपने बच्चे-बच्ची के लिए तरह -तरह की चिंता और उसकी शुभकामनाओं से जुड़ी थीं। और मां बनने के बाद हम भी मां की उन्हीं बातों को कभी-न-कभी दुहराने लगे हैं।
हालांकि आज की लड़की जब गए जमाने को याद करती है तो हर पल ही तो उसे अपनी मां याद आती है। और ये यादें भी कैसी-कैसी होती हैं- अरे मां तो कद्दू मेथी से छौंकती थी। मां तो कहती थी कि गरमी में बाहर से आकर पसीना सुखाने के लिए तुरंत पंखे में नहीं खड़ा होना चाहिए, न ही ठंडा पानी पीना चाहिए। अरे लू लग जाने पर मां ने पुदीने और भुने जीरे का कच्चे आम का पना पिलाया था। मां तो कैसे आटे में नमक मिलाकर फटाफट पूरियां तलती थी। सिर्फ खान-पान ही नहीं, मां की कही बहुत-सी अच्छी और बुरी बातें भी याद आती हैं। मां कहती थी कि कभी किसी का एहसान नहीं भूलना चाहिए। कभी किसी से कड़वा नहीं बोलना चाहिए। काम को समय से पहले निपटाना चाहिए। कल का क्या पता कि कौन-सा नया काम आ जाए। यदि कोई मेहमान आए तो उसका पूरा सत्कार करना चाहिए, क्योंकि कोई कितना थक-मांदकर आपके घर आया हो, वह कुछ खाने-पीने की लालसा से नहीं आया। सच तो यह है कि जिंदगी के हर पल मां ही याद आती है, पिता नहीं। मां पीटती है तब भी बच्चा मां की तरफ ही भागता है। मां है तो सभी समस्याओं का हल है
आज की मां में जहां पुराने जमाने की मां के जीन्स हैं, वहीं उसने जमाने के साथ भी चलना सीख लिया है। ये बातें खाना पकाने से लेकर परंपरा के निर्वाह के रूप में भी दिखते हैं। वहीं यह मां अपने बच्चों की रुचियों के अनुसार बदल भी रही है। उसकी पाक कला रोटी-सब्जी और दाल-चावल तक ही सीमित नहीं है। वह दक्षिण भारतीय खाना पका सकती है, चाइनीज बनाना जानती है। नूडल्स की तो बात ही क्या, भेल-पूरी, ढोकला और हर तरह की नॉन वेज डिश हाजिर है। यही नहीं, जरूरत पड़े तो ड्राइव करके बर्थ डे मनाने से लेकर, थिएटर और स्विमिंग क्लास तक ले जा सकती है। नौकरी की भाग-दौड़ के बावजूद पीटीएम में जा सकती है। बच्चों के साथ बैडमिंटन भी खेल सकती है और पहाड़ पर भी चढ़ सकती है। बेटी अगर किसी मुसीबत में फंस गई है तो उसे दोषी ठहराए बिना मुसीबत से निकालने में लौह स्तम्भ की तरह खड़ी है। इन माताओं ने हर मोर्चे की जिम्मेदारी संभालने के बाद अपने शौक और हसरतों को भी जिंदा रखा है। उन्हें पूरा करने की कोशिश भी करती हैं। बहुत सी बार यह भी देखा गया है कि बेटियों ने भी अपनी मां की किसी भूली-बिसरी इच्छा या शौक को जगाया है और उसे पूरा करने में मां का हर कदम साथ दिया है। नृत्य, संगीत और अधूरी पढ़ाई को पूरी करने की ख्वाहिश वाली माएं आसानी से नजर आ जाती हैं। मां के लिए करें कुछ खास 1. क्या आपको पता है कि आपकी मां को जासूसी उपन्यास या रोमांटिक उपन्यास पढ़ने का कभी जबरदस्त शौक था? तो फिर आप एक काम यह कीजिए, उनके लिए उनके पसंदीदा उपन्यास खरीद लाएं और उन्हें सरप्राइज गिफ्ट करें।
2. पुराने अलबमों में कई जगह मां के हाथ में आपने सितार या गिटार देखा होगा। लेकिन पिछले कई सालों से उनका शौक घर-गृहस्थी के चक्कर में कहीं पीछे रह गया है। आप उन्हें इस बात के लिए तैयार करें कि फिर से
वे किसी हॉबी क्लास में जा कर अपना शौक जारी रखें।
3. अगर आप कमाते हैं, तो इस मदर्स डे पर अपनी मां का पूरा हैल्थ चैकअप कराएं और गिफ्ट में दें हैल्थ पॉलिसी।
4. हर स्त्री के अंदर एक अनकहा सपना बसा होता है। अपनी मां से पता लगाएं कि उनका सपना क्या है। अगर उनका सपना एक बार हवाई यात्रा करने, समुद्र देखने या विदेश घूमने का है तो आप उनके इस स्वप्न को पूरा करने की जरूर कोशिश करें। दुनिया हमारी
मां का दूध बच्चे को बचाता है कैंसर से
मां के दूध से बच्चे को ढेरों फायदे होते हैं, पर अब आप इस लिस्ट में एक और फायदा जोड़ सकते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, मां का दूध बच्चे को कई तरह के कैंसर से बचाने का काम भी करता है। इस शोध के मुताबिक, मां के दूध में कैंसर से लड़ने वाले टीएनफी की काफी ज्यादा मात्र पाई गई है। इस शोध के लिए शोधकर्ताओं ने कोलोस्ट्रम (बच्चे को पिलाया गया मां का पहला दूध) और कुछ वक्त बाद मां के दूध का सैंपल लिया था। मां का दूध बच्चे को होने वाले कई तरह के कैंसर, जैसे ल्यूकेमिया आदि से उसे बचाने में मदद करता है। यह शोध जर्नल ऑफ ह्यूमन लैक्टेशन में प्रकाशित हुआ है। मां हमेशा सच कहती है
हालांकि जब मां कुछ कहती है तो जरूरी नहीं कि हमेशा वे बातें अच्छी ही लगती हों। अक्सर युवाओं को मां की टोकाटाकी पसंद नहीं आती। देर से लौटने पर अक्सर मां कहती है कि समय पर घर आया करो। अब तक कहां थी, किसके साथ थी, खाना कहां खाया, फोन क्यों नहीं किया, इतनी देर से फोन क्यों बंद था? फिल्म देखने की बात पहले क्यों नहीं बताई। दोस्त कौन हैं? क्या करते हैं? कहां जाते हैं? कहां रहते हैं? पढ़ने में कैसे हैं? लड़कियां कैसे कपड़े पहनें, मां अकसर इस बात पर भी कुछ कहती है, टोकती है। ओवर एक्सपोजर के कपड़े पहनने पर नाराज होती है। फेसबुक पर कम और अपनी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दो। किचन का कुछ काम भी सीखो, क्योंकि बाहर का खाना हमेशा नहीं खा सकते। इससे बीमार पड़ते हैं। पैसे भी खर्च होते हैं। रात-दिन क्या इसीलिए मेहनत करती हो कि फालतू चीजों पर पैसे लुटाओ। पूरे साल पढ़ाई किया करो। इम्तिहान के दिनों में रात-रात भर जगने से सेहत खराब हो जाती है। लेकिन अनुभव यह भी बताता है कि मां की जो बातें उस समय बुरी लगती थीं, वे मां-बाप बनते ही याद आने लगती हैं। कई बार तो लगता है कि हम अपनी मां की भाषा ही बोल रहे हैं। यह भी मालूम पड़ता है कि मां की जो बातें अपनी स्वतंत्रता में बाधक जान पड़ती थीं, वे दरअसल अपने बच्चे-बच्ची के लिए तरह -तरह की चिंता और उसकी शुभकामनाओं से जुड़ी थीं। और मां बनने के बाद हम भी मां की उन्हीं बातों को कभी-न-कभी दुहराने लगे हैं।
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