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बेहतरीन हो सकते थे बदतरीन अवार्डस
मज्कूर आलम
First Published:08-05-12 02:44 PM
दुनिया का सबसे विशाल फिल्म उद्योग भारत में है। अगर सिर्फ हिंदी फिल्मों की बात की जाए, तो हर साल 100 से डेढ़ सौ फिल्में रिलीज होती हैं। इसके अलावा प्रदर्शन के लिए खाली सिनेमाहॉल नहीं मिलने या दूसरे कारणों से 20 से 25 फिल्में डिब्बाबंद हो जाती हैं। खैर, डिब्बाबंद होने वाली फिल्मों की बात छोड़िए हम आपको 2011 के जनवरी से मार्च महीने के बीच रिलीज हुई कई ऐसी फिल्मों के नाम गिनाते हैं, जिनका शायद ही आपने नाम सुना हो। हॉस्टल, यूनाइटेड सिक्स, ऊटपटांग, आशिकी डॉट इन, एंजेल, मस्ती एक्सप्रेस, सतरंगी पैराशूट, हैप्पी हसबैंड।
भी हाल में बकवास हिंदी फिल्मों के लिए क्रमश: दूसरा घंटा और चौथा गोल्डन केला अवार्ड दिया गया। पहली नजर में देखने पर लगता है कि ये दोनों अवार्ड हॉलीवुड फिल्मों के लिए दिये जाने वाले रैस्बरी अवार्ड जैसे हैं। रैस्बरी अवार्ड हॉलीवुड की बकवास फिल्मों के लिए 1981 से दिये जा रहे हैं। इस अवार्ड की अपनी साख है और यह विश्व भर में चर्चित है। इसकी वजह यह है कि इस अवार्ड फंक्शन में महज मजे के लिए अवार्ड नहीं दिये जाते, बल्कि इसे बहुत ही गंभीरता से दिया जाता है। अगर वह किसी फिल्म को या किसी एक्टर, डायरेक्टर आदि को खराब बताते हैं, तो उनके पास इसके पूरे तर्क होते है। लेकिन घंटा और केला यह गंभीरता देखने को नहीं मिलती है।
गोल्डन केला अवार्ड के जूरी मेंबर अनंत के मुताबिक एक निर्णायक समिति होती है, जो साल भर फिल्में देखकर उनका नॉमिनेशन करती है और उसके बाद उसे ये अपने वेबसाइट पर डालती है, जहां पर दर्शक आकर वोटिंग करते हैं और उस आधार पर ये पुरस्कार देते हैं। नॉमिनेशन के लिए ये सिर्फ वैसी ही फिल्मों को चुनते हैं, जिनकी मीडिया में चर्चा रही हो, थोड़ी पॉपुलर रही हों, जिन्हें ज्यादा से ज्यादा लोगों ने देखा हो। अब ये अवार्ड आपको कितने गंभीर लगते हैं, हम यह आप ही पर छोड़ते हैं। सूची देखकर आप खुद ही तय कर लें कि ऐसे अवार्डस आखिर क्यों दिए जाते हैं।
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