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कहां खो गया है बैकग्राउंड म्यूजिक
असीम चक्रवर्ती
First Published:05-05-12 12:53 PM
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इधर, फिल्मों में बैकग्राउंड संगीत पर काफी ध्यान दिया जाने लगा है, लेकिन इसकी गुणवत्ता पर नहीं। कुछ फिल्मों को उनके विषय की वजह से अच्छा संगीत मिल जाता है, लेकिन बाकी फिल्मों के साथ यह नहीं हो पाता।

इधर, आज की संगीतकार जोड़ी सलीम-सुलेमान का मन सुर रचना पर ज्यादा केंद्रित हो गया है। इस वजह से वह अपनी एक सशक्त पहचान बिल्कुल खोते जा रहे है। शायद बहुत कम लोगों को पता हो कि कभी इस जोड़ी ने अपने शानदार बैंकग्राउड म्यूजिक यानी पार्श्व संगीत की वजह से जबरदस्त धाक जमायी थी। मगर आज वे उसी फिल्म में पार्श्व संगीत देना पसंद करते है, जिसमें उनका पूरा संगीत होता है। कभी ऐतराज, धूम, मुझसे शादी करोगी, हैदराबाद ब्लूज, सलाम नमस्ते, नो एंट्री, मैंने प्यार क्यों किया जैसी एक दर्जन से ज्यादा फिल्मों में पार्श्च संगीत देकर वे एक अत्यंत प्रभावी संगीतकार के तौर पर सामने आये थे। इस मामले में 2006 में आयी करण जौहर की फिल्म काल उनके लिए टर्निंग पॉइंट बनी। इस फिल्म के वे स्वतंत्र संगीतकार थे। इसमें कोई गाना नहीं था, मगर फिल्म के दो आइटम नंबर की सुर रचना उन्होंने की थी। इसके पार्श्व संगीत की सर्वाधिक तारीफ हुई, लेकिन उन्होंने यह भ्रम पाल लिया कि बतौर संगीतकार उनकी पारी शुरू हो चुकी है। पचास से ज्यादा फिल्मों में लाजवाब पार्श्व संगीत दे चुके सलीम-सुलेमान यहीं काफी दिग्भ्रमित हुए। 
इधर एकल संगीतकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने के चक्कर में वे अपनी इस विशेष योग्यता को नजरअंदाज करने लगे हैं। दो साल पहले अभिनेता हृतिक रोशन की फ्लाप फिल्म काइट्स में भी उनका बैकग्राउड म्यूजिक बहुत सराहा गया था। फिर अचानक अपनी इस विशेष योग्यता को वे इतना हाशिए पर क्यों रख रहे हैं?

इस जोड़ी के सुलेमान इस जिज्ञासा को शांत करते है, ‘फिल्मों में हमेशा से हमने स्वतंत्र संगीतकार के तौर पर अपनी शुरुआत की। मगर 1999 की फिल्म प्यार में कभी कभी का हमारा बैक ग्राउंड म्यूजिक बहुत क्लिक हुआ। काम के अभाव के चलते हमने स्वतंत्र तौर पर बैकग्राउड म्यूजिक देना शुरू कर दिया। फिल्म के मूड के मुताबिक हम बैकग्राउंड म्यूजिक देते हैं। आज भी बैकग्राउंड म्यूजिक तैयार करने में हमें कोई एतराज नहीं है, पर ऑफर अच्छा होना चाहिए, वरना हर दूसरी फिल्म में सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक देने का कोई मतलब नहीं है। अब अपनी संगीतवाली फिल्मों में ही हम यह काम पूरी जिम्मेदारी से करना चाहते हैं।’

लेकिन यह जोड़ी इस बात को भले ही कबूल न करें, मगर जिम्मेदारी बढ़ने से उनका ध्यान निश्चित तौर पर बंटा है। इसकी एक बड़ी वजह है कि वे कोई सलिल चौधरी, हेमंत कुमार, शंकर-जयकिशन, आरडी बर्मन जयदेव जैसे जहीन म्यूजिक डायरेक्टरों की श्रेणी में नहीं आते हैं, जो मूल संगीत के साथ-साथ पार्श्व संगीत की दोहरी जिम्मेदारी भी अच्छी तरह से निभा सकें। आज के म्यूजिक डायरेक्टर जब भी ऐसा करने की कोशिश करते हैं, उनकी छवि धूमिल होने लगती है।

इसके ज्वलंत उदाहरण के तौर पर संदीप चौठा का नाम आता है। पहली बार राम गोपाल की फिल्म सत्या के पार्श्व संगीत के जरिये उन्होंने अपनी गहरी छाप छोड़ी थी। इसके बाद वास्तव, कौन, मस्त, अशोका, जंगल आदि एक दर्जन फिल्मों में अपने पार्श्व संगीत का खूब लोहा मनवाया।

लेकिन जब वे इस दिशा में और ज्यादा सार्थक करने की बजाय स्वतंत्र तौर पर फिल्म का संगीत देने के लिए उतावले हो गये तो सारी बातें बिगड़ने लगीं। अब उन्होंने फिर से सिर्फ पाश्र्व संगीत का ऑफर कबूल करना शुरू कर दिया है। चौठा बताते हैं, ‘मैंने कभी ऐसी कोई जिद नहीं की कि मुझे सिर्फ फिल्म का पार्श्व संगीत देना है। मगर मुश्किल यह है कि ज्यादातर निर्माता फिल्म को तवज्जो नहीं देते हैं, उनके लिए मैं हमेशा तैयार हूं। असल में उन्हें यह समझाने में बहुत परेशानी होती है कि फिल्म के प्रेजेंटेशन में बैक ग्राउंड म्यूजिक का भी अपना वजूद होता है और उसे भी कुछ अच्छा करने का पूरा कैनवस मिलना चाहिए। आपको यकीन न हो तो सत्या का बैकग्राउंड म्यूजिक सुन लीजिए। यह फिल्म के मूल संगीत से जरा भी कमतर नहीं है।’

पहले के सारे दिग्गज संगीतकार खूब अच्छी तरह से समझते थे। बुजुर्ग संगीतकार खय्याम बताते हैं, ‘आज तो पार्श्व संगीत के नाम पर सिर्फ एक खानापूरी की जाती है, वरना हमारे दौर में फिल्म का संगीत पूरा करने के बाद ही पूरी म्यूजिक टीम बैकग्रांउड म्यूजिक के काम पर लगती थी। फिल्म के एक-एक दृश्य के बारे में विस्तार से चर्चा की जाती थी। तब उसके अनुकूल बैकग्राउंड म्यूजिक तैयार किया जाता था। कई बार व्यस्तता के चलते कुछ संगीतकार फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं दे पाते थे तो हम ऐसे ऑफर भी सहर्ष कबूल कर लेते थे। जाहिर है इस बार भी हमारे काम की स्टाइल होती थी। मगर आज के ज्यादातर संगीतकारों के पास बैकग्राउंड म्यूजिक तैयार करने के लिए जरा भी वक्त नहीं है।’

निर्माता भी अपना खर्चा बचाने के लिए स्टॉक म्यूजिक से बैकग्राउंड म्यूजिक तैयार करवा रहें हैं। समझदार फिल्म दर्शक इस लीपा-पोती को झट पकड़ भी लेते हैं। वे झट से समझ जाते है कि किस फिल्म में यह पार्श्व संगीत सुना था। ऐसे में पुराने दौर की बीस साल बाद, कोहरा, वो कौन थी आदि कई फिल्मों का पार्श्व संगीत याद आ जाता है।

बीस साल बाद का पार्श्व संगीत तो आज भी दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। जाहिर है इसके संगीतकार हेमंत कुमार ने न सिर्फ इसके गानों को कर्णप्रिय धुनों में बाधा था, बल्कि इसके पार्श्व संगीत में भी बराबर मेहनत की थी। पुराने दौर के नामी फिल्मकार यश चोपड़ा आज भी इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं। चासनाला कोयला खान पर बेस्ड सितारों से भरी अपनी फिल्म काला पत्थर के बैकग्राउंड म्यूजिक को भी पूरी तवज्जो दी थी। यही वजह थी कि फिल्म का संगीत तो उन्होंने जहां राजेश रोशन को सौंपा था, वही बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए संगीत मनीषी सलिल चौधरी की सेवाएं ली थीं।

हालिया रिलीज फिल्म एजेंट विनोद का बैकग्राउंड संगीत काफी सराहा गया है। काला पत्थर देखते समय आपको इस बात का एहसास बार-बार होगा। कर्णप्रिय सुर रचना के साथ-साथ सलिल दा, बैकग्राउंड म्यूजिक के कितने बड़े जानकार थे, इस बारे में फिर कभी विस्तार से चर्चा करना ही ठीक होगा।

 
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