गुरुवार, 23 मई, 2013 | 01:50 | IST
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हर्बल औषधियां संभल कर लें, तभी फायदा
वन्या
First Published:02-05-12 11:59 AM
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प्रकृति के खजाने से जो चीजें हमें मिली हैं, उनमें जड़ी-बूटियां भी हैं। पिछले कुछ सालों में इनकी लोकप्रियता में खासी वृद्धि हुई है। सेहत के लिए इनके तरह-तरह के इस्तेमाल से जुड़ी महत्वपूर्ण बातों का खुलासा कर रही हैं वन्या

भले ही नीम जैसे पेड़ अब घरों में न दिखते हों, पर इनके औषधीय उपचारों ने हमारी जिंदगी में अहम जगह बना ली है। छोटी-बड़ी हर बीमारी की इलाज इनमें छिपा है। त्वचा की बीमारी हो या दांत का दर्द हर जगह ये कारगर हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों में हर्बल और आयुर्वेदिक औषधियों की लोकप्रियता में काफी वृद्धि हुई है।

आयुर्वेद एक वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति है। आयुर्वेद के सिद्धांत में माना जाता है कि कोई भी बीमारी शरीर के प्राण यानी पाए जाने वाले तत्व के असंतुलन के कारण होती है। आयुर्वेद के तीन तत्व हैं, वायु, पित्त और कफ। जब इन तीनों में से किसी में असुंतलन होता है तो इसे दोष कहा जाता है। वात यानी वायु या प्राण, पित्त यानी अग्नि या शरीर, कफ यानी जल या मस्तिष्क। कोई अच्छा वैद्य या आयुर्वेदाचार्य नाड़ी परीक्षण कर इन दोषों की ठीक प्रकार पहचान कर सकता है। जैसे यदि किसी व्यक्ति को वात की अधिकता है तो उसे चक्कर आएंगे, पित्त की अधिकता में सूजन होगी और कफ का असंतुलन पस या बलगम बनाता है।

आम धारणा है कि प्राकृतिक चिकित्सा, घरेलू चिकित्सा और आयुर्वेद एक ही है। लेकिन यह समझना होगा कि आयुर्वेद अपने आप में संपूर्ण चिकित्सा पद्धति है। भले ही आयुर्वेद में ऐलोपैथ की तरह साइड इफेक्ट के मामले ज्यादा न होते हों, लेकिन इसमें भी सावधानी रखना जरूरी होता है। प्रचार माध्यमों में कुछ जड़ी-बूटियों के नाम इतने ज्यादा प्रसारित-प्रकाशित होते हैं कि आम व्यक्तियों को याद हो जाते हैं। आजकल हर किसी को मालूम होता है कि दिमाग तेज चलाने के लिए ब्राह्मी, पेट के लिए हरड़ लाभकारी होती है, अब अगर किसी उत्पाद में दावा किया गया हो कि यह पदार्थ मौजूद है, तो कई बार व्यक्ति इसे तुरंत खरीद लेता है। वह किसी अच्छे आयुर्वेदाचार्य से परामर्श करने की जहमत नहीं उठाता।

डॉ. दामोदर प्रसाद पारे कहते हैं कि आयुर्वेद के सिद्धांत के अनुसार यदि कोई पौधा औषधीय महत्व का है तो इसका मतलब है कि उसकी जड़-फल-फूल-पत्ते-छाल का अलग-अलग महत्व होगा। जैसे कुछ दवाओं में जड़ कारगर होगी, तो हो सकता है उसी पौधे की छाल से बनाया गया क्वाथ अलग महत्व का हो। वह कहते हैं कि अगर आयुर्वेदिक दवाएं सही ढ़ंग से तैयार न की जाएं तो उनके प्रभाव में कमी आ सकती है। इसके अलावा आयुर्वेद दवाओं के साथ-साथ बिना चिकित्सक के परामर्श के ऐलोपैथी या अन्य उपचार किए जाएं, तो ये इतनी कारगर सिद्ध नहीं होती।

उपचार का असर दो व्यक्तियों पर अलग-अलग हो सकता है। आयुर्वेदिक दवाएं असर करने में भी लंबा समय लेती हैं। इन दवाओं के साइड अपेक्षाकृत कम होते हैं। फिर भी कोई आयुर्वेदिक दवा लेते वक्त चिकित्सक से परामर्श जरूर करना चाहिए। यह सुनिश्चित कर लें कि उसके पास बीएएमएस की डिग्री हो। दवा लेने के बाद उसमें क्या सामग्री है यह जरूर पूछें। अगर आपको कोई भी शक हो तो उसका परीक्षण करा लें, क्योंकि कुछ दवाओं में नुकसानदायक तत्व मौजूद होते हैं। जैसे कुछ दवाओं में पारा मिला होता है, जो बहुत नुकसानदायक हैं। इनके इस्तेमाल से शरीर के अंगों को नुकसान पहुंच सकता है। यह सही है कि आमजन में उपयोगिता की दृष्टि से आयुर्वेदिक अधिक कारगर पद्धति है।

इन बातों का रखें ध्यान

च्यवनप्राश, अश्वगंधा, त्रिफला पाउडर आदि आयुर्वेदिक दवाएं खरीदते वक्त इस बात पर ध्यान दें कि डिब्बे पर सामग्री का नाम, मात्र, और वजन लिखा हो। साथ ही किस जड़ या पौधे से यह प्राप्त है इसकी जानकारी भी हो। हालांकि जड़ी-बूटियां प्राकृतिक होती हैं तो व्यक्ति मान कर चलता है कि यह सुरक्षित भी होंगी। लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता। 

निर्माता यह बताने को बाध्य नहीं है कि आहार संबंधी वस्तु सुरक्षित और लाभकारी है या नहीं। नियम तो यह है कि आपको पता हो कि दवा पर ठीक से शोध कर उसकी समीक्षा की गई हो। जैसे उसे पहले पशुओं पर परीक्षण कर फिर इंसान पर परीक्षण किया गया हो।

ज्यादातर विटामिन सप्लीमेंट यह सुनिश्चित नहीं करते कि ये शुद्ध है या नहीं या इसमें सामग्री की मात्रा कितनी है या जिस मुख्य पदार्थ से यह सप्लीमेंट बनाया गया है वह कितना है। यही वजह है कि यह शुद्ध नहीं होते। इसके अलावा मुख्य पदार्थ की मात्र भी हर सप्लीमेंट में अलग-अलग हो जाती है।

मानक रूप से प्रति गोली में मुख्य पदार्थ की मात्र का प्रतिशत साफ होना चाहिए, जबकि ज्यादातर हर्बल उत्पादों में सारे मिले-जुले पदार्थों की जानकारी होती है। इससे कोई भी व्यक्ति नहीं जान पाता कि मुख्य पदार्थ क्या है और सहायक पदार्थ कौन से हैं।

इन सभी कारणों को देखते हुए आपको चाहिए कि आप किसी अच्छी एवं नामी कंपनी का ही उत्पाद खरीदें। आहार या पोषक पदार्थों में पहले सामग्री की ठीक से जांच करें फिर उसे खरीदें।

अक्सर आपको यह दिक्कत आ सकती है कि कैसे पहचानें कि किस कंपनी की दवा असली या प्रामाणिक होगी और किसकी नहीं। यहां आप जीएमपी प्रमाणित कंपनी की दवा लें।

क्या हैं आसव और आरिष्ट
आयुर्वेद में दवा बनाने के आसव और अरिष्ट दो प्रमुख तरीके हैं। आसव से आश्य है जड़ी के आसवन (डिस्ट्रीलेशन) से तैयार दवा। अरिष्ट का मतलब है कि किसी भी जड़ी का एक चौथाई तैयार काढ़ा जिसे क्वाथ कहा जाता है। अरिष्ट बनाने के लिए प्राचीन पद्धति में क्वाथ को धान, महुआ या गुड़ के साथ लंबे समय रखा जाता था जिससे पगमेंटेशन के बाद अरिष्ट तैयार होता था, लेकिन अब इन्हें तैयार करने के लिए सीमेंट की बड़ी टंकियों का इस्तेमाल किया जाता है।

दवा वही, फार्मूले नये

त्रिकटु प्लस: पाचन क्रिया सुधारता है। सौंठ, काली मिर्च, हरा धनिया, जायफल और अजवायन से बनता है।

अश्वगंधा कंपाउंड: यह एनर्जी टॉनिक है। अश्वगंधा, शतावरी, कुडजू आदि से बनता है।

शतावरी कंपाउंड: महिलाओं के लिए उपयोगी होता है। यह शतावरी, केसर आदि से बनता है।

त्रिफला प्लस: हरीतकी, आमलकी, बिभितकी और अदरक से बनता है।

गोटूकोला कंपाउंड: दिमाग के लिए उपयोगी। गोटूकोला, अश्वगंधा, चंदन, मुलेठी से बना।

हर्बल फज: यह रक्त शोधक है। चंदन, लेमन ग्रास, सौंठ से बनता है।

अर्जुन कंपाउंड: यह हार्ट टॉनिक है। अर्जुन, अश्वगंधा, गुग्गुल और चंदन से बना।

हर्बल दर्दनाशक: यह गोटूकोला, जटामांसी, शंखपुष्पी, जायफल से बना।

सदियां बीतीं, जादू बरकरार
आंवला

इसे अमृतफल भी कहा जाता है। यह विटामिन सी को अच्छा स्नोत है। इसके सेवन से त्वचा रोगों में भी फायदा पहुंचाता है। यह कॉलेस्ट्रॉल कम करता है। मधुमेह रोग में भी काफी फायदा पहुंचाता है।

अश्वगंधा
अश्वगंधा के बीज, फल और छाल का कई रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है। त्वचा रोगों में इसका इस्तेमाल लाभकारी होता है।

ब्राह्ही 
इसके नियमित सेवन से याददाश्त में इजाफा होता है। कई मानसिक रोगों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।

लहसुन
यह वातहर है। हृदय संबंधी समस्याओं में भी फायदा पहुंचाता है।

अदरक
पाचन तंत्र को बेहतर करता है। सर्दी-नजले जुकाम में फायदा पहुंचाता है। कॉलेस्ट्रॉल को भी कंट्रोल में रखता है। ब्लड सर्कुलेशन को ठीक रखता है।

नीम
यह अनके रोगों में कारगर हैं। त्वचा रोगों में बहुत लाभ पहुंचाता है। इसका दांतुन करने से काफी फायदा पहुंचता है। यह रक्तशोधक और प्रभावशाली एंटीबायोटिक है।

त्रिफला
यह पाचन क्रिया सुधारता है।

तुलसी
सर्दी-जुकाम-खांसी एवं त्वचा रोगों में लाभकारी तुलसी के पांच पत्ते सादे पानी के साथ खाने से स्मरण शक्ति मजबूत होती है। रक्त शुद्धि में भी यह काफी उपयोगी है। तुलसी में थकान दूर करने के अद्भुत गुण हैं। पर संतानोत्पत्ति की चाह रखनेवाली महिलाएं इसके सेवन से बचें।

 
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