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हिप सजर्री से आपका कूल्हा कहेगा वाह!
संदीप जोशी
First Published:02-05-12 11:14 AM
कूल्हे में दर्द की वजह कई हो सकती है और तकलीफ से मुक्ति के कई उपाय भी हो सकते हैं। हिप सजर्री ऐसा ही एक उपाय है जो बेहद सफल भी साबित होता है। आप इसका लाभ कैसे उठाएं, बता रहे हैं संदीप जोशी
कूल्हे की हड्डी के जोड़ का टूटना हिप फ्रैक्चर कहलाता है। युवाओं से लेकर अस्सी वर्षीय व़ृद्धों को अलग-अलग कारणों से कूल्हे की हड्डी से जुड़ी तकलीफ का शिकार बनना पड़ता है। वृद्धों में अक्सर ऑस्टियोपोरोसिस कूल्हे की हड्डी टूटने का कारण बनता है। अधिकांश फ्रैक्चर फीमर के आसपास के हिस्से में होते हैं जो समय के साथ-साथ कमजोर पड़ जाता है। इसलिए कुछ सावधानियां बरतकर ऐसी किसी समस्या से बचा जा सकता है।
कारण और उपचार
कूल्हे में तेज दर्द उठना इसकी शुरुआत हो सकती है, जिसके बाद टांग हिलाने-डुलाने में तकलीफ होती है। गिरने से भी यह समस्या उठती है और मोच आने से भी। टांग पर जोर डालने में भी दिक्कत होने लगती है। टांग में अकड़न और प्रभावित क्षेत्र के आसपास सूजन दिखने लगती है। आमतौर पर सजर्री हमेशा इस समस्या का सर्वश्रेष्ठ इलाज होती है। वहीं दूसरी ओर ट्रैक्शन जैसे विकल्प तब सुझाए जाते हैं जब पीड़ित को कोई अन्य गंभीर बीमारी भी हो, जिस कारण सजर्री न की जा सकती हो।
इसके साथ ही फीमर हड्डी (कूल्हे का जोड़) के ऊपरी हिस्सों को मैटल प्रोस्थीसिस से बदला जाता है। इसे हेमियरथ्रोप्लास्टी कहते हैं। एक अन्य विधि कूल्हे को बदला जाना (हिप रिप्लेसमेंट) भी होती है, जिसमें ऊपरी फीमर और पैल्विक बोन को प्रोस्थीसिस से बदला जाता है। यदि व्यक्ति जोड़ टूटने से पहले गठिया या किसी पुरानी चोट से पीड़ित था तो भी हिप रिप्लेसमेंट एक बेहतर विकल्प है। युवाओं के मामले में डॉक्टर जांघ की हड्डी के ऊपरी हिस्से में फ्रैक्चर को स्क्रूज से बदलने का प्रयास करते हैं।
जटिलताएं रोगियों के हिल-डुल न पाने के कारण अक्सर कई जटिलताएं उठ खड़ी होती हैं, जैसे रक्त वाहिकाओं में खून के थक्के जमना। चोटिल स्थान के रास्ते वसा रक्त में मिलकर फेफड़ों तक जा पहुंचती है। इलेक्ट्रोलाइट इम्बेलेंस, बैड सोर और सीने में संक्रमण आदि। महिलाओं में हिप फ्रैक्चर होने की आशंका रजोनिवृत्ति के बाद पुरुषों की अपेक्षा दोगुनी हो जाती है। आनुवांशिक कारणों से भी इसका डर बना रहता है। इसलिए डॉक्टर विटामिन डी का सेवन करने की सलाह देते हैं। नियमित व्यायाम को भी डॉक्टर जरूरी बताते हैं। ऐसे स्टीरॉयड्स से डॉक्टर बचने की सलाह देते हैं क्योंकि इनका असर हड्डियों की मजबूती पर पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक क्षमता अलग-अलग होती है। इसी हिसाब से उसे सक्रिय भी बनाए रखना चाहिए। इसी कारण डॉक्टर रोगी को क्षमतानुसार चलने की सलाह देते हैं, जिससे हड्डियां मजबूत रहती हैं। इसलिए जरूरी है कि बिना रुके उचित इलाज कराया जाए। सेहत से जुड़ी कुछ पुरानी तकलीफें, कमजोरी, सजर्री के
बाद उठने वाली जटिलताएं और शारीरिक निष्क्रियता भी इलाज में रुकावट बनती हैं। इन्हें है ज्यादा रिस्क अगर आप महिला हैं तो इसकी आशंका दोगुनी हो जाती है।
आपके परिवार में भी यह समस्या रही है तो आपमें इसकी आशंका बढ़ जाएगी।
खाने में विटामिन डी और कैल्शियम पर्याप्त मात्र में नहीं ले रहे हैं।
धूम्रपान करते हैं।
कुछ खास तरह की दवाएं जिसका आप सेवन कर रहे हैं। इसमें स्टेरॉयड्स आदि हो सकती हैं।
कूल्हे में तेज दर्द उठना इसकी शुरुआत हो सकती है, जिसके बाद टांग हिलाने-डुलाने में तकलीफ होती है। गिरने से भी यह समस्या उठती है और मोच आने से भी। टांग पर जोर डालने में भी दिक्कत होने लगती है। टांग में अकड़न और प्रभावित क्षेत्र के आसपास सूजन दिखने लगती है। आमतौर पर सजर्री हमेशा इस समस्या का सर्वश्रेष्ठ इलाज होती है। वहीं दूसरी ओर ट्रैक्शन जैसे विकल्प तब सुझाए जाते हैं जब पीड़ित को कोई अन्य गंभीर बीमारी भी हो, जिस कारण सजर्री न की जा सकती हो।
इसके साथ ही फीमर हड्डी (कूल्हे का जोड़) के ऊपरी हिस्सों को मैटल प्रोस्थीसिस से बदला जाता है। इसे हेमियरथ्रोप्लास्टी कहते हैं। एक अन्य विधि कूल्हे को बदला जाना (हिप रिप्लेसमेंट) भी होती है, जिसमें ऊपरी फीमर और पैल्विक बोन को प्रोस्थीसिस से बदला जाता है। यदि व्यक्ति जोड़ टूटने से पहले गठिया या किसी पुरानी चोट से पीड़ित था तो भी हिप रिप्लेसमेंट एक बेहतर विकल्प है। युवाओं के मामले में डॉक्टर जांघ की हड्डी के ऊपरी हिस्से में फ्रैक्चर को स्क्रूज से बदलने का प्रयास करते हैं।
जटिलताएं रोगियों के हिल-डुल न पाने के कारण अक्सर कई जटिलताएं उठ खड़ी होती हैं, जैसे रक्त वाहिकाओं में खून के थक्के जमना। चोटिल स्थान के रास्ते वसा रक्त में मिलकर फेफड़ों तक जा पहुंचती है। इलेक्ट्रोलाइट इम्बेलेंस, बैड सोर और सीने में संक्रमण आदि। महिलाओं में हिप फ्रैक्चर होने की आशंका रजोनिवृत्ति के बाद पुरुषों की अपेक्षा दोगुनी हो जाती है। आनुवांशिक कारणों से भी इसका डर बना रहता है। इसलिए डॉक्टर विटामिन डी का सेवन करने की सलाह देते हैं। नियमित व्यायाम को भी डॉक्टर जरूरी बताते हैं। ऐसे स्टीरॉयड्स से डॉक्टर बचने की सलाह देते हैं क्योंकि इनका असर हड्डियों की मजबूती पर पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक क्षमता अलग-अलग होती है। इसी हिसाब से उसे सक्रिय भी बनाए रखना चाहिए। इसी कारण डॉक्टर रोगी को क्षमतानुसार चलने की सलाह देते हैं, जिससे हड्डियां मजबूत रहती हैं। इसलिए जरूरी है कि बिना रुके उचित इलाज कराया जाए। सेहत से जुड़ी कुछ पुरानी तकलीफें, कमजोरी, सजर्री के
बाद उठने वाली जटिलताएं और शारीरिक निष्क्रियता भी इलाज में रुकावट बनती हैं। इन्हें है ज्यादा रिस्क अगर आप महिला हैं तो इसकी आशंका दोगुनी हो जाती है।
आपके परिवार में भी यह समस्या रही है तो आपमें इसकी आशंका बढ़ जाएगी।
खाने में विटामिन डी और कैल्शियम पर्याप्त मात्र में नहीं ले रहे हैं।
धूम्रपान करते हैं।
कुछ खास तरह की दवाएं जिसका आप सेवन कर रहे हैं। इसमें स्टेरॉयड्स आदि हो सकती हैं।
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