गुरुवार, 23 मई, 2013 | 10:03 | IST
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सिनेमा हुआ 100 साल का
दीपक दुआ
First Published:28-04-12 04:51 PM
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भारतीय सिनेमा के सौवें साल का जश्न शुरू हो चुका है। 3 मई, 1913 को पहली भारतीय फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ आम जनता के लिए पर्दे पर आई थी। अगले साल भर यह जश्न चलता रहेगा। ‘राजा हरिश्चंद्र’ के बनने की दास्तान काफी संघर्षां से भरी रही। बॉलीवुड की इस पहली फिल्म यादगार सफर पर दीपक दुआ की एक नजर।

आज हमने एक आश्चर्यजनक चीज देखी। पर्दे पर सभी चित्र हिल-डुल रहे थे..। घर में घुसते ही मेरा पुत्र बाबर्या (भालचंद्र) मुझसे लिपट कर बोला तो मैंने अपने पति से पूछा कि उन्होंने उसे क्या दिखाया है? उत्तर मिला- सिनेमा! मैंने पूछा कि यह ‘सिनेमा’ क्या होता है? तब उन्होंने कहा- मेरे साथ आकर तुम स्वयं देख लो..।

काकी फाल्के यानी सरस्वती फाल्के ने जब अपने पति धुंडीराज गोविंद फाल्के से यह सवाल किया होगा, तब भले ही वह उन्हें शब्दों में न समझा पाए हों कि ‘सिनेमा’ क्या होता है, लेकिन दो ही साल बाद यही शख्स पूरे भारत को यह दिखा पाने में कामयाब हो चुका था कि ‘सिनेमा’ असल में एक ऐसा जादू है जो इसे बनाने वालों के और इसे देखने वालों के सिर चढ़ कर बोलता है और आने वाले वक्त में यह देश भर के करोड़ों लोगों को मदहोश करने वाला है। जी हां, यह वही शख्स था जिसने भारत की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई और जिसे बाद में दादा साहब फाल्के के नाम से जाना गया। लेकिन खुद सिनेमा देखने से उसे पर्दे पर उतारने का उनका यह सफर आसान बिल्कुल नहीं था।

कैसे उपजा ‘सिनेमा’ का विचार
फाल्के असल में लक्ष्मी आर्ट प्रिंटिंग प्रेस चलाते थे। साङोदारी में चल रहे इस कारोबार से जब उनका नाता टूटा तो वह बेहद हताश हो चुके थे। इसी दौरान उन्हें सिनेमा देखने का मौका मिला और वह इसके मुरीद होकर रह गए। काकी फाल्के लिखती हैं-‘उस रात वे काफी बेचैन रहे। दूसरे दिन हम दोनों ‘सिनेमा’ देखने गए। हम सेंडहस्र्ट मार्ग पर स्थित एक आलोकित शामियाने के निकट आए। उसका नाम ‘द अमेरिका इंडिया सिनेमॉटोग्राफ’ था। पहले दर्जे की टिकट का दाम आठ आने था।

उस दिन 1911 में 15 अप्रैल, शनिवार का दिन था। भीतर ईसाइयों और यूरोपियों की भीड़ थी। फिर वहां अंधेरा कर दिया गया और पर्दे पर एक चलते-फिरते मुर्गे की तस्वीर दिखाई दी। यह ‘पाठे कंपनी’ का व्यापार चिन्ह था। उस दिन की प्रमुख फिल्म ‘द लाइफ ऑफ क्राईस्ट’ थी। प्रदर्शन की समाप्ति के बाद मैंने पूछा- ये तस्वीरें कैसे हिल-डुल रही थीं? तब वह मुझे प्रोजेक्शन के कमरे के निकट ले गए और बताया कि यह सब उस मशीन द्वारा किया गया है। लौटते समय रास्ते में उन्होंने कहा- अब तुम अपने-आप सब जान जाओगी क्योंकि हम शीघ्र ही इस व्यवसाय को शुरू करने जा रहे हैं। ईसा मसीह के जीवन की तरह हम राम और कृष्ण के बारे में सिनेमा बनाएंगे। यह सुन कर मुझे जरा भी प्रसन्नता नहीं हुई किंतु मैं चुप रही।’

लग गए तैयारी में
सच यही है कि उस जमाने में सिनेमा बनाने का विचार दुस्साहस से भरा नहीं बल्कि बेहद मूर्खतापूर्ण ही समझा जाता था। पर अगर काकी फाल्के को यह अहसास होता कि उनके पति के दिमाग में कुलांचे भरता यह नया ‘व्यवसाय’ आने वाले समय में किस कदर लोकप्रिय होगा तो वह प्रसन्न भले ही न होतीं, चुप कतई न रहतीं। लेकिन फाल्के के लिए इस राह पर चलना किसी अग्निपथ से कम नहीं था। उन्होंने इंग्लैंड से सिनेमा से जुड़ी कुछ किताबें, सूची-पत्र, उपकरण आदि मंगवाए और किस्म-किस्म के प्रयोगों में जुट गए।

लगातार फिल्में देखने, सिनेमा से जुड़ी चीजों को पढ़ने और रोजाना बमुश्किल तीन घंटे सोने से उनकी आंखें तक खराब होने की नौबत आ गई थी, जिनका समय रहते इलाज होने से ही बचाया जा सका। 1 फरवरी, 1912 को वह एक मित्र की सहायता से लंदन गए और ‘बायोस्कोप’ नामक साप्ताहिक अखबार के ग्राहक बन कर उसके सम्पादक काबरेन से मिले। आठ दिन तक उनसे काफी विचार-विमर्श करने के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के तकनीकी पहलू सीखने के लिए एक हफ्ते का कोर्स भी किया। 1 अप्रैल, 1912 को जब वह लौटे तो उनके साथ एक विलियमसन कैमरा, प्रिटिंग व प्रोसेसिंग मशीन और कच्ची निगेटिव फिल्म भी थी।

शुरुआत असली संघर्ष की
फाल्के के असली संघर्ष की शुरुआत तो लंदन से लौटने के बाद हुई। भारत की पहली स्वदेशी फीचर फिल्म बनाने के लिए सबसे पहले जरूरत थी पैसे की और उनके इस पागलपन में पैसे लगाने के लिए कोई तैयार नहीं था। सो पहले उन्होंने ‘मटर के पौधे का विकास’ नाम से एक फिल्म बनाई जिसे वह एक महीने तक फिल्माते रहे। इसी को दिखा कर उन्होंने अपने एक मित्र को अपनी फिल्म में पैसे लगाने के लिए राजी किया। फाल्के का मानना था कि जैसे ईसा मसीह के जीवन पर बनी फिल्म देखने के लिए ईसाई उमड़ते हैं तो राम और कृष्ण पर बनी फिल्में भारतीयों को खूब लुभाएंगी।

लेकिन जब उन्होंने इन विषयों पर विचार करना शुरू किया तो उन्हें लगा कि राम या कृष्ण के जीवन को डेढ़-दो घंटे की फिल्म में समेट पाना संभव नहीं है। तब उन्होंने कई कहानियों पर विचार किया। दरअसल वह कोई ऐसी पौराणिक कहानी ही लेना चाहते थे जिससे आम भारतीय जनमानस भलीभांति परिचित हो। काफी सोच-विचार के बाद उन्हें पात्रों की संख्या, फिल्म की सेटिंग और उसके बजट के हिसाब से सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कहानी पसंद आई और वह उसे बनाने में जुट गए।

बहुत मुश्किल था यह सफर
इस फिल्म के निर्माण के दौरान पहली बड़ी समस्या आई महिला कलाकारों के चुनाव की। उस जमाने में सिनेमा देखना तक खराब माना जाता था तो ऐसे में किसी सभ्य परिवार की महिला का किसी फिल्म में काम करने के लिए राजी होना असंभव था। फाल्के ने इसके लिए विज्ञापन तक दिए। एक जगह वह लिखते हैं-‘मेरे विज्ञापनों के उत्तर में फणसबाड़ी, उक्कल कोट गली, हनुमान गली, केनेडी ब्रिज जैसे (लालबत्ती) क्षेत्रों से अभिनय करने की आकांक्षी महिला कलाकारों (वेश्याओं) के आवेदन आते थे।’ आखिर उन्हें इस मुश्किल से उबारा सालुंके नाम के एक वेटर ने।

इस वेटर में स्त्रैण गुण अधिक थे सो रानी तारामती के पात्र को निभाने के लिए इसे लिया गया। राजा हरिश्चंद्र की भूमिका दत्तात्रेय दुबे ने की। एक और महिला पात्र भी एक पुरुष गणपत शिंदे ने ही निभाया। हरिश्चंद्र के पुत्र की भूमिका के लिए कोई भी अपने बेटे को देने के लिए तैयार नहीं था क्योंकि इस कहानी में इस बच्चों की मृत्यु हो जाती है। तब फाल्के ने अपने बेटे भालचंद्र को ही इस रोल में ले लिया। पैसे की समस्या जब फिर उठ खड़ी हुई तो काकी फाल्के आगे आईं। उन्होंने अपने सारे गहने निकाल कर पति को दे दिए। गौर कीजिए कि बाद में यह दृश्य हमारी फिल्मों में एक फॉमरूले के तौर पर कई बार आया।

आखिर तैयार हुई पहली फिल्म
कई सारी कठिनाइयों के बाद आखिर फाल्के ने चार रीलों में 2944 फुट लंबी फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा’ का निर्माण कर ही लिया जिसका नाम बदल कर बाद में ‘राजा हरिश्चंद्र’ किया गया। 21 अप्रैल, 1913 को इस फिल्म को तत्कालीन बंबई के ओलंपिया थिएटर में मीडिया और दूसरे मेहमानों को दिखाया गया। 3 मई, 1913 शनिवार के दिन यह फिल्म बंबई के कोरोनेशन थिएटर में आम दर्शकों के लिए रिलीज की गई जिसकी समीक्षा 5 मई, 1913 के ‘बांबे क्रॉनिकल’ अखबार में प्रकाशित हुई। दर्शकों ने इस फिल्म को काफी पसंद किया। कोरोनेशन थिएटर में यह लगातार 23 दिन तक चली।
 
दो साल पहले ईसा मसीह पर बनी फिल्म देख कर फाल्के ने कहा था-‘मैंने भारत में इस (फिल्म) उद्योग को स्थापित करने का निर्णय कर लिया था।’ उस समय उनकी यह बात भले ही कइयों को दुस्साहसपूर्ण या बचकानी लगी हो लेकिन दो साल बाद उन्होंने दिखा दिया था कि वह असल में एक फिल्म नहीं बल्कि इतिहास की उस किताब का पहला सफा लिख रहे थे जिसमें अभी अनगिनत पन्ने और जुड़ने थे।

 
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