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कभी गीतों ने मारी बाजी कभी वैरायटी रही हावी
असीम चक्रवर्ती
First Published:28-04-12 04:38 PM
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1913 में मूक फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' के आगमन के साथ ही फिल्मों में बदलाव का दौर हो चुका था। लेकिन मूक फिल्मों का दौर ज्यादा लंबा नही चला। सिर्फ चार-पांच साल बाद ही बोलती फिल्मों का दौर शुरू हो चुका था।

1930 से आगे
1930 में 172 फिल्में बनीं। 1931 में बोलती फिल्म 'आलम आरा' के आगमन के बावजूद 207 मूक फिल्में बनी। लेकिन इसके बाद मूक फिल्मों का अध्याय समाप्त होने लगा। आर्देशर ईरानी की 'आलम आरा' में जहां पर्दे के पीछे से संवाद सुनायी पड़ता था, वहीं 1932 में वी. शांताराम की सत्यवादी 'राजा हरिश्चन्द्र' पहली टॉकी फिल्म बनी। इसमें सितारे सीधे-सीधे डॉयलाग बोलते हुए नजर आये। इसी साल मदन थियेटर्स ने अपनी पहली फिल्म विश्वमंगल को रंगीन करने के लिए विदेश भेजा।

इसके एक साल बाद वी. शांताराम ने फिल्म सैरन्ध्री को रंगीन बनाया, कुछ तकनीकी चूक के चलते यह रंगीन नहीं बन पायी। इस दौर में दादा साहेब फाल्के, आर्देशर ईरानी, वी. शांताराम, ई. बिल्मोरिया, देवकी बोस, प्रमथेश बरुआ, हिमांशु राय, वाडिया, नाडिया, केएल सहगल जद्दनबाई, काननबाला, आरसी बोराल, सोहराब के नाम उभर कर आये। इन प्रसिद्ध हस्तियों ने ही 1939 में भारतीय फिल्मों की रजत जयंती मनायी। इससे पहले 1932 में फिल्मवालों ने द मोशन पिक्चर का गठन किया।

40 में उभरा देशप्रेम
इस दशक की फिल्मों में मुख्यत: देशप्रेम और सामाजिक उत्थान की बातें ही होती थीं। चेतन आनंद की नीचा नगर को इसके लिए हमेशा याद किया जायेगा। इस दशक में राज कपूर ने अपने आरके बैनर की स्थापना की। 'सिकंदर', 'चित्रलेखा', 'खंजाची', 'रोटी', 'भरत मिलाप', 'किस्मत', 'रतन', 'धरती के लाल', 'शहीद', आदि लगभग पचास फिल्मों का निर्माण हुआ। महल का संगीत बहुत शानदार था। यह फिल्म कोकिलकंठी लता मंगेशकर के कॅरियर का अहम पड़ाव बनी। राज कपूर की बरसात की सफलता के साथ आरके की लोकप्रिय टीम बनी, जो वर्षों तक काम करते रहे।

50 में छाईं कल्ट और क्लासिक फिल्में
'आवारा', 'दो बीघा जमीन', 'मदर इंडिया', 'देवदास', 'प्यासा', 'कागज के फूल', 'नया दौर', 'झनक-झनक पायल बाजे', 'आन', 'मधुमति', 'सुजाता', 'श्री 420', 'धूल का फूल' आदि वे फिल्में हैं, जिन पर हिंदी फिल्में हमेशा गर्व करेंगी। इसी दौर में फिल्मफेयर अवॉर्ड शुरू हुआ। उस दौर में सात बार फिल्मफेयर जीतनेवाले महान निर्देशक बिमल राय की सख्त हिदायत थी कि जब उनकी फिल्म को अवार्ड दिया जाए, तभी उनकी फिल्म को नॉमीनेट किया जाए।  

60 के दशक में मिली बेशुमार वैरायटी
60 के दशक की शुरुआत हुई क़े आसिफ की कालजयी फिल्म 'मुगल-ए-आजम' के प्रदर्शन के साथ। इस फिल्म को हमेशा एक यादगार घटना भी माना गया है। 'कानून', 'गंगा जमुना', 'गाइड', 'परख', 'साहिब बीवी' और 'गुलाम', 'चौदहवीं का चांद', 'हम दोनों', 'बंदिनी', 'अनुपमा', 'मुझे जीने दो', 'तीसरी कसम', 'प्रोफेसर', 'आरजू', 'संगम', 'दोस्ती', 'उपकार', 'बीस साल बाद', 'हकीकत', 'ज्वेल थीफ', 'आशीर्वाद', 'सत्यकाम', 'आराधना', 'इत्तेफाक', 'दो रास्ते', 'तीसरी मंजिल', 'फूल और पत्थर', 'मेरा साया', 'मेरे महबूब' आदि फिल्मों पर नजर दौड़ाएं, तो इनकी विषयवस्तु में कोई साम्यता दिखाई पड़ी। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल इस सुरीले दौर के एक और साझीदार बने। इस दौर में आयी फिल्म सत्यकाम को हमेशा अपने वक्त से बहुत पहले की फिल्म माना गया। 

70 के दशक में छाया रहा एंटरटेनमेंट 
'जॉनी मेरा नाम', 'पूरब और पश्चिम', 'शोर', 'बेईमान', 'दाग', 'मेरा गांव मेरा देश', 'यादों की बारात', 'पाकीजा', 'सावन भादों', 'अमर प्रेम', 'दुश्मन', 'कारवां', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'शोले', 'दीवार', 'आनंद', 'बावर्ची', 'मेरा नाम जोकर', 'परिचय', 'मौसम','आंधी', 'रोटी कपड़ा' और 'मकान', 'जंजीर', 'त्रिशूल', 'अमर अकबर एंथोनी', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'बॉबी', 'कालीचरण', 'विश्वनाथ', 'कभी कभी', 'मिली', 'गुड्डी' आदि। इस दौर के चार चमत्कार थे—'शोले', 'जय संतोषी मां', 'सलीम-जावेद' और 'पंचम'।

'शोले' के बारे में विस्तार से कोई चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है। इसे बॉक्स ऑफिस की एक अतुलनीय घटना कहा जा सकता है, जो शायद ही फिर कभी दोहरायी जाये। इस दौर में सलीम-जावेद लेखक की पहली जोड़ी थी, जिसने फिल्म लेखक की गरिमा को चरम पर पहुंचाया, जिसकी कमी आज भी शिद्दत से महसूस की जा रही है। यहां पंचम यानी आरडी बर्मन के सुरीलेपन की विशेष चर्चा जरूरी है। उन्होंने अपने दौर में जो सार्थक काम किया, आज के ज्यादातर संगीतकार उसे ही धड़ल्ले से फॉलो यानी नकल कर रहे हैं।

80 के दशक में मसाला फिल्मों की माया
यह दौर चालू मसाला फिल्मों के नाम था। बस, हृषि दा एक अपवाद के तौर पर सामने आये। उनकी फिल्में 'गोलमाल', 'नरम-गरम', 'खूबसूरत', दर्शकों का स्वस्थ मनोरंजन करने में पूरी तरह से सफल रही। इसके अलावा 'एक दूजे के लिए', 'नमक हलाल', 'कर्मा', 'सिलसिला', 'कुली', 'मेरी जंग', 'गुलामी', 'मिस्टर इंडिया', 'लावरिस', 'चश्मे बद्दूर', 'काला पत्थर', 'शराबी', 'हीरो', 'कर्मा', 'रामलखन', 'तेजाब', 'कयामत से कयामत तक', 'अंकुश', 'परिंदा', 'राम तेरी गंगा मैली', 'मैंने प्यार किया', 'सारांश', 'त्रिदेव', 'प्रेम-रोग', 'मशाल', 'विधाता', 'हिम्मतवाला' आदि फिल्मों ने इस दशक में खूब हिट फिल्मों का मजा लूटा। आज के दो सुपर स्टार आमिर और सलमान का उदय इसी दशक में हुआ। इस दशक के अंत में राज कपूर की मृत्यु के साथ ही शो मैन की विदाई हुई थी और खुद को खुद ही शो मैन कहने वाले सुभाष घई का उदय हुआ था। 

90 बोले तो किंग खान
इस दशक की सबसे बड़ी देन सुपर स्टार शाहरुख खान का उदय है। निश्चित तौर पर शाहरुख खान ने फिल्म व्यवसाय को बहुत अच्छी तरह से समझा है।  इस दशक की कुछ और चर्चित फिल्में हैं- 'दिल', 'घायल', 'दीवाना', 'जो जीता वही सिकंदर', 'दिल है कि मानता नहीं', 'बेटा', 'आंखें', 'हम हैं राही प्यार के', 'दामिनी', 'अंदाज अपना अपना' आदि।

नई सदी से अब तक (2000 से 2012)
एक बात तय है कि फिल्म मेंकिंग को जो संजीदापन चाहिए, फास्ट फूड के इस दौर में वही कहीं खो चुका है। ज्यादातर डायरेक्टर ही अब प्रोजेक्ट मैनेजर बन कर हीरो के इशारे पर नाच रहे हैं। हर तरफ एक अफरा- तफरी मची हुई है। फिल्म मेकिंग के लिए किसी के पास समय नहीं है। झटपट फिल्में बन रही हैं, ज्यादा से ज्यादा तीन हफ्ते में अपना बिजनेस कर लुप्त हो जा रही हैं।

 
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