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पुरुषों से ज्यादा जीती हैं महिलाएं
मेलबर्न, एजेंसी
First Published:03-08-12 02:47 PM
वैज्ञानिकों ने वह कारण खोज निकाला है, जिसकी वजह से औरतें पुरुषों की तुलना में एक लंबा जीवन जीती हैं। यह कारण निहित है उनकी जैविक संरचना यानि कि जीन्स में।
मोनाश विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि जीवों की कोशिकाओं में पाए जाने वाले माइटोकॉन्ड्रिया के डीएनए में पाई जाने वाली भिन्नताएं ही पुरुषों और महिलाओं की जीवन प्रत्याशा के लिए जिम्मेदार होती हैं।
माइटोकॉन्ड्रिया लगभग सभी जंतुओं की कोशिकाओं में मौजूद होता है। यह जीवन के लिए जरूरी है क्योंकि यह हमारे भोजन को उर्जा में बदलता है जो हमारे शरीर को ताकत देती है।
मोनाश स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज के डॉ डामेन डॉलिंग और पीएचडी छात्र फ्लोरेंसिया कैमस के ने लैंचेस्टर विश्वविद्यालय के डॉ डेविड कलेंसी के साथ मिलकर यह अध्ययन किया।
यह अध्ययन नर और मादा फल-मक्खियों पर किया गया। डॉलिंग ने बताया कि नर मक्खियों के माइटोकॉन्ड्रिया के डीएनए में होने वाले बदलावों का प्रभाव उनकी उम्र और बूढ़े होने पर पड़ता है लेकिन इन्हीं बदलावों का प्रभाव मादा मक्खियों पर नहीं पड़ता।
वे बताते हैं कि बेशक बच्चों को अपने जीन्स माता व पिता दोनों से ही मिलते हैं फिर भी वह माइटोकॉन्ड्रिया सिर्फ अपनी माता से ही प्राप्त करता है। इसका मतलब है प्रकृति द्वारा चयन का सिद्धांत यहां काम करता है जो उत्तम जैविक लक्षण का ही चयन करता है।
डॉलिंग ने बताया कि हमारे अध्ययन में सामने आया कि माइटोकॉन्ड्रिया में होने वाले बदलाव पुरुषों की सेहत पर भी प्रभाव डालते हैं।
अब हमें उन जैविक क्रियाविधियों को खोजना है जिनके जरिए पुरुषों में माइटोकॉन्ड्रिया में बदलावों के हानिकारक प्रभावों को नष्ट किया जा सके ताकि वे स्वस्थ रहें।
यह अध्ययन करंट बायोलॉजी नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया था।
मोनाश विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि जीवों की कोशिकाओं में पाए जाने वाले माइटोकॉन्ड्रिया के डीएनए में पाई जाने वाली भिन्नताएं ही पुरुषों और महिलाओं की जीवन प्रत्याशा के लिए जिम्मेदार होती हैं।
माइटोकॉन्ड्रिया लगभग सभी जंतुओं की कोशिकाओं में मौजूद होता है। यह जीवन के लिए जरूरी है क्योंकि यह हमारे भोजन को उर्जा में बदलता है जो हमारे शरीर को ताकत देती है।
मोनाश स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज के डॉ डामेन डॉलिंग और पीएचडी छात्र फ्लोरेंसिया कैमस के ने लैंचेस्टर विश्वविद्यालय के डॉ डेविड कलेंसी के साथ मिलकर यह अध्ययन किया।
यह अध्ययन नर और मादा फल-मक्खियों पर किया गया। डॉलिंग ने बताया कि नर मक्खियों के माइटोकॉन्ड्रिया के डीएनए में होने वाले बदलावों का प्रभाव उनकी उम्र और बूढ़े होने पर पड़ता है लेकिन इन्हीं बदलावों का प्रभाव मादा मक्खियों पर नहीं पड़ता।
वे बताते हैं कि बेशक बच्चों को अपने जीन्स माता व पिता दोनों से ही मिलते हैं फिर भी वह माइटोकॉन्ड्रिया सिर्फ अपनी माता से ही प्राप्त करता है। इसका मतलब है प्रकृति द्वारा चयन का सिद्धांत यहां काम करता है जो उत्तम जैविक लक्षण का ही चयन करता है।
डॉलिंग ने बताया कि हमारे अध्ययन में सामने आया कि माइटोकॉन्ड्रिया में होने वाले बदलाव पुरुषों की सेहत पर भी प्रभाव डालते हैं।
यह अध्ययन करंट बायोलॉजी नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया था।
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