रविवार, 19 मई, 2013 | 07:22 | IST
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झुंझलाहट हमारे गणतंत्र का प्रतिबिंब बन गई है
राजीव धवन
First Published:23-01-11 07:45 PM
Last Updated:23-01-11 07:46 PM
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ज्यादा पुरानी नहीं, 20 जनवरी 2011 की घटना है। पूर्व रॉ अधिकारी निशा भाटिया अदालत में अपने केस की सुनवाई के तौर-तरीकों से इस कदर आहत थी कि उसने कोर्ट में अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। भौंचक मगर अनजान दिल्ली हाईकोर्ट को लगा कि उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं है और उसे मनोवैज्ञानिक मदद की दरकार है। ऐसा क्या है कि वह इस व्यवस्था से इतनी झुंझला गई।

झुंझलाहट हमारे गणतंत्र का प्रतिबिंब बन गई है। सड़कों पर लोग झुंझलाए हुए हैं। वजह कई हैं - अपराध, रोड रेज, ट्रैफिक जाम, परिवहन व्यवस्था का चरमराना, पुलिस चेकिंग और पुलीसिया भ्रष्टाचार। अस्पतालों और क्लिनिक्स में हमारी जनता हताश-परेशान है। लोग नर्सरी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में दाखिले को लेकर खिसियाए हुए हैं। परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन न कर पाने पर हमारे बच्चों बेहद बेइज्जत होते हैं, उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाते हैं। क्रूर खाप पंचायतों ने सामाजिक जीवन की बखिया उधेड़ी हुई है। कारोबार भी इस झुंझलाहट के बीच चल रहे हैं। प्रशासन से पैदा हुई अपनी हताशा को खत्म करने के लिए नेता लोग भ्रष्टाचार के जरिए अच्छी जिंदगी तलाश दिखते हैं। नौकरशाह ताकत, संपदा और पहचान चाहते हैं। मुकुल आडवाणी ऐसे महल में रहते हैं, जिसे देख कोई घर तो नहीं कह सकता। क्या उन्होंने अपने पिता से कुछ नहीं सीखा। उनके भीतर गहरी हताशा भरी हुई है।

इकसठ साल बीत जाने के बाद हम कैसे अपने गणतंत्र की ताकत और उसकी क्षमता की नाप-तौल कर पाएंगे। इन 61 सालों के छोटे से वक्त में हमने एक युद्ध चीन और तीन पाकिस्तान के साथ लड़े हैं। चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता है, और वो पहले ही लद्दाख से अक्साई चीन को अलग कर हथिया चुका।

पाकिस्तान अपनी हार के बावजूद कश्मीर को अलग करने के मकसद पर डटा हुआ है। देश के मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है। हिंदू आतंकवादियों ने समझौता एक्सप्रेस में धमाके की जिम्मेदारी स्वीकार की है। स्टेंस को परिवार सहित जला देने वाले दारा सिंह को उम्रकैद मिली और उसके साथ षडय़ंत्र में शामिल 11 लोग बरी हो गए। धर्म परिवर्तन विरोधी कानून के तहत ईसाइयों को सताया जा रहा है। अमीर बहुत अमीर है। आधा अरब लोग बहुत ही गरीब हैं-कुछ गरीबी रेखा के नीचे और उसके ऊपर। जो इलाज सुझाया गया है वो है हंसी: सुबह उठो और हंसो! पता नहीं किसपर?

हमारा संविधान हमें क्या देता है? समानता? वो हमारे जीवन से गायब है। स्वतंत्रता? ये सिर्फ संपन्न लोगों के पास है। भाईचारा? जो समूहों में मिलता है उनके इर्द-गिर्द नहीं। यह सब देख अमर्त्य सेन कहते हैं कि लोगों में समानता नहीं है, मगर हमें उन्हें समान अवसर देना होगा, ताकि वो लोग सक्षम हो सकतें और अपनी जरूरतें पूरी कर सकें। उन्हें खाना, स्वास्थ्य, शिक्षा और खुद के विकास के लिए समान अधिकार दें। जब यह हो जाएगा, तो क्या वो खुश हो जाएंगे? अथवा वो लोग जबरदस्त टक्कर देने वाले ऐसे इंसान बन जाएंगे जो अपने अस्तित्व के लिए एक-दूसरे से लड़ेंगे।

व्यक्तिगत खुशी के बगैर व्यक्तिगत सफलताएं बकवास हैं। सामाजिक खुशी के साथ सामजिक और आर्थिक सफलता एक बड़ी मुसीबत है, जिसे इतिहास वापस पहले जैसा नहीं कर सकता। हमें बताया जाता है कि हमारी विकास दर 8 फीसदी से ज्यादा होनी चाहिए। कीमतें बढ़ रही हैं। रोटी-सब्जी सबको उपलब्ध नहीं है। प्याज तो दुर्लभ हो गई है। टमाटर वैभव ही चीज है। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को नहीं पता क्या किया जाना चाहिए। उन्हें कभी नहीं पता चलेगा कि क्या करना है। निवेश के लिए अर्थव्यवथा में रुपया भर दिया जाएगा। ज्यादा रुपया, ज्यादा मुद्रास्फीति। मगर भारत एक बहुत बड़ा घरेलू बाजार है, जो गरीबों व कम पैसे वालों को अपनी खींच सकता है और अमीरों के लिए ऐसा बाजार बना सकता है जिसमें खुद खड़ा रहने की क्षमता हो। आधा भारत फैशन चाहता है और आधा निरंतर अस्तित्व।

हमारा पड़ोसी भूटान कहता है कि वह उसे अपने लोगों के भले की चिंता है। वह विकास के राष्ट्रीय सूचकांक की बजाए खुशी के सूचकांक के बारे में बात करता है। मुझे सुबहा है कि भारत खुशी के सूचकांक में खड़ा हो पाएगा। ये बात सही है कि भूटान के उदाहरण को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। इसने अपनी जनसंख्या में 20 फीसदी ऐसे लोगों को बाहर कर दिया, जो नेपाल मूल के थे। वो अब नेपाल के शिविरों में जैसे-तैसे गुजर कर रहे हैं। मगर भूटान ने अपने सूक्षमता और खासियत के साथ कम से कम अपने लिए खुशी का एक वाजिब उद्देश्य चुना है।

हमारे संविधान की रचना ऐसे निरंकुश पूंजीवाद की मांगे पूरी करने के लिए नहीं हुई थी कि जिसमें लोगों को हर कीमत पर एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करना सिखाया जाए। पूंजीवादी नजरिए से देखें तो प्रतिस्पर्धा सही है। मगर क्या इससे वाकई हमें सामाजिक खुशी मिलती है। गणतंत्र के 61वें साल में हमें यह पूछना होगा कि हमारे संविधान की रचना क्यों हुई थी? यकीनन इसका मकसद व्यक्तिगत और सामूहिक खुशी हासिल कराना था।

अगर हम अपने संविधान के मूल स्वरूप को देखें तो जान जाएंगे कि इसका मकसद बगैर लगाम के जबरदस्त-प्रतिस्पर्धी पूंजीवाद के खेलने का मैदान बनना नहीं था। इसका पहला काम लोकतंत्र को बचाए रखना था। सिर्फ रुपये और ताकत वाला लोकतंत्र नहीं बल्कि ऐसा जिसमें लोगों को सम्मान और शांति के साथ चुना जाए। मगर हमारी चिंता सिर्फ चुनावी लोकतंत्र की नहीं बल्कि अभिव्यक्ति और चर्चा की स्वतंत्रता के अधिकार की भी है। मगर हम उसे भी खोते जा रहे हैं। चित्रकार हुसैन को जान से मारने की धमकी मिलती है। शिवाजी पर लिखी गई एक किताब, भंडारकर लाइब्रेरी में तोड़फोड़ का कारण बन जाती है।

खुश्बू के शादी से पहले सैक्स के बारे में चर्चा करने रोक लगा दी जाती है। सिनेमाघर बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि ठाकरे परिवार को फिल्म पसंद नहीं आती। सच है, अदालतें आगे आती हैं। मगर एक सच्चा लोकतंत्र हर चीज को लागू करने के लिए अदालत के दखल देने का इंतजार नहीं करता। अदालत आखिरी चारा होना चाहिए। लेकिन जब लोग गैर लोकतांत्रिक हो जाते हैं, अदालतें लोकतांत्रिक ताकतों को और बल देने के लिए आगे आती हैं। भारत को कोर्ट प्रायोजित लोकतंत्र से कहीं ज्यादा होना चाहिए।

हमारे संविधान का दूसरा मकसद भाईचारा और गुणवत्ता था। बाबा साहेब अंबेडकर ने इस बारे में संविधान सभा को चेताया था। जो उन्होंने कहा था मैं वो बताता हूं क्योंकि अक्सर हम उसकी उपेक्षा करते हैं। उन्होंने कहा था, ‘26 जनवरी, 1950 को हम मतभेदों भरे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी और सामाजिक व आर्थिक जीवन में असमानता। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य के सिद्धांत को जानेंगे। सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य के सिद्धांत की दरकिनार करेंगे, जिसकी वजह होगा हमारा सामाजिक और आर्थिक ढांचा। कितने समय तक हम लोग मतभेदों भरा जीवन जिएंगे। कितने दिन तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को दरकिनार करते चलेंगे। अगर हम लंबे समय तक असमानता को दरकिनार करते रहे तो हम ऐसा अपने राजनीतिक लोकतंत्र को संकट में डालकर करेंगे। हमें इन मतभेदों को जितना हो सके उतनी जल्दी खत्म करना होगा वरना जो लोग असमानता के शिकार हैं राजनीतिक लोकतंत्र उस ढांचे को उखाड़ फेंकेंगे, जिसे इस सभा ने बड़ी मेहनत से बनाया है।’

बाबा साहेब पूरी तरह से सही थे। भारतीय संविधान के मतभेद बढ़ गए हैं। वादों के बाद वादे तोड़े गए हैं। भाईचारा नहीं रहा। यह सब प्यार से जुड़ा है। जीसस ने इसे सीधे से शब्दों में कहा था, ‘अपने पड़ोसी को ऐसे प्यार करो, जैसे खुद से करते हो।’ मगर आज प्यार के गीत की जगह नफरत और शोषण के नारों ने ले ली है। अब भारत शेषण पर फल-फूल रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत सस्ती मजदूरी और बेरोजगारों की फौज को अपनी प्रतिस्पर्धा करने के औजार के रूप में देखता है। जो कि अब वियतनाम, कंबोडिया और दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर खिसक रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया के जानलेवा खेत अच्छे कारखाने बन गए हैं। आज की हमारी अर्थव्यवस्था सामाजिक न्याय की ओर नहीं जा रही।

हमारे संविधान का तीसरा उद्देश्य है कानून की सत्ता। मगर चीजें कानून के हिसाब से नहीं हो रहीं। यह बात सही है कि अगर कुछ भी कानून के हिसाब से नहीं होगा तो अंतरराष्ट्रीय कानून और नीतियों के तहत भारत को ‘असफल देश’ (फेल्ड स्टेट) बुलाया जाएगा। मगर सौभाग्य से कानून की सत्ता भारत में अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। हम पूरी तरह से अव्यवस्था के हवाले नहीं हुए हैं, हालांकि कभी-कभी ऐसा लगता है। कुछ जगह, पुलिस खुद कानून है। सालवा जुडूम ने नक्सलियों से लड़ने के लिए बच्चों की निजी सेना को भेजा। मगर न्याय तंत्र भी हैं जो चुप नहीं है। यहां बड़ी चूक हैं। किसने जेसिका लाल की हत्या की? किसने आरुषि का कत्ल किया? क्या बिनायक सेन पर केस गलत था? बांदा रेप केस, गुजरात दंगे और ऐसे तमाम मामले असहज न्याय के उदाहरण हैं। इंसाफ मिलने में वर्षों गुजर जाते हैं। जब उन्हें दया करनी चाहिए तब लोग फांसी की सजा के लिए तरसते हैं। यह बेहद जरूरी है कि न्याय तंत्र को पूरी तरह सुधारना होगा।
 कुछ जज अच्छे हैं। मगर बेईमानी न्यायिक तंत्र में घुस चुकी है। हम नहीं जानते इसका पर्दाफाश कैसे करें। जब लोग इस बारे में बात करते हैं, उन्हें अवमानना का नोटिस जारी कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट में ऐसे भी जज हैं जो ऐसा मानते हैं कि उन्हें सुनवाई किए बगैर केस का निपटारा कर देना चाहिए। ऐसे एक जज हैं, न्यायमूर्ति काटजू जिनकी कोर्ट एक ऐसी जगह है जहां वह वकीलों पर फब्तियां कसते हैं। यह ऐसी कोर्ट है, जिसमें सम्मान की कमी है। इसे उस गंभीरता से नहीं लिया जाता, जिसकी अपेक्षा है। न्याय तंत्र का मतलब ही क्या रह जाता है जब लोग किसी पेरशान करने वाले जज के रिटायर होने का इंतजार कर रहे हों? मगर वो ऐसे समझदार जज हैं, जिन्होंने न्याय को रंगमंच में तब्दील कर दिया है। मगर वह ईमानदार हैं। कई जज नहीं हैं।

संविधान का चौथा उद्देश्य सभी वर्गों और पूरे भारत में शांति और अखंडता है। जब हम महान अशोक की बात करते हैं तो इतिहास की किताबें कहती हैं कि उसकी मजबूत संप्रभुता ने शांति कायम की थी। आज भारत में ऐसा नहीं है। हमने उन समुदायों के बीच शांति का सृजन नहीं किया जो नफरत और शक की खुराक पर पले-बढ़े हैं। भारत की सीमाओं पर भी शांति नहीं है। हमने ज्यादा राज्यों की स्थापना के लिए संघीय प्रणाली का इस्तेमाल किया है। यह अच्छी बात रही। मगर संघर्ष की कीमत पर शांति नागवार है। हमारी सीमाएं विवाद के घेरे में हैं।

अब भविष्य की ओर देखते हैं। हमारे संविधान की परीक्षा हो चुकी है। हमें तानाशाही की कोई चुनौती नहीं है। श्रीमती गांधी जैसे आपातकाल की स्थिति भी दोहराने वाली नहीं है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि हम आज भी हताश और झुंझलाहट से भरे लोगों वाले भुरभुरे लोकतंत्र हैं। जैसे-जैसे दुनिया में भारत के सितारे बुलंद होंगे, भारत और मुकाम हासिल करेगा। मगर दुनिया में अपनी पहचान बनाने की हसरत में हम उस प्यार और सम्मान को अनदेखा कर सकते हैं, जो हमारे लोगों को मिलना चाहिए।
यही हमारे संवैधानिक उद्देश्यों का मतलब है: सबके लिए प्यार और आदर।

 
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