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रक्तदान किया तो 90 की उम्र में भी रह सकते हैं सेहतमंद

नयी दिल्ली First Published:17-02-2017 12:24:07 AMLast Updated:17-02-2017 07:49:55 AM
रक्तदान किया तो 90 की उम्र में भी रह सकते हैं सेहतमंद

हमारा खून का कतरा-कतरा जहां कई मौतों को रोकता है वहीं यह हमारे तन-मन को ढलती उम्र में भी ‘सुंदर’ बनाए रखने में मदद करता है। इसके जीते जागते उदाहरण दक्षिण अफ्रीका के 90 वर्षीय मॉरिस क्रेसविक और अमेरिका के हाँराल्ड मेनडेनहाल (88) हैं जो इस ‘महादान’ की वजह से अपने हम उम्रों के मुकाबले बहुत सेहतमंद और खुशहाल जिन्दगी बिता रहे हैं।

रक्तदान हृदयाघात और कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों से बचाव में कारगर होने के साथ-साथ मोटापे से भी मुक्ति दिलाने में सहायक है। अब तक कई लीटर खून दान करने वाले दक्षिण अफ्रीका के क्रेसविक और अमेरिका के फ्लोरिडा के मेनडेनहाल आज भी तंदुरुस्त हैं तथा उन्हें एक भी दवा की जरूरत नहीं है।

दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में बेहद खूबसूरत ओल्ड होम“ईल्फिन लॉज रिटायरमेंट विलेज” में रह रहे क्रेसविक 18 साल की उम्र में सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गये थे। किसी अजनबी के खून से नयी जिन्दगी पाने वाले क्रेसविक ने अपने शरीर के पोर-पोर में महक रहे ‘लाल गुलाब’ से कई जिंदगियों में खुशबू और रंग भरने का व्रत लिया और मन की खूबसूरती की मिसाल पेश करते हुए अपने जैसे हजारों चेहरों के लिए आदर्श बनें। अबतक 413 पाइंट्स यानी 195़ 4 लीटर रक्त दान करने वाले क्रेसविक को नियमित रूप से सर्वाधिक खून देने वाले व्यक्ति के रूप में वर्ष 2010 में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में शामिल किया गया। लंबे समय तक खुशमिजाज और स्वस्थ बने रहने का राज क्रेसविक इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, “खून का कतरा-कतरा अहमियत रखता है। आप यह देखकर अचंभित रह जायेंगे कि एक यूनिट खून से क्या हासिल किया जा सकता है। मौके पर पहुंच कर मौत को मात देने वाले खून की यह खूबी मेरे स्वस्थ मन का राज है और धूम्रपान से दूरी मेरी सेहत का मंत्र।” कैंसर से पत्नी फ्रैनकी की मौत के बाद सदमे से उबरने के लिए मेनडेनहाल 07 जुलाई 1977 से रक्त दान कर रहे हैं।

जिंदगी के नाजुक मोड़ पर अपने दो जवान बेटों को भी खोने वाले मेनडेनहाल ने रक्तदान करने से मुंह नहीं मोड़ा। बेहद स्वस्थ मेनडेनहाल अब तक वह 400 गैलन खून दे चुके हैं। उन्होंने तीन मौतों के गहरे सदमे से उबरने के लिए इस पुण्य काम को अपनी जीवन शैली में शामिल किया। वह अधिकतर प्लेटलेट्स दान देने देते हैं। वह अभी भी प्लेटलेट्स के माध्यम से हर साल छह गैलन खून देकर कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे कई लोगों की मदद कर रहे हैं। मेनडेनहाल के शब्दों में “ईश्वर ने मुझे जो कुछ भी दिया है मैं उसका ऋणी हूं और खून दान देकर उसके प्रति अपना दायित्व निभाने का अदना-सा काम कर रहा हूं। जब तक चलता फिरता रहूंगा, महीने में दो बार ब्लड बैंक जाकर ‘उसका’ शुक्रिया अदा करता रहूंगा।


रेड क्रॉस सोसायटी के संयुक्त सचिव एवं कार्यवाह महासचिव डॉ़ वीर भूषण ने कहा कि चूंकि खून की न तो कोई फैक्ट्री है और न ही इसे किसी से जबरदस्ती लिया जा सकता है। थैलेसीमिया, कैंसर ,सड़क हादसे एवं बड़े ऑपरेशन जैसी कई परिस्थितियों में समय पर खून देकर मरीजों की जान बचायी जाती है। हर देश में आबादी के एक प्रतिशत खून की आवश्यकता होती है। हमारे यहां करीब 30 लाख यूनिट खून की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानक के तहत भारत में सालाना एक करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत है लेकिन 75 लाख यूनिट ही उपलब्ध हो पाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार देश में कुल रक्तदान का केवल 59 फीसदी स्वैच्छिक होता है। एेसे में आवश्यकता यह है कि इस ‘यज्ञ’ में स्वेच्छा से आहूति देने वालों की संख्या बढ़े और यह तभी संभव है जब रक्तदान करने के संबंध में व्याप्त भ्रांतियों को दूर किया जाये। इस दिशा में जागरुकता की कमी के कारण हर वर्ष कई मौतें हो रही हैं।”

डॉ़ भूषण ने कहा कि आम तौर पर लोगों में गलत धारणा बनी हुयी है कि रक्तदान से कमजोरी हाेती है और एचबी का स्तर कम होने समेत कई परेशानियां होती हैं जबकि सच्चाई इसके उलट है। खून देने के स्वास्थ्य संबंधी कई फायदे तो है हीं, साथ ही नौजवानों में ‘मैचोमैन’ की फीलिंग भी आती है कि वे सामाज के लिए कुछ कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि खून दान करने वाले व्यक्ति में 24 घंटे के अंदर खून की मात्रा सामान्य हो जाती है और उसके एचबी के स्तर में काेई खास अंतर नहीं आता है। तीन माह के अंदर व्यक्ति दोबारा रक्त दे सकता है।

उन्होंने कहा “हमारे शरीर में ‘सिक्वेस्टरेड ब्लड सेल्स’ हैं जो जरूरत पड़ने पर सक्रिय हो जाते हैं और बोन मैरो से भी ब्लड सेल्स बनते हैं। रक्त नहीं निकलने पर वैसे भी 21 दिनों के अंदर रेड ब्लड सेल्स मर जाते हैं और नये बनने लगते हैं। एक तरह से रक्त चक्र का नवीनीकरण हो जाता है। इसके अलावा आयरन के ओवरलोड से होने वाली बीमारियों की आशंका कम हो जाती है। अगर हम रक्तदान को मोटापा कम करने में कारगर होने की बात करें तो आपको जानकर हैरानी होगी कि एक बार रक्तदान करने में हमारी 650 कैलोरी खत्म होती है।”

उन्होंने कहा कि हर दूसरे सेकेंड में किसी न किसी को खून की जरूरत पड़ती है। डॉक्टर, विशेष तौर पर बड़े संस्थानों के, बेहद अनिवार्य परिस्थितियों में किसी मरीज में खून चढ़ाते हैं क्योंकि ‘जीरो विंडो पीरियड रिस्क’वाला कोई भी देश नहीं है। कई बीमारियों का विंडो टाइम लंबा होता है। यानी एचआईवी ,मलेरिया समेत कई संक्रमण ऐसे हैं जो सात से 20 दिनों के बाद जांच में सामने आते हैं। कोई व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित है और उसे भी नहीं मालूम है कि उसे इस तरह का कोई संक्रमण है, ऐसे में यह संक्रमण खून चढ़ाए जाने वाले व्यक्ति में पहुंच जाता है। हमारे देश में हर 10 हजार खून के नमूनों में तीन मामले एचआईवी पॉजिटिव के निकलते हैं।

सफ्दरजंग अस्पताल के प्रोफेसंर एवं कंसलटेंट(सर्जरी) डॉ. चिंतामणि ने कहा कि रक्तदान की बात करने से पहले इसके बारे में आम लोगों को जानना आवश्यक है तभी हम औरों को जिंदगी देने में सहायक और अपने लिए हितकारी हाे सकते हैं। डॉ. चिंतामणि ने कहा “धमनियों, हृदय एवं नसिकाओं में प्रवाहित होने वाले खून के माध्यम से शरीर में पोषण, इलेक्ट्रोलाइट, हार्मोन, विटामिन, एंटीबॉडी, ऊष्मा और ऑक्सीजन पहुँचती है और यह अपशिष्ट तत्व और कार्बन डाई ऑक्साइड को निकालती है। खून संक्रमण से लड़ता है और जख्मों को भरने में मदद करता है। इसकी कमी से हमारी जान चली जाती है। ऐसे में रक्तदान एक तरफ जहां मरते हुए व्यक्ति के लिए “संजीवनी” है वहीं दानकर्ताओं के लिए सबसे बहुमूल्य वस्तु जिसे देकर वह कई जिंदगियां बचा कर आत्मसंतुष्टि के साथ -साथ बेहतर स्वास्थ्य का ‘हकदार’ बन सकता है।

उन्होंने कहा“ हमारे शरीर के वजन का 70 फीसदी खून है। शरीर में किसी भी प्रकार के संक्रमण के खिलाफ पहली अवरोधक श्वेत रक्त कणिकाएं होती हैं। ग्रेनुलोसाइट श्वेत रक्त कणिकाएँ रक्त कोशिकाओं की दीवारों के साथ तैरती हैं और विषाणुओं को नष्ट करती हैं। लाल रक्त कणिकाएं शरीर के अंगों और कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचाती हैं। दो-तीन बूंद खून में करीब एक अरब लाल रक्त कणिकाएं होती हैं। रक्त प्रवाह तंत्र में लाल रक्त कणिकाएँ करीब 120 दिनों तक जिंदा रहती हैं। प्लेटलेट्स खून के जमने में मददगार होते हैं और यह ल्यूकेमिया एवं कैंसर के मरीजों की जिन्दगी में अहम है। इसका 60 फीसदी द्रव्य और40 फीसदी ठोस होता है। द्रव्य यानी प्लाज्मा में 90 प्रतिशत पानी और 10 फीसदी पोषक तत्व, हार्मोन इत्यादि होते हैं। यह भोजन ,दवाओं आदि से काफी जल्दी बन जाता है। लेकिन खून का ठोस हिस्सा, जिसमें आरबीसी, डब्ल्यू बीसी और प्लेटलेट्स होते हैं उसे दोबारा बनने में काफी समय लगता है और यहीं पर स्वेच्छा से रक्तदान करने वालों की अहम भूमिका शुरू होती है। जितना समय एक मरीज को इन तत्वों को वापस पाने में लगता है उसमें उसकी जान जा सकती है। कभी-कभी शरीर इन्हें वापस लाने की स्थिति में भी नहीं रहता। जब तक विज्ञान खून बनाने की तकनीक विकसित नहीं कर लेता तब तक रक्तदान पर टिकी हैं कई जिंदगियां। सिर्फ हम और आप उस व्यक्ति को बचा सकते हैं जिसे खून की जरूरत है।

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