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इनसे सीखें : बेटे को स्कूल से निकाला तो बन गईं शिक्षक

जमशेदपुर First Published:23-09-2016 11:19:04 PMLast Updated:23-09-2016 11:19:04 PM
इनसे सीखें : बेटे को स्कूल से निकाला तो बन गईं शिक्षक

आपके बच्चों को अगर स्लो लर्नर कहकर स्कूल से निकाल दिया जाए तो क्या करेंगे? शायद घबराएंगे, निराश होंगे या फिर अपने बच्चे को मानसिक रूप से कमजोर दिव्यांगों के स्कूल में भर्ती कर देंगे। इन सबसे अलग और अनोखे साहस का परिचय दिया है श्वेता चांद ने।

बेटे को स्लो लर्नर कहकर स्कूल से बाहर किए जाने पर हार मानने के बजाय स्लो लर्नर बच्चों को पढ़ाने का विशेष कोर्स कर विशेषज्ञ शिक्षिका बन गईं।

पति का मिल रहा पूरा सहयोग

अब श्वेता चांद अपने बेटे के साथ ही अन्य तीन स्लो लर्नर बच्चों को भी अपने बिष्टूपुर स्थित घर पर नि:शुल्क पढ़ाती हैं। शहर के बड़े निजी स्कूलों में पढ़ने वाले तीन अन्य बच्चे भी इनके पास पढ़ने आते हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के साथ ही काउंसिलिंग के जरिये उनमें आत्मविश्वास भरने का काम भी श्वेता करती हैं। इसमें श्वेता को पति रोहित चांद का पूरा सहयोग मिलता है।

बेहतर मार्गदर्शन की जरूरत

श्वेता चांद का कहना है कि स्लो लर्नर बच्चे भले ही पढ़ाई में कमजोर होते हैं, पर वे अन्य क्षेत्रों में काफी अच्छा कर सकते हैं। भले ही इनका गणित और भौतिकी कमजोर हो पर ये बच्चे गीत, संगीत और खेलकूद में बेहतर करने का साहस रखते हैं। इन्हें दयाभाव की नहीं, बल्कि बेहतर मार्गदर्शन की जरूरत होती है। इन बच्चों को जीवन के कामकाज और पब्लिक डिलिंग की जानकारी देनी महत्वपूर्ण है।

मदद की उम्मीद

श्वेता चांद का कहना है कि टाटा स्टील या जुस्को की मदद मिले तो वे अन्य स्लो लर्नर बच्चों को भी पढ़ा सकती हैं। इसके लिए बेहतर आधारभूत संरचना और कुछ शिक्षकों की मदद की आवश्यकता है। श्वेता के अनुसार सभी बच्चों में विशेष गुण होते हैं। स्लो लर्नर बच्चों को अलग तरीके से पढ़ाना होता है। इन पर थोड़ा ज्यादा ध्यान देना पड़ता है। आमतौर पर स्कूलों में ज्यादा तेज बच्चों को निखारा जाता है, पर इन्हें छोड़ दिया जाता है। इन बच्चों को पढ़ाने का तरीका अलग है। सही मार्गदर्शन पर ये सामान्य बच्चों की तरह बेहतर कर सकते हैं।

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