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छुट्टियां खत्म

महापुरुषों की जयंती और निर्वाण दिवस पर छुट्टियां खत्म करने का योगी सरकार का फैसला सुखद है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से राज्य का प्रबुद्ध वर्ग इसकी आशा संजोए था। महापुरुषों के जन्म/निर्वाण दिवस पर स्कूलों/कार्यालयों में उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालकर उनकी गौरवगाथा नई पीढ़ी को बताई जानी चाहिए, ताकि वह उनके बताए मार्ग का अनुसरण कर सके। सच्चाई यह भी थी कि अब इस तरह के अवकाश राजनीतिक निहितार्थों के कारण होने लगे थे। महापुरुषों को जातियों के खेमे में बांटकर वोट बैंक की घटिया राजनीति शुरू हो गई थी। महापुरुष तो समूचे राष्ट्र व मानवता के लिए जन्म लेते हैं, मगर राजनीतिक दल ढूंढ़-ढूंढ़कर उनकी जातियां खोज रहे थे। अब होना यह चाहिए कि उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर एक-दो घंटे अधिक कार्य करके हम उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करें।
मनोज कुमार शर्मा, स्याना

भाषा की गुलामी
‘शिखर से हिंदी’ संपादकीय पढ़कर ऐसा लगा कि मानो अब हिंदी के उज्ज्वल भविष्य के द्वार खुल जाएंगे। मुश्किल यह नहीं है कि जन-प्रतिनिधि दिल से किसी कार्य को कितना अपनाते हैं। संकट यह है कि हर गली-मोहल्ले में उगने वाले अंग्रेजी माध्यम के स्कूल, निजी और सरकारी अधिष्ठानों के अधिकारियों का अंग्रेजी के प्रति मोह, हिंदी भाषियों से अंग्रेजी में ही पत्र व्यवहार-बातचीत करके खुद को सभ्य-सम्मानजनक मानने की मानसिकता, और अंग्रेजीदां सोच के बंधन से हम कब मुक्त होंगे? भाषिक गुलामी से हमें अपने देश को बचाना होगा।
भगवती प्रसाद गेहलोत,  मध्य प्रदेश

हिंदी का सम्मान 
हमारे देश की मातृभाषा हिंदी है। मगर देश के आजाद होने के इतने बरसों के बाद भी हम सभी अंग्रेजी के आकर्षण में फंसे हैं। ज्यादातर नेता, अभिनेता, और मशहूर लोग अंग्रेजी में बोलना पसंद करते हैं। ऐसा माहौल बना हुआ है कि हिंदी में बोलने, लिखने वाले को पिछड़ा मान लिया जाता है, और अंग्रेजी में बोलने वाला प्रभावशाली। मगर अब आधिकारिक भाषाओं को लेकर बनी संसदीय समिति की इस सिफारिश को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने स्वीकार कर लिया है, जिसमें कहा गया है कि अगर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत मंत्री व अधिकारीगण हिंदी बोल और पढ़ सकते हैं, तो उन्हें हिंदी में ही भाषण देना चाहिए। हम उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले दिनों में लोग हिंदी में भाषण देंगे, तो अपनी मातृभाषा का गौरव बढ़ाएंगे।
बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

जेनेरिक दवाओं के पक्ष में
प्रधानमंत्री का दवाओं पर कानून बनाने का निर्णय वास्तव में सराहनीय है। देश में अधिकांश लोग महंगी दवाओं के कारण उचित इलाज नहीं करा पाते, जिसके चलते बहुत से रोगियों की मौत हो जाती है। हमारे यहां डॉक्टर को भगवान का रूप माना जाता है, लेकिन अब वे अपना नैतिक कर्तव्य भूल गए हैं, इसलिए महंगी-महंगी दवाएं लिखते हैं। इससे मरीजों का शोषण हो रहा है और अनावश्यक उसका आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। कानूनन अगर इस समस्या का समाधान निकल आता है, तो यह लोकहित में बहुत बड़ा कदम होगा। वास्तव में जेनेरिक दवाइयां बहुत सस्ती और कारगर होती हैं।
शरद कुमार, बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश

देश का अपमान 
स्नैपचैट की रेटिंग गिराकर और अपने मोबाइल से इसे अन-इंस्टॉल करके भारतीयों ने स्नैपचैट के सीईओ को बड़ा झटका दिया है। देश का अपमान करने वालों को तुरंत सबक सिखाना जरूरी है। भारत को ‘गरीब’ मानने वाले लोगों को समझना होगा कि भारत सहनशील मुल्क है, जो विकास के मामले में अपेक्षाकृत ‘गरीब’ होकर भी उदारता के मामले में तमाम देशों से अमीर है। इसलिए देश के खिलाफ बक-बक करना बंद करें। 
अर्पिता पाठक

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