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जमीन से जुड़े लोगों का आसमान

चार साल से भी ज्यादा वक्त गुजर चुका है, जब मैं मुजफ्फरपुर के राकेश कुमार से मिला था। वह एक वर्कशॉप में मौजूद थे, जिसे हमने करीब 50 गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के लिए बिहार के इस शहर में आयोजित किया था। विनीत स्वभाव के राकेश मुझसे बड़े अदब के साथ मिलने आए और अपनी भोजपुरी जबान में मुझसे पूछा कि क्या आपका संगठन मेरे एनजीओ की वेबसाइट बनाने में मदद करेगा? उनके एनजीओ का नाम ‘जन निर्माण केंद्र’ है। जाहिर है, हमारे वर्कशॉप करने का मकसद ही यही था, इसलिए मैंने तपाक से जवाब दिया- हां। उनका अगला सवाल था- ‘इस काम में कितना वक्त लगेगा?’ दरअसल, वह सोच रहे थे कि इसमें महीनों लगेंगे। मैंने उनसे कहा कि अगर वह अपने संगठन से जुड़ी सामग्री और तस्वीरें मुहैया करा दें, तो एक हफ्ते में उनकी वेबसाइट तैयार हो जाएगी। राकेश ने अपनी वेबसाइट का नाम चुना- जननिर्माणराकेश डॉट ओआरजी।

एक साल बाद राकेश का फोन आया और उन्होंने कहा कि वह दूसरे 50 गैर-सरकारी संगठनों की एक वर्कशॉप आयोजित करना चाहते हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी-अपनी वेबसाइट बनाने के लिए प्रोत्साहित किया है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘मैं अपने एनजीओ की वेबसाइट को बदलकर जेएनकेबिहार डॉट ओआरजी करना चाहता हूं, क्योंकि हमारा काम पूरे बिहार पर केंद्रित है।’ आज उनके एनजीओ का ठिकाना है जेएनकेइंडिया डॉट ओआरजी। यह वेबसाइट तमाम गैर-सरकारी संगठनों की सालाना रिपोर्टों, निदेशक मंडल के सदस्यों के नाम और दूसरी तमाम गतिविधियों को अपडेट करती है, साथ ही उनकी तस्वीरें भी प्रकाशित-प्रसारित करती है।

राकेश का सोशल मीडिया पर एक पेज भी है, जिस पर वह अपने संगठन के सदस्यों द्वारा खेतों में उतारी गई तस्वीरें साझा करते हैं। सोशल मीडिया की कुछ टिप्पणियां उन्हें मिले लगभग नए बीजों से जुड़ी हुई हैं, जिन्हें वे संरक्षित करना चाहते हैं। जेएनके ने हमारे लिए कई वर्कशॉप का आयोजन किया है और बिहार के 100 से ज्यादा गैर-सरकारी संगठनों की ऑनलाइन बनने में मदद की है। वेब उपस्थिति से आगे इसका प्रभाव डिजिटल साक्षरता के लिहाज से काफी व्यापक व व्यावहारिक रूप में पड़ता है और इस तरह यह सोशल मीडिया की पहुंच की सीमा से भी आगे निकल जाता है। इन सबसे उनके काम के प्रति काफी इज्जत बढ़ी है। इसके कारण उन्हें और ज्यादा काम मिल रहा है, अधिक वित्तीय मदद मिल रही है व लोकल गवर्नेन्स में भागीदारी का मौका भी मिल रहा है।

एक और उदाहरण पर गौर कीजिए। हैदराबाद के स्लमनुमा भीड़ भरे इलाके में एक गैर-लाभकारी संगठन है- सफा। मैं इसकी संस्थापिका रुबीना मजहर को तब से जानता हूं, जब यह संस्था औपचारिक रूप से शुरू भी नहीं हुई थी। मैंने उनसे कहा था कि जैसे ही वह अपनी संस्था का पंजीकरण कराएंगी, हम उसकी ऑनलाइन मौजूदगी में उनकी मदद करेंगे। पंजीकरण कराने से पहले ही यह संस्था हैदराबाद की एक बस्ती की महिलाओं को तालीमयाफ्ता बनाने और उनके रोजगार के मौके तलाशने की दिशा में काम करने लगी थी। रुबीना मजहर और उनके साथियों को काफी मशक्कत करनी पड़ी, न सिर्फ उन हदों को तोड़ने के लिए, जो औरतों को घर से बाहर निकलने और बुनियादी तालीम हासिल करने से रोकती रही हैं, बल्कि इन सबके लिए उनको कहीं से कोई माली मदद भी नहीं पा रही थी।

बहरहाल, मजहर संगठन की गतिविधियों और मकसद को ऑनलाइन करने के लिए आगे आईं, और चंद महीनों के भीतर ही उनको उनके संगठन में काम करने के इच्छुक दुनिया भर के वोलंटियर मिल गए। ब्रिटेन के एक शख्स से उन्हें माली इमदाद भी मिल गई। आज बस्ती में सफा की न केवल सम्मानित छवि है, बल्कि इसने बड़ी तादाद में औरतों को आकर्षित किया है। इसने दस्तकारी और कपडे़ का एक स्थायी कारोबार खड़ा किया है और एक वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर की भी स्थापना की है, जहां से तमाम युवतियां ‘इंग्लिश स्पीकिंग’ और ‘इंटरनेट ऐंड कम्युनिकेशन’ (आईसीटी) का गहन प्रशिक्षण लेती हैं। सफा के उत्पाद अब ऑनलाइन भी मौजूद हैं।

गैर-सरकारी संगठनों के ऑनलाइन होने का सबसे दिलचस्प फायदा यह है कि इनका असर कई गुना विस्तार वाला है। एक ऐसे वातावरण में, जहां एनजीओ की पारदर्शिता और जवाबदेही अक्सर सवालों के घेरे में रहती हो, इन संगठनों द्वारा अपनी एक-एक चीज और गतिविधि को ऑनलाइन साझा करने से इन्हें लेकर पलने वाली आशंकाओं की धुंध छंटेगी। दूसरी बात, वेबसाइट शुरू करने की प्रक्रिया में एक एनजीओ डिजिटल साक्षर बनता है। इस प्रक्रिया में वे डिजिटल उपकरणों, कंप्यूटरों, ऑनलाइन शब्द-जाल, इंटरनेट की टेक्नोलॉजी और मीडिया, सोशल मीडिया के बारीक फर्क, अपलोडिंग और डाउनलोडिंग, फोटोग्राफी, डिजिटल स्कैनिंग के बारे में और ई-मेल का इस्तेमाल करना सीखते हैं। हमारा अनुभव कहता है कि एक एनजीओ ऑनलाइन होता है, तो कम से कम 50 दूसरे लोग डिजिटल साक्षर बनते हैं। इनमें उनके कर्मचारी, साझीदार और आसपास के लोग शामिल हैं। इसके अलावा, पांच से दस प्रतिशत एनजीओ अगले चरण के डिजिटलीकरण की ओर भी कदम बढ़ाते हैं।

लगभग 5,000 एनजीओ को हमने ऑनलाइन होने में मदद की है, उनमें से कई ने सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है और उन्होंने इसके जरिये आर्थिक मदद भी प्राप्त की, अपने उत्पादों को बेचने के लिए ई-कॉमर्स का इस्तेमाल भी किया, कंप्यूटर सेंटर भी स्थापित किए और इन सबसे बढ़कर अपने प्रचार के लिए विभिन्न डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों का इस्तेमाल किया।

एनजीओ के ऑनलाइन होने का तीसरा बड़ा फायदा यह हो रहा है कि इससे सूचना की दरिद्रता से देश को उबरने में मदद मिल रही है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री के मामले में भारत दुनिया का काफी गरीब देश है। पश्चिमी देशों के मुकाबले इंटरनेट पर भारतीय सामग्री बहुत ही कम है। सरकार और औद्योगिक कंपनियों के अलावा एनजीओ विशाल संस्थागत संगठन हो सकते हैं, जो अपनी गतिविधियों और अपने पास उपलब्ध सामग्रियों को ऑनलाइन कर सकें। यह न सिर्फ इंटरनेट को प्रासंगिक भारतीय सामग्रियों से समृद्ध करेगा, बल्कि ये सामग्रियां विश्वसनीय भी होंगी, और विभिन्न समुदायों के बारे में भी होंगी। 

आज अगर हमारे देश के छह लाख एनजीओ भी ऑनलाइन हो जाएं, तो इससे करीब तीन करोड़ लोगों को डिजिटल साक्षर बनने में मदद मिल सकती है और फिर यह प्रक्रिया विशाल समुदाय को उनके बुनियादी अधिकारों का फायदा उठाने तक ले जाएगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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