class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सोनिया की राजनीतिक यात्रा के पड़ाव

तमाम सियासी किरदारों का अंत नाकामी के साथ होता है। ब्रिटिश राजनेता और लेखक एनो पॉवेल की इस पंक्ति का हम लेखक अक्सर जिक्र करते हैं। इस पंक्ति का अर्थ यह है कि खुशनुमा वक्त पर यदि राजनेता अपना सियासी करियर नहीं छोड़ता, तो उसका अंत नाकामी के साथ ही होता है, क्योंकि यही राजनीति का दस्तूर है और मानव की प्रकृति भी।

पॉवेल की यह पंक्ति हमारे चार प्रधानमंत्रियों पर बखूबी लागू होती है- जवाहरलाल नेहरू, पी वी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह। इन चारों प्रधानमंत्रियों के नाम उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज हैं। नेहरू ने जहां 1947 में बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश को एक वैज्ञानिक और तकनीकी आधार दिया, वहीं नरसिंह राव ने आर्थिक उदारीकरण की राह आसान बनाई और एक नई बहुस्तरीय विदेश नीति का आगाज किया। कभी करिश्माई विपक्षी नेता रहे वाजपेयी ने जहां पहली गैर-कांग्रेसी सरकार की सफल अगुवाई की, वहीं मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री मजबूत आर्थिक विकास का एक दशक जिया। बावजूद इसके इन सभी नेताओं का सियासी जीवन विफलता के साथ खत्म हुआ। जवाहरलाल नेहरू पर चीन युद्ध की छाया रही, तो नरसिंह राव एक तरह से अपनी पार्टी द्वारा ही निकाल बाहर किए गए। अटल बिहारी वाजपेयी को भी उस चुनाव में मात मिली, जिसे वह आसानी से जीत सकते थे, और मनमोहन सिंह की चमक उनके अपने मंत्रियों के भ्रष्टाचार के कारण धूमिल हो गई।

सोनिया गांधी बेशक कभी प्रधानमंत्री नहीं रहीं, मगर पूरे दस साल तक वह भारत की सबसे सशक्त राजनेता रही हैं। हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद अब वह अपने राजनीतिक जीवन के हाशिये पर चली गई हैं। इन चुनावों में देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी को शर्मनाक पराजय मिली है। यह वह राज्य है, जहां पर सोनिया गांधी खुद और उनके परिवार के तमाम लोग चुनाव लड़ते व जीतते रहे हैं।

आज करीब 20 वर्ष होने को आए हैं, जब सोनिया गांधी ने राजनीति में कदम रखा था; वह भी कांग्रेस अध्यक्ष जैसे एक शीर्ष पद के साथ। शुरू-शुरू में कुछ लोगों ने ही उन्हें गंभीरता से लिया। वह भी ‘गूंगी गुड़िया’ कहकर खारिज कर दी गई थीं, जो उपमा 1967 में अप्रत्याशित तरीके से प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी को दी गई थी। दूसरी ‘मिसेज गांधी’ वक्ता भी सामान्य थीं। उनकी हिंदी उनके इतालवी मूल के होने की गवाही देती थी। बावजूद इसके वह लोगों को अपनी ओर खींचने में सफल रहीं। उनके खिलाफ आलोचना के तमाम सुर तब प्रशंसा में बदल गए, जब कर्नाटक, राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस को सफलता मिली।

सोनिया गांधी की शुरुआती सफलता के तीन कारण थे। पहला, उनके प्रति लोगों की एक स्वाभाविक सहानुभूति थी। वे मानते थे कि अपनी सास और पति को खोने के बाद भी तमाम त्रासदियों को पीछे छोड़ते हुए इस महिला ने भारतीय राजनीति की एक मुश्किल, प्रतिकूल और निर्मम दुनिया में कदम रखा है। दूसरा कारण यह था कि सोनिया के कांग्रेस अध्यक्ष बनते समय नेहरू-गांधी नाम की चमक बरकरार थी। कुछ वोटर तब भी नेहरू को याद किया करते थे, जबकि कई दूसरे इंदिरा और राजीव के गुण गाते थे। और तीसरी वजह खुद सोनिया गांधी थीं, जो बेहद मेहनती थीं। उन्होंने देश के तमाम राज्यों के दौरा किया और दिन-रात अभियान चलाया। दिल्ली में भी वह पार्टी कार्यकर्ताओं से बैठकें करती रहीं।

सोनिया गांधी की इसी लगन के कारण साल 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को अप्रत्याशित सफलता मिली। पांच साल बाद हुए दूसरे आम चुनाव में भी उन्हें आसान जीत मिली और कांग्रेस व यूपीए, दोनों की सीटें बढ़ीं। भारतीय मीडिया दरअसल किसी भी शख्स के सियासी करियर को चुनावी सफलता के संकीर्ण चश्मे से देखता है। सोनिया गांधी इस मामले में सियासत के अपने पहले दशक में खूब सफल रहीं। हालांकि उनका योगदान जन-हितकारी कामों में भी खासा रहा; जैसे कि सूचना का अधिकार और मनरेगा में उनकी काफी सक्रिय सहभागिता थी।

भारतीय राजनीति में सोनिया गांधी की सफलता अप्रत्याशित रही। साल 2009 वास्तव में उनके करियर का शीर्ष-बिंदु था, जिसके बाद धीरे-धीरे वह ढलान की ओर बढ़ने लगीं। राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े घोटाले और दूरसंचार व खनन अधिकारों से जुड़े भ्रष्टाचार ने इस फिसलन को बढ़ाया। कभी आश्चर्य और रहस्य की नजरों से देखी जाने वाली उनकी चुप्पी भी तब तक बुरे कामों में उनकी सहभागिता का संकेत समझी जाने लगी। फिर 2013-14 में नरेंद्र मोदी का प्रभावशाली और विजयी चुनावी अभियान शुरू हुआ, जिसकी वजह से कांग्रेस सिमटकर 44 सीटों पर आ गई। उसके बाद तो मानो पार्टी की हार का सिलसिला ही चल पड़ा, जो अब उत्तर प्रदेश में सबसे निम्नतम बिंदु पर आ गया है।

राजनीतिक उदय की तरह ही सोनिया गांधी के सियासी ढलान की भी कई वजहें हैं। पहला कारण तो यही है कि उन्होंने पार्टी में फिर से ‘हाईकमान’ संस्कृति पैदा की, जिसमें बडे़ क्षेत्रीय नेताओं और मुख्यमंत्रियों की बजाय नई दिल्ली में अध्यक्ष के सलाहकारों पर ज्यादा भरोसा किया जाने लगा। बाद में यह प्रक्रिया आगे बढ़ी और ‘कांग्रेस के प्रथम परिवार’ की उपासना में बदल गई। बेशक सोनिया गांधी आज भी सांसद और पार्टी की अध्यक्ष हैं, मगर अब वह शायद ही कभी भारतीय राजनीति में अपना वह खास मुकाम हासिल कर सकेंगी। दिलचस्प यह है कि उनका सियासी सफर उनके परिवार की ही तीन शख्सियतों से खूब मेल खा रहा है। इनमें पहले हैं नेहरू, जिन्होंने वर्षों तक सियासी सफलता का स्वाद चखा, मगर 1959 से उनके सितारे गर्दिश में जाने लगे। इंदिरा गांधी भी 1969 और 1975 के दरम्यान देश भर की चहेती रहीं, लेकिन आपातकाल के बाद से उनकी आभा कमजोर होने लगी थी। और तीसरे शख्स सोनिया के पति राजीव गांधी हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरुआती वर्षों में अलगाववादियों के साथ समझौता करके और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देकर लोगों का दिल जीता, मगर बाद में उन पर कट्टरपंथियों के तुष्टीकरण और बोफोर्स घोटाले के दाग लगे। देखा जाए, तो सोनिया गांधी का सियासी जीवन इन्हीं सबका आईना है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:sonias political journey halted
From around the web