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लाल बत्ती की विदाई से कुछ तो जरूर बदलेगा

भारत में लोकतंत्र परिपक्व होता हुआ दिख रहा है। वीआईपी संस्कृति पर करारा चोट करते हुए केंद्र सरकार ने लाल बत्ती की संस्कृति को खत्म करने का एलान किया है। इसके पहले पंजाब के नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने अपने सूबे में लाल बत्ती के इस्तेमाल पर रोक लगाई थी। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह वक्तव्य वाकई उत्साहवर्द्धक है कि हिन्दुस्तान का आम आदमी भी वीआईपी है। लाल बत्ती न केवल आम आदमी को शासन से दूर करती है, बल्कि उसे डराती भी है। 

भारत अंतर्विरोधों से भरा देश है। जहां इस देश में त्याग व बलिदान की परंपरा रही है, वहीं सत्ता की भूख और आडंबरी संस्कृति भी अपरिमित है। प्राचीन भारत में बुद्ध और महावीर साम्राज्य त्यागकर सत्य की खोज में निकल पड़े थे, तो आधुनिक काल में महात्मा गांधी इसके अद्वितीय उदाहरण हैं, जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम का सफल नेतृत्व करके भी सत्ता से अपने को दूर रखा। उन्हीं के पदचिह्नों पर बाद में लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी चले। परंतु गांधी-जेपी के साथ ही त्याग की परंपरा भी समाप्त हो गई। गांधी ने सादा जीवन, उच्च विचार का जो पाठ पढ़ाया था, आज की राजनीति से वह सबक विलुप्त हो चुका है। लाल बत्ती वाली बड़ी गाड़ियां, सुरक्षा कर्मियों की बड़ी फौज, बड़े बंगले आदि सत्ता के वे कंगूरे हैं, जिनको प्राप्त करने के लिए सब उनकी ओर ललचाई नजरों से देखते हैं।
वैसे गड़बडि़यां तो स्वाधीनता के बाद ही प्रारंभ हो गई थीं। 1958 में पटना में बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक की बेटी की शादी में ऐश्वर्य का भारी प्रदर्शन हुआ। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जब इसकी सूचना मिली, तो उन्होंने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह को एक कड़ा पत्र लिखा, ‘दिल्ली में कई शादियां होती हैं और मैंने कुछ धनी व्यक्तियों की फिजूलखर्ची की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है। परंतु मैं दिल्ली के किसी विवाह को नहीं जानता हंू, जिसमें बारात में हाथियों तथा घोड़ों के अलावा 500 कारें थीं।’

लोकतंत्र का अभ्युदय राजतंत्र के विरुद्ध विद्रोह के रूप में हुआ। राजशाही में समाज अमूमन तीन भागों में बंटा होता था, जिसे इस्टेट कहते थे। फ्रांस की क्रांति के पहले वहां तीन स्तंभ थे- पादरियों का, कुलीनों का, और आम आदमी का। थोड़े-बहुत अंतर के साथ सभी देशों में ऐसी ही व्यवस्था थी। राजशाही के पास सारे विशेषाधिकार थे, परंतु पादरियों व कुलीनों को भी कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। आम आदमी हर जगह सबसे निचले पायदान पर होता था, जिसके पास कोई विशेषाधिकार नहीं था।

लोकतंत्र में यही आम आदमी सत्ता की घुरी बना और ऐसा माना गया कि जन-प्रतिनिधियों को सम्मान देना जनता को सम्मान देना है। सांसदों को कुछ विशेषाधिकार दिए गए। पहले सांसद की कोई बात सम्राट को नागवार लगती थी, तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाता था। ब्रिटेन में ऐसा कई बार हुआ। 1376 में स्पीकर पीटर डी ला मेयर को गुड पार्लियामेंट में उसके आचरण के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और जब तक एडवर्ड-तृतीय का शासन रहा, उनको छोड़ा नहीं गया। 1688 की शानदार क्रांति के अगले वर्ष ‘बिल ऑफ राइट्स’ लाया गया, जिसमें सांसदों को संसद में अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की गई, जिसके लिए उन पर किसी अदालत या संसद के बाहर कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इन विशेषाधिकारों को भारत में 1853 के चार्टर एक्ट द्वारा लाया गया, जिनमें 1861, 1892 और 1909 में मामूली संशोधन किए गए।

विडंबना यह है कि धीरे-धीरे इन विशेषाधिकारों व सुविधाओं का विस्तार होता गया और आम आदमी के प्रतिनिधि कुलीन बनकर उनसे कट गए। केंद्र सरकार ने एक सराहनीय कदम उठाते हुए इस कुलीन संस्कृति को खत्म करने की शुरुआत की है। मोटर वाहन अधिनियम-1989 में संशोधन किए जा रहे हैं। नियम 108 (1)(3) को समाप्त किया जा रहा है। इसमें प्रावधान है कि कुछ विशिष्ट व्यक्ति, जिनकी श्रेणी केंद्र व राज्य सरकारें बनाती हैं, अपने वाहनों में लाल बत्ती का इस्तेमाल कर सकते हैं। नियम 108(2) में भी संशोधन किया जा रहा है, जिससे आपातकालीन सेवाएं ही नीली बत्ती का प्रयोग कर पाएंगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि वीआईपी संस्कृति को खत्म करने के लिए सरकार कुछ और ठोस कदम उठाएगी। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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