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सिनेमा से पहले राष्ट्रगान, कुछ सतर्कता जरूरी है

सत्य प्रकाश, लीगल एडीटर, हिन्दुस्तान टाइम्स First Published:01-12-2016 10:40:31 PMLast Updated:01-12-2016 10:40:31 PM

देश के सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान और इस दौरान मौजूद हर इंसान के खड़े रहने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश न्यायिक सक्रियता के उसी उदाहरण की अगली कड़ी है, जिसकी समय-समय पर विभिन्न कारणों से आलोचना होती रही है। इस बात से अहसमत होने का कोई कारण नहीं कि देश के सभी नागरिकों को राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना ही चाहिए। हालांकि अदालत ने राष्ट्रगान के किसी भी रूप में व्यावसायिक और अशालीन इस्तेमाल करने की आशंका पर विराम लगाकर भी उचित ही किया। अदालत ने कहा कि, ‘यह किसी भी नागरिक का मौलिक कर्तव्य है कि वह संविधान में प्रदत्त सिद्धांतों का पालन करेगा। राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना इन्हीं कर्तव्यों में से है।’ लेकिन शायद अदालत इस बार ज्यादा आगे चली गई। अदालती आदेश के अनुसार देश भर के सिनेमाघरों में शो शुरू होने से पहले राष्ट्रगान का प्रदर्शन जरूरी है और इस दौरान मौजूद सभी दर्शकों का खड़े रहना बाध्यकारी होगा।

आदेश के क्रियान्वयन में भी तमाम मुश्किलें हैं। इसका पालन करवाना कानून के रक्षकों के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं होगा। इस बात की पूरी आशंका है कि इस मामले में बड़े पैमाने पर नियम-उल्लंघन दिखाई पड़े और कानून-व्यवस्था के लिए एक नई चुनौती बन जाए, क्योंकि इससे एक तरह का ‘अतिसतर्कतावाद’ बढ़ने का भी खतरा है।

अदालत ने नागरिकों के मौलिक दायित्वों के संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 51-ए का हवाला दिया है, जो कहता है कि ‘यह भारत के हर नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह संविधान व इसके सिद्धांतों-संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करेगा।’ हालांकि इन कर्तव्यों का पालन न होने की स्थिति पर संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। यह पहली बार नहीं है, जब शीर्ष अदालत ने सिनेमाघरों में सरकारी फिल्मों के प्रदर्शन को अनिवार्य करने का आदेश पारित किया है। 1999 में भारत सरकार बनाम मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन के मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय ने सिनेमाघरों में शैक्षणिक, वैज्ञानिक या ताजा घटनाक्रमों पर डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन अनिवार्य बताया था।

शीर्ष अदालत का ताजा आदेश जेहोवा गवाही केस में दिए गए फैसले की भावना से भी अलग है, जिसमें उस संप्रदाय विशेष के स्कूली बच्चों को स्कूल की प्रार्थना सभा के दौरान राष्ट्रगान गाने से छूट दी गई थी, क्योंकि इससे उनकी धार्मिक भावनाओं का हनन होता था। हालांकि राष्ट्रगान के दौरान इसके सम्मान में साथी छात्रों की तरह ही खड़े रहने से उनकी कोई असहमति नहीं थी।
यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि लोग मनोरंजन के लिए सिनेमा देखने जाते हैं, न कि देशभक्ति का पाठ पढ़ने के लिए। जिस तरह राष्ट्रगान की अपनी मर्यादा और गरिमा है, उसी तरह देशभक्ति के प्रदर्शन का हर नागरिक का अपना तरीका है। हर फिल्म का हर शो शुरू होने से पहले राष्ट्रगान और इसके सम्मान में प्रत्येक व्यक्ति के खड़ा होने की बाध्यता कोई दिशा नहीं देती। अब यह मांग भी तार्किक कही जाएगी कि अदालतों की कार्यवाही शुरू होने से पहले वहां भी राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया जाए।

सामूहिक अवसरों पर राष्ट्रगान को लेकर अतीत में तमाम विवाद हुए हैं और इन्हें मर्यादा और गरिमा से जोड़कर देखा गया। कई दशक पहले तक सिनेमाघरों में चलने वाली इस परंपरा के धीरे-धीरे समाप्त हो जाने के पीछे भी ऐसे ही कारण रहे होंगे। इसी वर्ष 20 अक्तूबर को गोवा में व्हीलचेयर पर सिनेमा देख रहे एक व्यक्ति को कुछ ‘अतिसतर्क’ लोगों ने इसलिए पीट दिया था कि वह राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा नहीं हुआ। 2014 में मुंबई में एक विदेशी महिला के साथ भी ऐसी ही अभद्रता की बात थाने तक पहुंची थी, जब वह सिनेमाघर में राष्ट्रगान के दौरान खड़ी नहीं हुई थी। 2015 में उस वक्त भी विवाद हुआ था, जब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के शपथ ग्रहण समारोह में राष्ट्रगान को संक्षिप्त करके प्रस्तुत किया गया। यह राष्ट्रगान का 20 सेकंड का आधिकारिक संक्षिप्तीकरण था, लेकिन इसे केंद्रीय गृह मंत्रालय की नियमावली का उल्लंघन माना गया। राष्ट्रगान के दौरान विवादों का लंबा अतीत है और भविष्य में भी ऐसी आशंकाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

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