Image Loading economy was demolished - Hindustan
रविवार, 26 मार्च, 2017 | 05:09 | IST
Mobile Offers Flipkart Mobiles Snapdeal Mobiles Amazon Mobiles Shopclues Mobiles
खोजें
ब्रेकिंग
  • पढ़ें रात 11 बजे की टॉप खबरें, शुभरात्रि
  • अंकराशि: जानिए कैसा रहेगा आपके लिए 26 मार्च का दिन
  • जरूर पढ़ें: दिनभर की 10 बड़ी रोचक खबरें
  • प्राइम टाइम न्यूज़: पढ़े अबतक की 10 बड़ी खबरें
  • करीना से अपने रिश्ते पर पहली बार बोले शाहिद, 'सबसे बड़ा राज...', यहां पढ़ें बॉलीवुड...
  • हिन्दुस्तान जॉब : 12वीं पास के बच्चों को नौकरी देगा एचसीएल, क्लिक कर पढ़े
  • सीएम बनने के बाद पहली बार गोरखपुर पहुंचे योगी, हुआ भव्य स्वागत, पढ़ें राज्यों से...
  • यूपी सीएम ने कहा, कैलाश मानसरोवर यात्रियों को एक लाख का अनुदान देंगे, पूरी खबर...
  • इलाहाबाद: कौशाम्बी के पिपरी इलाके में छेड़खानी से दुखी बीए की छात्रा ने...
  • कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए 1 लाख रुपये सरकार देगी: सीएम योगी आदित्यनाथ
  • सीएम योगी आदित्य नाथ ने कहा- केंद्र की तरह यूपी में भी विकास को आगे बढ़ाना है
  • टॉप 10 न्यूज़: पढ़े अबतक की देश-विदेश और मनोरंजन की बड़ी खबरें
  • गैजेट-ऑटो अपडेट: पढ़ें अभीतक की 8 बड़ी खबरें
  • जेटली मानहानि मामला: पटियाला हाउस कोर्ट में सीएम अरविंद केजरीवाल और अन्य आप...
  • अभिनेता रजनीकांत ने तमिल समर्थक संगठनों के विरोध के मद्देनजर अपनी श्रीलंका...
  • स्पोर्ट्स अपडेटः 'चाइनामैन' कुलदीप के बारे में Interesting facts. पढ़ें, क्रिकेट की अभी तक...
  • बिहार में बदला मौसम का मिजाज, उत्तर बिहार में आंधी-तूफान, बारिश और ओला वृष्टि से...

फिजूलखर्ची से ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ तमिल पत्रकार First Published:20-03-2017 11:47:17 PMLast Updated:20-03-2017 11:47:17 PM

मध्य वर्ग अपने राज्य के बजट को आमतौर पर नजरंदाज करता है। उसके लिए यह एक सालाना कवायद है, जो उसके रोजमर्रा के जीवन से बहुत ज्यादा वास्ता नहीं रखती। राजनीतिक टिप्पणीकार और मीडिया भी इसे लेकर एक तरह से उदासीन रहते हैं। मगर राज्य के बजट महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये बताते हैं कि सियासी दलों ने चुनाव के दरम्यान जो वादा किया था, उसे वे पूरा कर रहे हैं या नहीं, या फिर अर्थव्यवस्था की सेहत कितनी दुरुस्त है?

तमिलनाडु की बात करें, तो यह सूबा लोक-कल्याणकारी कार्यों में अगुवा रहा है। मानव सूचकांक में यह बेहतर तो है ही, महाराष्ट्र के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी है। इसलिए पड़ोसी राज्यों के लिए यह प्रेरक रहा है। इसी राज्य ने सबसे पहले दोपहर के भोजन की योजना शुरू की थी, जिससे बच्चों के स्कूल छोड़ने की दरें कम हुईं और उनमें प्रवेश बढ़ा। गरीबों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए मुफ्त चावल योजना भी यहां शुरू हुई। यह सूबा मुफ्त स्वास्थ्य बीमा योजनाएं भी देता रहा है।

मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए भी यहां कई लोकप्रिय योजनाएं चलाई गई हैं। जैसे कि मंगलसूत्र के लिए आठ ग्राम सोना देना, महिलाओं को मिक्सर और ग्राइंडर बांटना, और टेलीविजन की मुफ्त सौगात। छात्रों को लैपटॉप और साइकिल देने या फिर लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन मुफ्त बांटने के तर्क में बेशक दम हो सकता है, पर टीवी और मुफ्त केबल कनेक्शन की सौगात गले न उतरने वाली बात ही है। नतीजतन, तमिलनाडु तेजी से अपनी आर्थिक श्रेष्ठता गंवाने लगा है। यह कर्ज के जाल में घिरता जा रहा है। राज्य का राजस्व घाटा साल-दर-साल चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है। इस साल यह घाटा बढ़कर 15,930 करोड़ हो गया है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। इसका अर्थ यह है कि न सिर्फ मौजूदा खर्च के लिए राज्य को उधार लेना होगा, बल्कि नई परिसंपत्तियों के निर्माण या जमीन, भवन जैसी संपत्तियों पर तय पूंजीगत खर्च के लिए भी उसे कर्ज मांगने होंगे।

तमिलनाडु की आर्थिक सेहत अभी इसलिए गंभीर हो गई, क्योंकि शासन-प्रशासन ढर्रे पर नहीं है। 2016 के मध्य में जब जयललिता की सरकार बनी थी, तब भी अर्थव्यवस्था अस्थिर थी, मगर सितंबर में जयललिता के अस्पताल में दाखिल होते ही सूबे की आर्थिक सेहत भी बिगड़ने लगी। अम्मा की मौत और राजनीतिक अस्थिरिता ने रही-सही कसर पूरी कर दी।

पड़ोसी राज्य केरल की हालत भी कोई खास बेहतर नहीं है। इसे अब तक का सबसे अधिक 16,043 करोड़ का राजस्व घाटा हुआ है। आलम यह है कि राज्य की वाम सरकार के पास पूंजीगत व्यय के लिए पैसा नहीं है। तमिलनाडु और केरल, दोनों राज्यों के राजस्व में इसलिए भी तेज गिरावट हुई है, क्योंकि दोनों ने अपने यहां शराब की ब्रिकी पर रोक लगा रखी है।

कर्नाटक की स्थिति थोड़ी बेहतर है, जहां दक्षिण की एकमात्र कांग्रेस सरकार है। इसने 137 करोड़ का राजस्व अधिशेष दिखाया है। मगर मुख्यमंत्री सिद्धरमैया साफ तौर पर दबाव में दिख रहे हैं, क्योंकि उन्हें अगले वर्ष विधानसभा चुनाव का सामना करना है। इसी वजह से उन्होंने सबको खुश करने वाला बजट पेश किया है और पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में चल रहे अम्मा कैंटीन की तर्ज पर ‘नम्मा कैंटीन’ शुरू करने का प्रस्ताव रखा है।

आंध्र प्रदेश में राज्य सरकार ने नई राजधानी अमरावती को बनाने के लिए 1,061 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। अभी यह सूबा 416 करोड़ का राजस्व घाटा झेल रहा है, जिसकी वजह वह दबी जुबान से नोटबंदी को बता रहा है। वैसे मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू नोटबंदी में उम्मीद की किरण देख रहे हैं। उनकी मानें, तो आंध्र प्रदेश डिजिटल लेन-देन को लेकर संजीदा रहा है और नकदहीन अर्थव्यवस्था की राह पर तेजी से बढ़ रहा है।

तेलंगाना की स्थिति काफी बेहतर दिखती है। इसने साल का अंत 4,526 करोड़ के राजस्व अधिशेष के साथ किया है। राज्य के मुखिया चंद्रशेखर राव शायद हैदराबाद में सुखद स्थिति में होंगे, क्योंकि उन पर आंध्र प्रदेश की तरह कोई राजधानी बनाने का दबाव नहीं है। मगर स्वांत: सुखाय की मानसिकता उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है। हाल ही में उन्होंने अपने लिए एक बड़ा बंगला बनवाया है और हर विधायक को एक करोड़ का घर देने की योजना भी बनाई है।

इन तमाम राज्यों ने अपने आर्थिक नुकसान की वजह नोटबंदी को बताई है। तमिलनाडु का यह भी कहना है कि राज्य को बेमौसम बाढ़, वरदा तूफान और अकाल ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। इस कारण सूबे के किसानों के लिए काफी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं और वे आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।

साफ है कि अब राज्यों को अपनी आर्थिक सेहत सुधारने के लिए कुछ नया सोचना होगा। जरूरत ‘कल्याण उन्मुख’ विकास और आर्थिक विकास के कदमताल मिलाने की है। असल में, हमारे यहां बजट भाषणों में बातें बढ़ा-चढ़ाकर कही जाती हैं। बेशक उनमें से कुछ को हासिल किया जा सकता है, मगर असल उद्देश्य शायद ही पूरा हो पाता है। तमाम राज्यों ने भले ही वित्तीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन कानून (एफआरबीएम) पर हस्ताक्षर कर रखे हैं, मगर इसके प्रावधान सामान्य नहीं हैं, इसलिए इसका लक्ष्य नहीं पाया जा सका है। इसमें यह उम्मीद जताई गई थी कि वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन फीसदी लाने और कर्ज व जीडीपी का अनुपात 25 फीसदी से कम रखने का प्रयास राज्य करेंगे। मगर कुछ राज्य इस लक्ष्य से दूर हो चुके हैं, तो कुछ उसी राह पर हैं।
आमतौर पर बजट में खर्च को जहां अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जाता है, वहीं राजस्व को हद से ज्यादा तवज्जो दी जाती है और छोटे-छोटे घाटों का अनुमान लगाया जाता है। मगर एक अंतराल के बाद जब हकीकत सामने आती है, तो तस्वीर बिल्कुल अलग होती है। अब मतदाता विकास को काफी ज्यादा तवज्जो देने लगे हैं। चाहे नरेंद्र मोदी का दिल्ली की सत्ता में आना हो या उत्तर प्रदेश का हालिया चुनावी नतीजा, सभी इसी ओर इशारा कर रहे हैं। अब मोदी की नजरें दक्षिण पर आ टिकी हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तो यहां की 120 लोकसभा सीटों पर अपना काम शुरू भी कर चुके हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

जरूर पढ़ें

 
Hindi News से जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
Web Title: economy was demolished
 
 
 
अन्य खबरें
 
From around the Web
जरूर पढ़ें
क्रिकेट स्कोरबोर्ड
संबंधित ख़बरें