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संतोष धन

अक्सर वह आलमारी खोलकर असमंजस में पड़ जाते हैं। आज कौन-सा सूट पहनूं या कौन सी शर्ट पहनूं? ऐसा हर किसी के साथ होता है। तब उन्हें पिताजी की याद आती है, वह चुपचाप से उठते, खूंटी पर टंगी साफ-सुथरी शर्ट-पैंट पहनते और अपना रास्ता नाप लेते थे। उनका रोज सुबह का वक्त यूं ही जाया होता है, क्योंकि वहां संतोष धन नहीं है। असंतोष व्यक्ति को संसार में भटकाता है। अगर असंतोष की भावना इंसान में प्रबल हो जाती है, तो उसका झुकाव बुराइयों की तरफ सहज ही होता जाता है। इसलिए पूरी कोशिश करनी चाहिए कि जो उपलब्ध हो, उसे पर्याप्त मानें। और अधिक के लिए प्रयत्न करें भी, तो मन को शांत रखकर। सकारात्मक इच्छाशक्ति जगाकर मन और मस्तिष्क को शांत रखा जा सकता है। 

इंसान की जरूरतें बहुत थोड़ी हैं। उन्हें पूरा करने के लिए बहुत ज्यादा भाग-दौड़ करने की जरूरत भी नहीं है। हमारी जरूरतें नहीं, बल्कि इच्छाएं बड़ी होती हैं। शायद इच्छाएं भी नहीं, मनुष्य का अहं बड़ा होता है। वह सोचता है कि मेरे पास जितनी साधन संपदा होगी, मैं उतना बड़ा आदमी कहलाऊंगा। इसलिए जरूरतें बहुत आसानी से पूरी हो जाती हैं। पर इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, क्योंकि वह अहं से उपजती हैं। इसलिए महात्मा गांधी कहते थे कि प्रकृति हमारी जरूरतों को पूरा कर सकती है, लेकिन हमारी लालच को नहीं। 

जीवन में सुख का मूल संतोष है। संतोष का मतलब है- सहजता, सरलता, नीतियुक्त मार्ग और मेहनत से जितना प्राप्त हो जाए, उससे आगे की इच्छा न करना। सच्चा संतोष इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे पास जो भी, जितना है, उससे हम कितने संतुष्ट हैं? 

 

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