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जब गिरमिट की जंजीरों से आजाद हुए थे हमारे पुरखे

गौरीशंकर राजहंस, पूर्व सांसद और पूर्व राजदूत First Published:20-04-2017 12:13:34 AMLast Updated:20-04-2017 12:13:34 AM

इन दिनों कैरेबियाई देशों, खासकर सूरीनाम, गुयाना और त्रिनिदाद ऐंड टोबैगो में ‘गिरमिट’ प्रथा की समाप्ति की सौवीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। अंग्रेज बड़े उद्यमी थे। संसार के विभिन्न देशों में घूमकर वे यह पता लगा लेते थे कि कहां पर गन्ने की खेती हो सकती है, ताकि वहां बड़े पैमाने पर चीनी मिलें लगाई जा सकें। गन्ने की खेती के लिए उन्हें भारी संख्या में सस्ते मजदूरों की आवश्यकता होती थी। उन्होंने अपने अनुभव से पाया कि बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा (अब ओडिशा) और बंगाल में गरीबी चरम पर है। आए दिन सिंचाई के अभाव में इन प्रांतों में सूखा पड़ता है और लोग दाने-दाने को तरसते रहते हैं। इसलिए अंग्रेजों के दलाल इन राज्यों के गांवों में घूम-घूमकर उन मजदूरों की बहाली करते थे, जो मॉरीशस या कैरेबियाई देश सूरीनाम, ब्रिटिश गुयाना, जिसे अब गुयाना कहते हैं, त्रिनिदाद ऐंड टोबैगो जाने के लिए तैयार होते थे।

इन मजदूरों को भरपूर मजदूरी का प्रलोभन दिया जाता, और उन्हें धोखे में डालकर कलकत्ता (अब कोलकाता) बंदरगाह से भेड़-बकरियों की तरह पानी के जहाजों में भरकर इन देशों में ले जाया जाता था। ये मजदूर शत-प्रतिशत अनपढ़ होते थे। अंग्रेज उनके साथ ‘एग्रीमेंट’ पर दस्तखत कराते थे कि वे पांच वर्ष तक इन देशों से वापस नहीं लौटेंगे। अनपढ़ मजदूर ‘एग्रीमेंट’ शब्द का उच्चारण नहीं कर पाते, इसलिए बोलचाल की भाषा में इसे ‘गिरमिट’ कहते। तभी से इन मजदूरों को ‘गिरमिटिया’ मजदूर कहा जाने लगा।

कैरेबियाई देशों में, खासकर सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद ऐंड टोबैगो में इन गरीब मजदूरों का आना सन 1838 में शुरू हुआ। उसके पहले अंग्रेज अफ्रीकी देशों से जंजीरों में बांधकर गुलामों को इन देशों में मजदूरी कराने जबरन ले जाते थे। चूंकि 1838 में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने एक कानून बनाया, जिसके मुताबिक अफ्रीकी देशों के नागरिकों को गुलाम बनाकर किसी अन्य देश में नहीं ले जाया जा सकता था। इसीलिए अचानक मजदूरों की कमी पड़ गई और अंग्रेज धोखा देकर भारत के गरीब प्रांतों के मजदूरों को वहां ले गए। ब्रिटिश गुयाना, त्रिनिदाद तो पूर्णत: अंग्रेजी उपनिवेश थे। सूरीनाम यद्यपि डच उपनिवेश था, पर वहां गन्ने की खेती के लिए अंग्रेजों ने डच सरकार से समझौता किया और हजारों की संख्या में वे ‘गिरमिटिया’ मजदूरों को सूरीनाम भी ले गए।

अंग्रेजों ने गरीब मजदूरों को भरमाया था कि उन्हें ऐसे देश में ले जाया जा रहा है, जहां एक तरह से सोने की वर्षा होती है। वहां पांच वर्षों तक उन्हें मजदूरी करनी पड़ेगी। उसके बाद यदि वे चाहें, तो भरपूर पैसा कमाकर भारत लौट सकते हैं। परंतु इन देशों में जाकर भारतीय मजदूरों को जब हकीकत पता चली, तो उनके होश उड़ गए। उन्हें गुलामों की तरह रखा गया। उनको गंदी बैरकों में रखा जाता था और मजदूरी नाममात्र की 25 सेंट मिलती थी। उन्हें खाने के लिए जो कुछ राशन दिया जाता था, उसके दाम भी इन 25 सेंटों में से काट लिए जाते थे।

कैरेबियाई देशों में गए ‘गिरमिटिया’ मजदूरों को अत्यंत कष्ट झेलने पड़े। उन्हें अनेक ऐसी बीमारियों का शिकार बनना पड़ा, जो भारत में नहीं होती थीं। उनको उचित चिकित्सा सुविधा भी नहीं मिलती थी, जिससे सैंकड़ों मजदूर असमय ही मर गए। इस बीच 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया और पानी के जहाजों की भारी कमी हो गई, जिसके कारण अंग्रेजों ने इन गरीब मजदूरों को वहां ले जाना कम कर दिया। लेकिन जब भारतीय समाचारपत्रों में इन ‘गिरमिटिया’ मजदूरों की दयनीय दशा की चर्चा होने लगी, तो भारत की राष्ट्रवादी पार्टियों ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया। इस तरह सन 1917 में इन मजदूरों को कैरेबियाई देशों में ले जाया जाना बंद हुआ।

इन दिनों इन कैरेबियाई देशों में जश्न का माहौल है। जगह-जगह लोग भारत से आए हुए विभिन्न प्रांतों की पोशाक पहनकर नाच-गा रहे हैं। इनके पूर्वजों ने जो भी कठिनाइयां झेली हों, आज की तारीख में सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद ऐंड टोबैगो में भारतीय मूल के लोग संपन्न हैं और उनके बच्चे विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। भारतीय मूल के जो लोग इन देशों में बसे हुए हैं, भारत सरकार उन्हें भारत आने की सुविधा प्रदान करे, ताकि वे अपनी जड़ों को तलाश सकें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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