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खुद से प्यार

प्रवीण कुमार First Published:01-12-2016 10:34:38 PMLast Updated:01-12-2016 10:34:38 PM

आत्ममुग्धता खतरनाक है, लेकिन खुद से प्रेम करना नहीं। खुद से प्रेम करने वाले कभी आत्ममुग्ध होने की गलती नहीं करते। जो करते हैं, उन्हें खुद से सही मायनों में प्रेम नहीं होता, क्योंकि वे अपने भीतर बस अच्छा ही अच्छा तलाशते हैं। वे अपने लिए गफलत पाले रहते हैं।

अपने से प्रेम करना पहले स्वार्थी होने का सबूत माना जाता था। सबसे पहले मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक एरिक फ्रॉम ने इस धारणा को तोड़ा। एरिक ने जो अवधारणा रखी, उसके मुताबिक खुद से प्रेम करना एक सकारात्मक भाव है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी अन्य से प्रेम करने से पहले जरूरी है कि व्यक्ति स्वयं से प्रेम करे। हम स्वयं से प्रेम करने की जगह खुद से सम्मोहित होना सीख जाते हैं। यह स्थिति खुद को अहंकारी होने की ओर ले जाती है। खुद से प्रेम का मतलब है, अपने गुण-दोष को यथार्थ की रोशनी में देखना। खुद को उत्कृष्टता की ओर ले जाने को हमेशा प्रेरित करते रहना।

अमेरिकी साइकोलॉजिकल एसोसिएशन से जुड़े मशहूर मनोविज्ञानी डेविड बलार्ड का कहना है कि आप बस यह महसूस करें कि आप जो जीवन जी रहे हैं, वह आपके, आपके परिवार के, समाज के और देश के लिए बेशकीमती है। बस, इतने भर से आप काफी हद तक चिंता और अवसाद से दूर रहेंगे। यहां स्वामी विवेकानंद की बातें कैसे नजरअंदाज की जा सकती हैं। वह राजयोग में लिखते हैं- प्रत्येक इंसान ईश्वर का अंश है। अगर वह ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति दिखाना चाहता है, तो सबसे पहले स्वयं की अवहेलना करना छोड़े और स्वयं से प्यार करे। प्रेम से ही चेतना जागृत होती है। यह चेतना ही हमारे जीवन का पारस है।

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