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जरा बहने तो दो

राजीव कटारा First Published:17-03-2017 10:01:37 PMLast Updated:17-03-2017 10:01:37 PM

पीछे से कंधे पर हाथ रखते हुए उनके बुजुर्ग साथी ने कहा, ‘कहां अटके पड़े हो?’ वह हड़बड़ाए थे। सचमुच खासा देर से कहीं अटके हुए थे वह।

‘हम खुश ही तब होते हैं, जब अपनी जिंदगी के बहाव को महसूस करते हैं। उसके साथ-साथ बहते चलते हैं।’ यह मानना है मिहाली चिकचेनमिहाल्यी का। वह मशहूर हंगेरियाई साइकोलॉजिस्ट हैं। क्लेयरमॉन्ट ग्रेजुएट यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के प्रोफेसर हैं। जिंदगी के बहाव पर उन्होंने खूब काम किया है। उनकी बेहद चर्चित किताब है- फ्लो: द साइकोलॉजी ऑफ ऑप्टिमल एक्सपीरियंस।
हम एक काम में जुटे हुए हैं। जाहिर है, वह काम अब में होना है। हम कोई काम बीते हुए कल में नहीं कर सकते। बहाव में जीना एक तरह की सोच है या कहिए कि सही मायने में जीने का अंदाज है। तब हम यह मानतेे हैं कि अब में जो हो रहा है, वही असल चीज है। और उस बहाव के उलट कुछ करने की कोशिश नहीं करते। वहां से भटकने की जरूरत महसूस नहीं करते। बहाव का मतलब है कि हमारे भीतर और बाहर में कोई फर्क नहीं है। यानी तन और मन एकजुट हो काम कर रहे हैं।

सबसे पहले तो हम जिस काम को कर रहे हैं, उसे पूरे बहाव में करें। हम जब बहाव में होते हैं, तो समय का अंदाज ही नहीं रहता। इसका मतलब ही है कि हम उस काम में बहे चले जा रहे हैं। हमें अपने बहाव को पहचानना होता है। उस पर काम किया जा सकता है। वह कोई हवाई चीज नहीं है। महज अपनी सोच को बदलने की जरूरत होती है। अपने अब में जीते ही हम बहाव से जुड़ जाते हैं। जरा उससे जुड़कर तो देखिए।

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