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खतरनाक सड़कों पर दम तोड़ती साइकिलें

अभी कुछ दिनों पहले ही कर्नाटक के हुगली शहर में एक गरीब साइकिल सवार की बस दुर्घटना में मृत्यु हो गई, जबकि उसके आस-पास उपस्थित लोग उसकी जान बचाने की कोशिश करने की बजाय फोटो व वीडियो बनाने में व्यस्त थे। यह वाकया निस्संदेह सोशल मीडिया के क्रेज में दम तोड़ती इंसानियत का ही उदाहरण है। लेकिन इस वाकये का दूसरा पहलू यह भी है कि सड़क दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में साइकिल सवार हादसों के शिकार होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, साल 2004 में सड़क दुर्घटनाओं से हुई मौतों में छह प्रतिशत साइकिल सवारों की थी। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार,  साल 2012 में साइकिल सवार की सड़क दुर्घटना में हुई मौतों की संख्या 6,600 थी। इन मौतों के लिए लगभग 80 प्रतिशत मामलों में मोटरयुक्त वाहन के चालकों की गलती पाई गई, जबकि मात्र 1.2 प्रतिशत में साइकिल चालकों की गलती पाई गई। यह बताता है कि हमारे शहर साइकिल चालकों के लिए कितने असुरक्षित हैं। दिक्कत यह है कि इन्हें सुरक्षित बनाने की कोई बड़ी कोशिश भी नहीं हो रही।

एक तरफ, विभिन्न सरकारों द्वारा स्कूली छात्र-छात्राओं को साइकिल वितरण किए जाने से साइकिल सवारों की संख्या बढ़ी है, पर शहरों में साइकिल सवारों की संख्या घट रही है। ‘द एनर्जी ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (टेरी) के अनुसार, पिछले एक दशक में साइकिल वाले घरों की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में 43 प्रतिशत से बढ़कर 46 प्रतिशत हुई है, जबकि शहरों में यह संख्या 46 प्रतिशत से घटकर 42 प्रतिशत रह गई है। इसकी एक वजह है शहरों में साइकिल सवारी का असुरक्षित होना। हमारा शहरी परिवहन इन्फ्रास्ट्रक्चर तीव्र गति से विकास कर रहा है, पर विकसित की जा रही ज्यादातर आधुनिक संरचनाएं मोटरयुक्त वाहनों को सुविधा प्रदान करने के लिए बन रही हैं। इसके बावजूद शहरी परिवहन में साइकिल का महत्वपूर्ण स्थान है, खासकर निम्न आय वर्ग के गरीबों के जीविकोपार्जन के लिए यह एक आवश्यक साधन है। क्योंकि वे अपनी कमाई से हर रोज 50-100 रुपये यातायात पर खर्च नहीं कर सकते हैं। 

साइकिल परिवहन के लिए बेहतर आधारभूत संरचना और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराकर निम्न आय वर्ग के साथ मध्यम व उच्च आय वर्ग के लोगों को भी सुरक्षित यातायात का नया विकल्प प्रदान किया जा सकता है। इस कदम से वैसे सभी लोगों को साइकिल चलाने के लिए आकर्षित किया जा सकता है, जिनकी प्रतिदिन औसत यातायात की दूरी 5-8 किलोमीटर है, पर वे दुर्घटना के भय से साइकिल नहीं चलाना चाहते हैं। एक शोध के अनुसार, छोटे शहरों में सभी वाहनों से दैनिक यात्रा की औसत दूरी 2.5 से 4.8 किलोमीटर तक होती है, जबकि मध्यम व बडे़ शहरों में यह दूरी 4.2 से 6.9 किलोमीटर के बीच है, जो साइकिल के लिए उपयुक्त दूरी है।

विकसित देशों में प्रति व्यक्ति मोटर वाहन स्वामित्व ज्यादा होने के बावजूद प्रति व्यक्ति साइकिल स्वामित्व भारत से कहीं ज्यादा है। भारत में साइकिल आवश्यकता आधारित है, जबकि विकसित देशों में आधारभूत संरचनाओं के साथ यह स्वास्थ्य व पर्यावरण के प्रति जागरूकता के साथ-साथ इच्छा आधारित भी है। विश्व के कई देशों के साइकिल लेन इसके उदाहरण हैं, पर डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में साइकिल ट्रैक सबसे ज्यादा विकसित हैं और समय पर पहुंचने के लिए लोग इसका खूब उपयोग करते हैं।

राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति 2006 में गैर मोटर यातायात को बढ़ावा देने की बात कही गई है। इसके साथ ‘जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रीन्युएवल मिशन’ के तहत साइकिल ट्रैक बनाने को प्राथमिकता देने की भी योजना है। दिल्ली, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद और चंडीगढ़ में इसे बनाया गया है, तो अभी हाल में ही उत्तर प्रदेश में 207 किलोमीटर लंबा एशिया का सबसे लंबा साइकिल हाइवे बनाया गया है। हालांकि अब भी साइकिल चालकों की संख्या के अनुपात में साइकिल ट्रैक को और विकसित किए जाने की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ ही इन रास्तों को अतिक्रमण और अवैध पार्किंग से मुक्त रखना भी जरूरी है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title: bicycling bicycles on dangerous roads