मंगलवार, 21 मई, 2013 | 14:40 | IST
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फिल्म रिव्यूः गैंग्स ऑफ वासेपुर
First Published:22-06-12 10:19 PM
Last Updated:23-06-12 11:47 AM
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यह एक डॉक्यूमेंट्री है, जिसमें सन 47 की त्रासदी है। झारखंड स्थित वासेपुर के कोयला खदानों की वास्तविक आपराधिक घटनाएं हैं। मजदूरों का शोषण है। पुलिस के अपराधियों से डरने की विडंबना है। यह एक ड्रामा है, जिसमें स्त्री-पुरुष का आकर्षण है। स्थानीय गालियां हैं। सेक्स है। हिंसा है। यह एक असंगत-सी कविता है, जो बिना पूर्वाभास कराए अचानक रुक जाती है।

यह इशारा देकर कि मिलेंगे अगले अंक में। यह एक पेंटिंग है, जिसमें सौंदर्य है। प्रेम है। रस है। स्थिरता है! इसकी सबसे अच्छी बात है इसके संवाद और एक्टर। ये दोनों ही आपको बांध कर रखते हैं। संवाद  दरअसल सूत्र वाक्य हैं जो कुछ विशेष संदर्भो में जीवन का दर्शन, सामाजिक समस्याएं और निजी मनोविज्ञान दर्शाते हैं। मसलन..
..संसार में केवल दो तरह के लोग हैं। एक हरामी और दूसरे बेवकूफ!
..समस्या तब होती है, जब हरामी बेवकूफी करने लगें और बेवकूफ हरामीपन पर उतर आएं!
..अल्लाह मियां ने चार निकाह करने को कहा है। अब उन्हें तो मानना ही पड़ेगा!
..तुम सही हो और वह मर्द है! वगैरह-वगैरह। फिल्म के संवादों में कोई कमी नहीं है। गालियां हैं, मगर वह अखरती नहीं, बल्कि फिल्म का हिस्सा लगती हैं।

एक्टर्स में मनोज बाजपेयी का नाम सबसे ऊपर है। इसलिए नहीं कि वह फिल्म के हीरो हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें देख कर लगता है मानो उन्होंने एक्टिंग का कोई सॉफ्टवेयर बना लिया है,  जिसका रिमोट पूरी तरह से उनके हाथ में है। जहां जिस एक्सप्रेशन की जितनी मात्र में जरूरत है, उन्होंने वहां वह एक्सप्रेशन उतनी ही मात्र में दिया है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी को संवाद कम मिले हैं, मगर उन्होंने अपनी आंखों और बॉडी लैंग्वेज से सारा जादू दिखा दिया है। उनकी सादगी यह भ्रम तोड़ती है कि एक्टर को ‘लाजर्र देन लाइफ’ होना चाहिए। पीयूष मिश्र ने नैरेशन के साथ- साथ फिल्म में एक्टिंग भी की है। उनकी आवाज उन्हें सबसे अलग स्थापित करती है। लड़कियों में रिचा चड्ढा कमाल की लगी हैं। आक्रामकता और सहजता दोनों के साथ उन्होंने इंसाफ किया है। जो भी इस फिल्म को एक बार देखेगा, वह जयदीप अहलावत को भुला नहीं पाएगा।

जहां तक बात है निर्देशक से एक्टर बने तिग्मांशु धूलिया की तो उनकी एक्टिंग के लिए सिर्फ दो शब्द हैं-नो कमेंट! अनुराग के पास इतने अच्छे एक्टर थे, उन्होंने तिग्मांशु को क्यों कास्ट किया, पता नहीं। यशपाल शर्मा मनोरंजक लगे हैं, मगर उन्हें थोड़ा वक्त और मिलना चाहिए था। उनकी कमी खलती है। 

बात करें फिल्म की कहानी की तो कहानी अच्छी है। समस्याओं और मुद्दों की बात करती है। अगर आप फिल्म की कहानी समझना चाहते हैं तो आपको कई बरस पुराने बिहार के अखबारों में झांकना पड़ेगा, क्योंकि उन अखबारों में छपी सच्ची कहानियां ही इस फिल्म का आधार हैं। पुलिस के अपराधियों से डरने की कहानी। कमजोर और ताकतवर के बीच अस्तित्व के संघर्ष की कहानी। मर्दो की लड़ाई में औरतों के पिसने की कहानी। सताई हुई औरत को उसके पति के विरुद्ध इस्तेमाल करने की कहानी। पीढ़ी दर पीढ़ी होती हत्या की कहानी। एक के बाद एक हत्या का बदला लेने की जद्दोजहद में बरबाद होते बचपन और जवानी की कहानी। इन सबसे उपजी सामाजिक समस्याओं और निजी विडंबनाओं की कहानी। दो बातें बिलकुल नई हैं। पहली यह कि कोयला खदानों के कामगारों को पहली बार इतने वास्तविक रूप में दिखाया गया है। दूसरी बात यह कि बिहार के मुसलमानों के जातिगत संघर्ष पर गंभीरता से फोकस किया गया है।

इस कहानी को कुछ अच्छे, कुछ बुरे प्रयोगों के साथ पूरी तरह नए खांचे में गढ़ा गया है। अच्छा प्रयोग यह कि अनुराग कश्यप ने घटनाओं और भावनाओं का कोलाज बनाया है। इन सब घटनाओं के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और निजी पहलू तलाशे हैं। इन्हें छोटे-छोटे सीन में बांटा है। कई जगह यह सीन आपकी भावनाओं को छूकर गुजर जाते हैं। यह बतौर निर्देशक अनुराग की सफलता है, मगर उनकी नाकामी यह है कि वह एक सीन और दूसरे सीन के बीच का मूड बदल देते हैं, जिसकी वजह से संवेदना पूरी तरह जागने से पहले सो जाती है। यानी आपकी आंखों में आंसू तो आते हैं, मगर बहने की बजाय वापस चले जाते हैं। घटनाएं एक के बाद एक इतनी स्पीड में आती हैं कि मन नहीं भीगता।

फिल्म आपको कई मायनों में प्रभावित कर सकती है। अगर आप नॉनवेज खाते हैं तो वेजिटेरियन हो सकते हैं, क्योंकि फिल्म की अधिकांश शूटिंग कसाईखानों में की गई है! आप सवाल कर सकते हैं कि आज जब बिहार बदल रहा है, सुधर रहा है तो क्यों 60 या 70 के दशक की काली परछाइयों को इतने वीभत्स रूप में याद किया जाए? फिल्म मेकिंग का झाेल भी अखर सकता है। खासतौर से निर्देशक और फिल्म के एडिटर पर सवालिया निशान लगते हैं। अनुराग ने फिल्म को ठीक से समेटा नहीं है। कई जगहों पर फिल्म बिखरी हुई सी लगती है। एडिटिंग डेस्क अगर थोड़ा और ढंग से काम करती तो आसानी से फिल्म को 3 घंटे में बांधा जा सकता था। पांच घंटे खर्च करने या एक और पार्ट बनाने की जरूरत न पड़ती।

कलाकार: मनोज बाजपेयी, रिचा चड्ढा, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, तिग्मांशु धूलिया, पीयूष मिश्र।
निर्देशक: अनुराग कश्यप।
निर्माता: अनुराग कश्यप, सुनील बोहरा।
संगीत: स्नेहा खनवालकर।

पब्लिक कमेंट
एक बार देखने लायक फिल्म है, लेकिन आप परिवार के साथ बैठ कर नहीं देख सकते इसे।
राहुल, व्यवसायी

 

 
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टिप्पणियाँ
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टिप्पणियॉ पढ़े(5)
manoj ki accting aur aawaj kabiletarif bar film jarur
By arun kumar yadav (24th-June-2012 03:54:PM)
ये review किसने लिखा है पता फिल्म बनाकर देखो तो पता चले की फिल्म केसे बनती देख कर review लिख देना आसन है
By pal (24th-June-2012 03:41:PM)
By Sushil tiwari (23rd-June-2012 10:00:PM)
मनोज बाजपाई महान कलाकार है
By manjar ala, (23rd-June-2012 02:54:PM)
मनोज बाजपाई इमाज़िने एक्टर है
By ankit singh (23rd-June-2012 12:17:PM)
 
 

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