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फिल्म रिव्यूः डिपार्टमेंट
विशाल ठाकुर
First Published:18-05-12 09:49 PM
Last Updated:18-05-12 10:40 PM
फिया, राजनीति और अंडरवर्ल्ड जैसे विषयों से राम गोपाल वर्मा का पुराना मोह है। ‘शिवा’, ‘सत्या’, ‘कंपनी’, ‘सरकार’, ‘सरकार राज’ और ‘रक्त चरित्र’ जैसी फिल्मों से वह साबित कर चुके हैं कि इन विषयों पर उनकी ग्रिप काफी अच्छी है।
बॉक्स ऑफिस पर इन तमाम फिल्मों की कामयाबी यह दर्शाती है कि दर्शक रामू के एक खास अंदाज को पसंद करते हैं और वह अन्य निर्देशकों के मुकाबले इन विषयों में अपना अच्छा दखल रखते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से रामू ने अपनी फिल्मों के विषयों को तो मजबूती दी है, पर उनके कंटेंट लेवल पर कच्चा काम किया है। पिछले साल आई फिल्म ‘नॉट ए लव स्टोरी’ के बाद फिल्म ‘डिपार्टमेंट’ इसका बड़ा उदाहरण है।
‘डिपार्टमेंट’ के साथ एक नहीं, कई सारी दिक्कतें हैं। सबसे बड़ी दिक्कत है कैमरा एंगल। विभिन्न दृश्यों को एक अंदाज से फिल्माना उनकी पुरानी आदत है। यह आदत उन्हें भीड़ से अलग भी खड़ा करती रही है। लेकिन कैमरे का अलग एंगल फिल्म के कुछेक खास दृश्यों तक ही सीमित रहे तो अच्छा है। ‘डिपार्टमेंट’ में इसकी अति हो गयी है। फिल्म के पहले सीन से लेकर अंत तक उनका कैमरा हिलता ही रहा है, मानो उन्होंने कैमरे को किसी पेंडुलम से बांध दिया हो।
उन्होंने अपने कैमरे को इस कदर हिचकोले दिलाए हैं कि वह जूते के फीते से लेकर चाय के प्याले और नायिका के होंठों से लेकर बिग बी की धोती तक की सिलवटें दिखाता नजर आता है।
कई सीन्स में उन्होंने इस कदर टाइट क्लोज-अप लिए हैं कि आप किरदारों की नाक के बाल तक साफ देख सकते हैं। ये सब किसलिए? इस तरह की सिनेमेटोग्राफी से सिवाय सिर दर्द के और कुछ हासिल नहीं होता। क्या यह कैमरा एंगल फिल्म की घिसी-पिटी कहानी को छिपाने के लिए है या फिर दिग्गज कलाकारों के अभिनय पर मरहमपट्टी के लिए, जो संजीदा दृश्यों में भी कॉमेडी-सी करते नजर आते हैं।
खैर फिल्म की कहानी की बात करें तो ‘डिपार्टमेंट’ कहानी है महादेव भोंसले (संजय दत्त) की, जिसके एंटी टेररिस्ट दस्ते में शामिल है शिव नारायण (राणा दग्गुबती) जैसा दिलेर अफसर। पुलिस प्रशासन से परे ये दस्ता अपने मन माफिक तरीके से माफिया को खत्म करने का काम करता है। कहानी में एक राजनेता भी है। नाम है सरजेराव गायकवाड़ (अमिताभ बच्चान) जो कि एक जमाने में नामी गैंगस्टर था। काले धंधे उसकी रग-रग में आज भी बसे हैं। महादेव को अपने साथियों के साथ मिल कर मुंबई शहर से गौरी और सेवतिया (विजय राज) के गैंग को खत्म करना है। सेवतिया का प्रमुख शूटर डीके है और उसकी प्रेमिका है नसीर, जो कि एक खतरनाक अपराधी है। सेवतिया और डीके की नहीं बनती।
उधर, एक घटना के बाद शिव नारायण सरजेराव से बेहद प्रभावित हो जाता है, लेकिन सरजेराव को महादेव फूटी आंख नहीं सुहाता। सरजेराव ही शिव नारायण को बताता है कि महादेव गौरी जैसे गैंगस्टर के लिए काम करता है। तभी डीके सेवतिया से बगावत करता है। महादेव उससे हाथ मिला लेता है। शिव जब सेवतिया को पकड़ता है तो वह उसे बताता है कि वह सरजेराव के लिए काम करता है। बात बिगड़ते देख डीके शिव की पत्नी का अपहरण कर लेता है। अब उसे महादेव से बदला लेना है।
इस पूरी कहानी में इतने उलझाव हैं कि ‘डिपार्टमेंट’ का मकसद कहीं गुम हो जाता है। रामू ने फिल्म की कहानी पर जरा भी ध्यान नहीं दिया है। वही पुराने घिसे-पिटे फॉमरूलों का इस्तेमाल किया है। क्लब में आइटम नंबर, उसके बाद एक गुंडे का कत्ल, पुरानी फैक्ट्रियों में फाइटिंग, कॉन्ट्रेक्ट किलिंग और न जाने क्या-क्या। पूरी फिल्म में केवल अभिताभ ही अभिनय के नाम पर कुछ कर पाए हैं। संजय दत्त की बढ़ती उम्र को कैप से छिपाने की कोशिश की गयी है। कुल मिला कर ‘डिपार्टमेंट’ हर तरफ से निराश करती है। यह फिल्म रामू की एक अन्य फिल्म ‘राम गोपाल वर्मा की आग’ की याद दिलाती है, जिसे देख इंसान आपा खो देता है।
कलाकार: अमिताभ बच्चान, संजय दत्त, राणा दग्गुबती, अंजना सुखानी, विजय राज, अभिमन्यु सिंह, लक्ष्मी मांचू, दीपक तिजोरी, मधु शालिनी
निर्देशक: राम गोपाल वर्मा
निर्माता/बैनर: राम गोपाल वर्मा/वॉयकॉम 18
संगीत: धरम संदीप, बप्पी लाहिड़ी, विक्रम नागी पब्लिक कमेंट
सिर्फ एक बार ही देखने लायक है यह फिल्म। एक्शन सीन जरूर अच्छे हैं। लेकिन कोई खास बात नहीं है।
योगिता, गृहणी आइटम सॉन्ग को छोड़कर फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसकी तारीफ की जाए। पूरी फालतू फिल्म है यह।
स्नेहा कपूर, मॉडल एकदम बोर मूवी है। संजय दत्त की एक्टिंग जरूर अच्छी लगी। अमिताभ बच्चन को तो अब एक्टिंग से संन्यास ले लेना चाहिए।
विपिन शर्मा, व्यवसायी
निर्देशक: राम गोपाल वर्मा
निर्माता/बैनर: राम गोपाल वर्मा/वॉयकॉम 18
संगीत: धरम संदीप, बप्पी लाहिड़ी, विक्रम नागी पब्लिक कमेंट
सिर्फ एक बार ही देखने लायक है यह फिल्म। एक्शन सीन जरूर अच्छे हैं। लेकिन कोई खास बात नहीं है।
योगिता, गृहणी आइटम सॉन्ग को छोड़कर फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसकी तारीफ की जाए। पूरी फालतू फिल्म है यह।
स्नेहा कपूर, मॉडल एकदम बोर मूवी है। संजय दत्त की एक्टिंग जरूर अच्छी लगी। अमिताभ बच्चन को तो अब एक्टिंग से संन्यास ले लेना चाहिए।
विपिन शर्मा, व्यवसायी
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टिप्पणियाँ
टिप्पणियॉ पढ़े(1)
Is Film me Ramgopal Varma Ne Camaraman se Itna Zabardast Camara Ghumwaya Hay Ki Sir Dukhne Lagta "Department" me aisa kutchh nahi hay Jo pehle na dekha gaya Unka Camara Kalakaro ko Dikhane ke Bajay Chai Ka Cup, Gadi Ka Stayring, Police Ki Vardi, Pistol se Jaise Dialogue Bulwa raha Aisa Lagta
By SANJAY M. TARANEKAR (Writer (20th-May-2012 05:46:PM)
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