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दर्शकों ने पसंद की विविधता
असीम चक्रवर्ती First Published:26-12-2012 12:35:56 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM
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पिछले साल की तुलना में इस साल की फिल्मों पर गौर फरमाएं तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आती हैं। विषयवस्तु और प्रस्तुति के मामले में इस साल की ज्यादातर हिट फिल्मों का अंदाज एक-दूसरे से बहुत जुदा नजर आया। लगभग 125 हिंदी फिल्में दर्शकों के बीच आयीं, जिनमें से कुछ को 100 करोड़िया फिल्मों की श्रेणी में रखा गया। बाकी कई फिल्मों ने भी अच्छा मुनाफा कमाया। बावजूद इसके इन सारी फिल्मों में एक भिन्नता साफ नजर आयी।

कैसा रहा बिजनेस
दस करोड़िया फिल्मों की वजह से 1500 करोड़ की कमाई हुई। बाकी हिट फिल्मों ने 100 करोड़ की कमाई कर इंडस्ट्री को खुश कर दिया। ट्रेड पंडित विनोद मिरानी कहते हैं कि ‘कुछ करोड़ में बनी फिल्म यदि अपनी लागत का दोगुना लाभ कमा लेती है तो इसे बहुत संतोषजनक स्थिति कहा जा सकता है। ज्यादातर निर्माता फिल्मों में लगातार ऐसी ही स्थिति क्रिएट करने की कोशिश कर रहे हैं। साल के शुरू में रिलीज अपनी फिल्म 'अग्निपथ' के जरिये करण जौहर ने पूरी तरह से दिशा बदलने की कोशिश की।

अपने ही बैनर की एक हिट फिल्म से उन्होंने इसकी शुरुआत की। उन्होंने मूल 'अग्निपथ' में काफी बदलाव करते हुए इसे बिल्कुल नये अंदाज में पेश किया। इसके लिए बजट का पिटारा उन्होंने पूरी तरह से खोल दिया। इन सब कारणों से 80 करोड़ की 'अग्निपथ' ने 120 करोड़ का बिजनेस कर इस साल का पहला रिकॉर्ड बनाया।

इस फिल्म के चलने की सबसे बड़ी वजह इसकी शानदार प्रस्तुति थी। असल में अपनी पिछली फिल्मों में बतौर निर्देशक हुई गलतियों को करण जौहर ने इसमें सुधारा। उन्होंने इसमें कुछ मनोरंजक बदलाव किये, जिसने इस फिल्म के लिए सुपरहिट का दरवाजा खोल दिया।

दूसरी ओर एक सामान्य से निर्देशक साजिद खान ने अपने एक साधारण से विषय वाली फिल्म 'हाउसफुल-2' को सिर्फ सितारों के दमखम पर हिट बना दिया। इस लाइट फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसके एक दर्जन सितारों ने एकदम सही समय पर अपनी एंट्री दी।

तीन खान का तिलिस्म
इस बार भी तीनों खान की फिल्मों में एक विविधता देखने को मिली। सलमान ने अपने गांव के दर्शकों को ध्यान में रख कर सारी फिल्में कीं। 'तलाश' में आमिर ने फिर यह साबित किया कि उन्हें क्यों मिस्टर परफेक्टनिस्ट कहा जाता है। शाहरुख ने जब तक है जान में फिर अपनी रोमांटिक छवि को पुख्ता किया। इन तीनों खान ने फिर यह साबित किया कि बिल्कुल अलग तरह की फिल्मों के सहारे वह अभी कुछ साल छाये रहेंगे।

मल्टीप्लेक्स की भूमिका
इस साल भी बड़ी कमाई करने वाली फिल्मों को मल्टीप्लेक्स ने बहुत सहारा दिया। वीक एंड के तीन या चार दिन में ही इनमें से कुछ फिल्मों के बिजनेस ने 60 करोड़ तक का बिजनेस हासिल कर लिया। सिंगल थियेटर की घटती संख्या के चलते फिल्मों ने अपनी रिलीज की एक नयी परिभाषा गढ़ ली है।  ट्रेड पंडित आमोद मेहरा कहते हैं, ‘आज किसी भी स्टार कास्ट फिल्म के 12 से 20 तक शो मल्टीप्लेक्स में दिखाये जाते हैं। फिल्मों की रिपीट वेल्यू कम हुई है।

सिर्फ कुछ अच्छी फिल्मों की रिपीट वेल्यू होती है, वरना सितारों से भरी जिन फिल्मों में थोड़ी-सी ताजगी होती है ,वे फिल्में पहले तीन-चार दिनों में ही 90 से 100 प्रतिशत बिजनेस कर अच्छा-खासा मुनाफा कमा लेती हैं।’ यही एक वजह है कि फिल्मों की प्रिंट संख्या मे कोई लगाम नहीं रह गयी है। जैसे सलमान की 'दबंग-2' को करीब तीन हजार प्रिंटों के साथ जारी किया गया। साफ है कि फिल्मों को हिट बनाने का एक नया फॉर्मूला सभी के हाथ लग गया हैं।

विषय से ज्यादा प्रस्तुति पर ध्यान
नयेपन को शोर मचाने वाले निर्देशक अनुराग कश्यप को इस साल सिर्फ सफलता 'गैंग ऑफ वासेपुर' के रूप में मिली। हिंसा से भरपूर इस फिल्म के चलने की सबसे बडी वजह थी ,इसका रियलिस्टिक होना। जिसके चलते 6 करोड़ की फिल्म ने 14 करोड़ की कमाई कर सबको खुश कर दिया। दूसरी और 'अय्या' के साथ गहरा जुड़ाव रखने के बावजूद अनुराग की बोझिल प्रस्तुति की वजह से एकदम लुढक गयी। लेकिन सुजॉय घोष की 15 करोड़ की फिल्म 'कहानी' ने 80 करोड़ की कमाई करके बॉक्स ऑफिस को खूब चौंकाया। इस फिल्म की सफलता का सारा श्रेय इसकी शानदार प्रस्तुति को जाता है।

प्रस्तुति के साथ इसमें विषय का मिश्रण भी अच्छी तरह से घोला गया था। यह इसकी प्रस्तुति का ही कमाल था कि अकेले अपने दमखम पर अभिनेत्री विद्या बालन ने इसे करोड़िया फिल्मों की श्रेणी में ला दिया। दूसरी और अलग विषय की वजह से 10 करोड़ी 'पान सिंह तोमर' ने भी 60 करोड़ कमाई की। इसके उलट प्रस्तुति में नयेपन के चलते 6 करोड़ की 'जन्नत-2' ने 11 करोड़ की कमाई की। करण जौहर की 'एक मैं और एक तू' भी अनोखी विषयवस्तु की वजह से हिट श्रेणी मे आ गयी। इसने 4 करोड़ का मुनाफा कमाया। यशराज की फिल्म 'इश्कजादे' का मुनाफा भी कुछ करोड़ तक सिमट गया। मगर मात्र 5 करोड़ में बनी इस फिल्म की कमाई 9 करोड़ को ट्रेड पंडितों अच्छा बताया। 4 करोड़ का मुनाफा ऐसी फिल्मों के लिए बहुत संतोषजनक माना जाता है, इसलिए 2 करोड़ में बनी जॉन अब्राहम प्रोडक्शन की फिल्म 'विकी डोनर' की पांच करोड़ की कमाई की। बीस करोड़ में बनी 'ओह माई गॉड' की 50 करोड़ की कमाई भी इसी वजह से उल्लेखनीय बनी।

थोड़े नये में बहुत है दम
'अय्या', 'एजेंट विनोद', 'जोकर', 'हीरोइन', 'कमाल धमाल मालामाल', 'चक्रव्यूह', 'प्लेयर्स', 'तेरे नाल प्यार हो गया', 'जोड़ी ब्रेकर्स', 'क्या सुपर कूल हैं हम', 'किस्मत लव पैसा दिल्ली' आदि इस साल की कुछ ऐसी बडी फ्लॉप हैं, जिन्होंने अपने कमजोर विषय या बेहद कमजोर प्रस्तुति की वजह से दर्शकों को हताश किया। इन फिल्मों की विफलता का बहुत पोस्ट मार्टम हो चुका है। अब तो सिर्फ एक बात सामने आयी है कि अमूमन एक हिट फिल्म में थोड़ा नया विषय और थोड़ी अच्छी प्रस्तुति ही बहुत कारगार साबित होती है।

हीरोइन भी छायी रही विषय में
कई फिल्मों में हीरोइन भी छायी रही। 'कहानी', 'बर्फी', 'कॉकटेल', 'जब तक है जान', 'तलाश', 'इश्कजादे' आदि कई फिल्मों में नायिका को खूब तवज्जो दी गयी और उन्होंने अपने काम को शानदार ढंग से अंजाम भी दिया। भला 'कहानी' की विद्या बालन या 'बर्फी' की प्रियंका चोपडा को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है। एक सुखद आश्चर्य की तरह फिल्म के विषय को लेकर इनकी जिज्ञासा की भी खूब तारीफ हुई। लगता है, सौ करोड़ क्लब में शामिल होने की वजह से इन हीरोइन का हौसला और बढ़ा है।

100 करोड़ वाली फिल्मों का जुआ
'अग्निपथ' की बात जाने दो, ज्यादातर सौ करोड़िया फिल्में चालू मसालों की मौजूदगी के बावजूद अपना अलग ट्रंप कार्ड लेकर 100 से 150 करोड़ तक का बिजनेस करने में सफल रहीं। 60 करोड़ की फिल्म 'बोल बच्चन' ऋषि दा की क्लासिक 'गोलमाल' से प्रभावित होने की वजह से हिट की वैतरणी पार करने में सफल रही, वरना इसकी सस्ती चालू कॉमेडी न के बराबर हंसने पर बाध्य करती है। एक अच्छा विषय अपने सस्तेपन की वजह से किस तरह से हल्का-फुल्का बन जाता है, रोहित शेट्टी की 'बोल बच्चन' इसका अच्छा उदाहरण बनी। किस्मत से हिट का सहारा रोहित को बराबर मिल रहा है, पर अपनी फिल्मों की प्रस्तुति को वह बराबर ढीला छोड़ रहे हैं। ढीली प्रस्तुति खिलाडी 786 में भी खूब देखने को मिली। वैसे भी जिस फिल्म की कहानी हिमेश रेशमिया जैसे सेटर लिखेंगे, उस फिल्म के विषय को भगवान ही बचा सकता है।

दूसरी और 115 करोड़ की कमाई करने वाली फिल्म 'बर्फी' के लिए निर्देशक अनुराग बसु पर नकल के आरोप लगे, पर सशक्त प्रस्तुति के चलते इस फिल्म ने दर्शकों का खूब सम्मोहित किया। एक्शन से भरपूर 'राउडी राठौर', 'एक था टाइगर' और 'सन ऑफ सरदार' अपने विषय नहीं, बल्कि अपनी प्रस्तुति की वजह से 100 करोड़ का रिकॉर्ड बिजनेस करने में सफल रही। मिरानी बताते हैं, ‘इन फिल्मों का उल्लेखनीय पक्ष था, इनका स्टार क्रेज, जिसकी वजह से थियेटर में दर्शक ने क्षण भर के लिए भी इस बात पर दिमाग खर्च करने की कोशिश नहीं की कि फिल्म की कहानी क्या है।’ विषय के नाम पर यश चोपड़ा की रोमांटिक फिल्म 'जब तक है जान' भी बहुत पीछे रह गयी। इसे भी बडे सितारों के सम्मोहन ने बचाया। लेकिन आमिर खान की 'तलाश' ने फिर अपना रुतबा जमाया।

 
 
 
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