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फिल्म रिव्यू : गैंग्स ऑफ वासेपुर 2
विशाल ठाकुर
First Published:10-08-12 10:10 PM
Last Updated:11-08-12 11:06 AM
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इस फिल्म के एक बहुत ही प्यारे गीत तार बिजली से पतले हमारे पिया.. को उस समय फिल्म में डाला गया है जब फिल्म का नायक फैजल खान (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) अपने पैरों पर खड़ा होने लायक हो जाता है। यहां पैरों पर खड़ा होने लायक से मतलब रुपये पैसे कमाने से नहीं है। दरअसल, फैजल खान तैयार हो चुका है अपने दादा, बाप और भाई की मौत का बदला लेने के लिए।

रामाधीर सिंह (तिग्मांशु धूलिया) से विरासत में मिली ऐसी खूनी रंजिश, जिसने उसके  भाई दानिश खान को लील दिया और वह गांजे के नशे में कुछ न कर सका। ये बिजली के तार जैसा पतला फैजल खान अपनों के खून का बदला क्या लेगा, ये सुन-सुनकर वो पक चुका था। इसी बात को लेकर एक दिन उसकी मां नगमा खातून (रिचा चढ्ढा) तक उस पर छुरी (बकरा हलाल करने वाली)तान देती है। एक दिन कुछ न करने वाला फैजल उस फजलू  (सरदार खान की हत्या में शामिल फैजल का दोस्त) का ऐसा गला रेतता है कि पूरा वासेपुर और धनबाद को उसकी धमक सुनाई देती है।
 
गैंग्स ऑफ वासेपुर 2 की पटकथा की मूल भावना यहीं से आगे बढ़ती है। एक के बाद एक कत्ल होते हैं। हालत ये हो जाती है कि खुद को बचाए रखने के लिए रामाधीर सिंह एक तरह से फैजल खान के आगे घुटने टेक देता है। ऐसे में रामाधीर के प्यादे सुल्तान (पंकज त्रिपाठी) की मुसीबत आ जाती है।

अब फैजल को ताने नहीं मिलते। वह लोहे का बड़ा व्यापारी हो गया है। ये सींकड़ी पहलवान मोहसीना (हुमा कुरेशी) के दिल को भा जाता है और दोनों की शादी हो जाती है। यहीं से फिल्म के दो सबसे दिलचस्प किरदारों डेफिनेट (जीशान कादरी), फैजल का सौतेला भाई दुर्गा का बेटा और परपेंडिकुलर (आदित्य कुमार) यानी फैजल का सगा भाई की एंट्री होती है। ये नए जमाने के दबंग हैं। डेफिनेट को उड़ान चाहिए और परपेंडिकुलर ने अपने पंख खुद ही ईजाद कर लिए हैं। कई घटनाक्रमों के साथ कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुंच जाती है, जहां फैजल के साथ सिर्फ डेफिनेट होता है, जिसके दिल में सौतेला भाव कायम है।

अनुराग कश्यप ने यह फिल्म बेहद टाइट बजट में बनाई है। उनका सबसे ज्यादा पैसा कलाकारों के मेहनताने में गया है। दोनों भागों को मिलाकर देखें, तो इसमें करीब 50 से अधिक पात्रों ने काम किया है।

इतने सारे किरदारों के साथ एक कहानी को ठीक ढंग से कहने की कला अनुराग को आती है। ब्लैक फ्राईडे में वह दिखा चुके हैं। पर उसे दोहराने में उन्हें काफी वक्त लग गया। कोल माफिया और उसके बाद लोहे की दलाली में पनप रही दबंगई को उन्होंने अपने ही स्टाइल में पेश किया है। माफिया पर ऐसी पकड़ पहले राम गोपाल वर्मा की फिल्मों मे दिखा करती थी। सत्या और कंपनी के बाद पहली कोई फिल्म आयी है, जिसने दिखाया है कि माफिया और खूनी रंजिश केवल मुंबई में ही नहीं होती।

सत्या और कंपनी जैसी फिल्मों में मुंबई माफिया का संचालन उभरकर सामने आया तो इस फिल्म में बिहार के एक ऐसे हिस्से की रपट उजागर हुई, जिसके बारे में कहा-सुना तो बहुत गया था, लेकिन परदे पर कभी नहीं देखा गया। इस फिल्म में जबरदस्त खून खराबा बहुतेरे लोगों को अखर रहा है, लेकिन ये अस्सी-नब्बे के दशक की फिल्मों से कम है। फिल्म का संगीत लगभग हर दृश्य में साथ चलता है। गीत मोरा.. में अंग्रेजी शब्दों पर बिहारी जामा लुभाता है। छी छा लेदर, काला रे जैसे गीत किसी दूसरी दुनिया में ले जाते हैं। ब्लैक फ्राईडे के बाद अनुराग का यह सबसे उत्तम काम है। जरूर देंखे।    

 
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