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फिल्म रिव्यू : तेज
First Published:27-04-12 08:25 PM
Last Updated:28-04-12 03:02 PM
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आजकल तेज का जमाना है। हर चीज तेज होनी चाहिए। पिज्जा डिलीवरी से लेकर खबरिया चैनल तक सबसे तेज होने का दावा करते हैं। इसी तेजी के बीच कॉमेडी फिल्में बनाने वाले प्रियदर्शन ने बड़ी तेजी से यू-टर्न लेते हुए फिल्म तेज बनाई है। फिल्म की कहानी लंदन की एक ऐसी तेज रफ्तार ट्रेन के इर्द-गिर्द बुनी गयी है, जिसकी स्पीड अगर 60 किमी से जरा भी कम हुई तो उसमें धमाका हो जाएगा और ट्रेन में बैठे पांच सौ से ज्यादा लोग मारे जाएंगे।

ट्रेन में बम लगाया है आदिल (जायेद खान) ने और इस पूरी योजना को अंजाम दे रहा है आकाश (अजय देवगन) और उसकी साथी मेघा (समीरा रेड्डी), जिन्हें एवज में चाहिए करोड़ों रुपये। संकट की ऐसी स्थिति से निपटने के लिए रिटायर्ड होने जा रहे लंदन के पुलिस अफसर अजरुन खन्ना (अनिल कपूर) को बुलाया जाता है। और उधर, ट्रेन ट्रैफिक कंट्रोल रूम में तेज रफ्तार ट्रेन पर नजर रखने की जिम्मेदारी सूरी (बोमन ईरानी) पर है, जिसकी बेटी भी उसी ट्रेन पर सवार है।

सूरी के सामने ट्रेन को रोकने के सारे विकल्प बंद हैं और उधर, अजरुन भी सुराग दर सुराग के सहारे संदिग्धों पर पहुंचने में लगा है। उसके हाथ मेघा आ भी जाती है, लेकिन वो किसी काम की नहीं रहती। आदिल के भी वह बेहद करीब पहुंच जाता है, लेकिन सब व्यर्थ जाता है। उधर ट्रेन पर सवार एक अन्य पुलिस अफसर (मोहनलाल) भी चाह कर कुछ नहीं कर पाता।

कोई तो वजह होगी कि प्रियदर्शन कॉमेडी से एक्शन/थ्रिलर जॉनर की तरफ मुड़े हैं। खैर, वजह कोई भी हो, लेकिन उनकी इस फिल्म से ढेर सारी हॉलीवुड फिल्मों की बू आती है। कहना गलत न होगा, लेकिन यह फिल्म हॉलीवुड फिल्म स्पीड (1994), दि टेकिंग ऑफ पैल्हाम 123 (1974 एवं 2009) अन्स्टॉपेबल (2010), दि बुलेट ट्रेन (1975, जापानी फिल्म) का एक ऐसा कॉकटेल है, जिसे चखा तो जा सकता है, लेकिन उसका मजा नहीं लिया जा सकता।

खुद बॉलीवुड में इससे मिलती-जुलती एक फिल्म दि बìनग ट्रेन (1980) भी बनी है। फिल्म का नाम तेज क्यों है, ये फिल्म देखने के 10-15 मिनट में ही समझ आ जाता है। एक तेज रफ्तार ट्रेन के साथ तेजी से घूमते घटनाक्रम के बीच तेजी से शूट किए गए चेज सीन्स और इस बीच तेजी से फिल्माया गया मल्लिका सहरावत का आइटम नंबर इस फिल्म के टाइटल को सार्थक तो करता है, लेकिन निर्माता रतन जैन का मल्लिका के प्रति दोस्ताना रवैया भी जग जाहिर कर देता है, क्योंकि मल्लिका का आइटम नंबर लैला पूरी तरह से फ्लॉप रहा।

फिल्म एक धमाके के अलावा ढेर सारे रुपयों के लेन-देन के साथ-साथ एक भावनात्मक पहलू से भी जुड़ी है, जिसे इंटरवल के बाद थोड़ा सम्मान मिला है। क्लाईमैक्स में भी यह स्पिरिट जारी रहती है। लेकिन फास्ट स्टंट और रफ्तार के बीच फिल्म का इमोशनल पहलू चकनाचूर हो जाता है। कई और कमियां भी हैं। लेकिन हिन्दी फिल्में जब विदेशों में शूट होती हैं या फिर विदेशी फिल्मों की तर्ज पर बनी होती हैं तो ऐसी चूकों को नजरंदाज कर देना चाहिए। फिल्म में कई बातें ऐसी हैं, जिनके बारे में पहले से ही पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। फिर भी तेज रफ्तार होने की वजह से फिल्म बांधे रखती है।

अच्छी सिनेमैटोग्राफी, तेज संगीत और तेजी से बदलते घटनाक्रम के साथ फिल्म बोर नहीं
होने देती। जो लोग हॉलीवुड फिल्मों को ज्यादा चारा नहीं डालते, वह इस देसी डोज को आसानी से हजम कर सकते हैं। फिल्म में कुछेक सीन्स वाकई अच्छे हैं। खासतौर से जायेद खान और अनिल कपूर के बीच बचने-पकड़ने की भागदौड़। समीरा रेड्डी का बाइक पर पुलिस वालों को छकाना। कंट्रोल रूम में बोमन का नियंत्रण और कई जगहों पर अजय देवगन की बेबसी।

कंगना को ज्यादा स्कोप दिया ही नहीं गया। अनिल कपूर सो सो लगे हैं। समीरा रेड्डी का काम अच्छा है। अजय देवगन सिर्फ डॉयलाग ही बोलते रह गये। उन पर पूरी फिल्म का दारोमदार था। उन्हें कुछ प्रभावशाली काम करना चाहिए था।

कलाकार: अजय देवगन, अनिल कपूर, जायेद खान, समीरा रेड्डी, बोमन ईरानी, कंगना राणावत, मोहनलाल
निर्देशक: प्रियदर्शन
निर्माता/बैनर: रतन जैन/यूनाईटेड सेवन्र
संगीत: साजिद-वाजिद

पब्लिक कमेंट
वन टाइम मूवी है, लेकिन जो सोच कर आए थे, उस हिसाब से मूवी ने निराश किया। फिल्म का फस्र्ट हाफ अच्छा है।
गीता, हाउस वाइफ

फिल्म में न तो कॉमेडी है और न ही सिंघम जैसा अजय का रोल है, इसलिए मुङो तो बिल्कुल भी मजा नहीं आया।
शौर्या, छात्र

मल्लिका का आइटम सॉन्ग लैला..मैं तो लैला मस्त लगा। बाकी फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसकी तारीफ की जाए।
राहुल शर्मा, वर्किग

 
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