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मुल्क टूटने का गम ताउम्र रहा मेहदी हसन को
जालंधर, एजेंसी
First Published:14-06-12 01:50 PM
पंजाब के जालंधर से गहरा नाता रखने वाले, गजल गायकी के बादशाह मेहदी हसन के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर करते हुए सूफी गायक हंसराज हंस ने कहा कि मुल्क के टूटने का गम इस महान गायक को ताउम्र सालता रहा और जब भी वह यहां आए, उन्होंने बंटवारे से उपजे हालात के बारे में बातचीत की।
सूफी गायन के माहिर हंसराज हंस ने हसन के बारे में बताया कि मुल्क के टूटने से वह सबसे अधिक गमजदा थे। उनकी गायकी में, उनकी गजल में, उनके चेहरे पर और उनकी बातचीत में यह गम साफ झलकता था।
हंस ने बताया कि अंतिम बार वह लगभग 13-14 साल पहले जालंधर आए थे। जिमखाना क्लब में उन्होंने प्रस्तुति दी थी जहां मैं मंच संभाल रहा था। गायन के लंबे दौर के बाद वह होटल गए जहां वह सोये नहीं और पूरी रात मुल्क के टूटने के बारे में बातचीत करते रहे।
हंस ने बताया कि उन्होंने मुझसे कहा कि सबकुछ सामान्य था और अचानक एक दिन पता चला कि हमारा मुल्क अब हमारा नहीं है। हमें यहां से जाना पड़ा। वहां ऐसा लगा जैसे अनजाने मुल्क में, अजनबियों के बीच आ गया हूं। यह गम हमेशा मेरे साथ रहेगा।
हंसराज हंस ने मेहदी के जालंधर प्रवास की तस्वीरें भी दिखाईं। उनके पास पाकिस्तान यात्रा के दौरान मेहदी से मुलाकात की तस्वीरें भी हैं।
उन्होंने बताया कि जब वह पाकिस्तान जाते थे तब भी यही बात होती थी। उनके दिल में मुल्क के टूटने और अपनों से बिछड़ने का गम हमेशा रहा। ताउम्र वह इससे उबर नहीं पाये।
हंसराज हंस ने कहा कि मेहदी हसन साहब अच्छे खाने के शौकीन थे। भारत आने पर उन्होंने हमेशा राजस्थानी लजीज खाना ही पसंद किया। वह बार-बार भारत आना चाहते थे।
जब मेरी पाकिस्तान में उसने अंतिम मुलाकात हुई थी तब भी उन्होंने भारत आने की इच्छा जाहिर की थी। पर समय ने साथ नहीं दिया। जब वह बीमार थे तब भी भारत के प्रति उनके दिल की मोहब्बत कई बार जाहिर हुई और वह यहां आने के लिए हुलस उठते थे।
गजलों की दुनिया के इस शहंशाह के बारे में उन्होंने बताया, बंटवारे के बाद वह पाकिस्तान चले गए। संगीत से गुजारा मुमकिन नहीं था। बाद में वह साइकिल रिपेयर का काम करने लगे। इसके बाद मोटर मैकेनिक बन गए। इन सब व्यस्तताओं के बावजूद संगीत का रियाज चलता रहा। एक बार उन्हें पाकिस्तान रेडियो पर गाने का मौका मिला उसके बाद फिर सब कुछ आसान होता चला गया।
शास्त्रीय संगीत में रूचि रखने वाले जालंधर निवासी एक बुजुर्ग बी एस नारंग ने बताया कि अंतिम बार जब वह जालंधर आए थे तो गाते गाते उनके सीने में दर्द उठा। वह रुक गए। जांच हुई और जब आराम लगा तो लोगों ने हालचाल पूछा। हसन ने कहा, जाम टकराना छोड़ दिया इसलिए सीने में दर्द उठा है।
सूफी गायन के माहिर हंसराज हंस ने हसन के बारे में बताया कि मुल्क के टूटने से वह सबसे अधिक गमजदा थे। उनकी गायकी में, उनकी गजल में, उनके चेहरे पर और उनकी बातचीत में यह गम साफ झलकता था।
हंस ने बताया कि अंतिम बार वह लगभग 13-14 साल पहले जालंधर आए थे। जिमखाना क्लब में उन्होंने प्रस्तुति दी थी जहां मैं मंच संभाल रहा था। गायन के लंबे दौर के बाद वह होटल गए जहां वह सोये नहीं और पूरी रात मुल्क के टूटने के बारे में बातचीत करते रहे।
हंस ने बताया कि उन्होंने मुझसे कहा कि सबकुछ सामान्य था और अचानक एक दिन पता चला कि हमारा मुल्क अब हमारा नहीं है। हमें यहां से जाना पड़ा। वहां ऐसा लगा जैसे अनजाने मुल्क में, अजनबियों के बीच आ गया हूं। यह गम हमेशा मेरे साथ रहेगा।
हंसराज हंस ने मेहदी के जालंधर प्रवास की तस्वीरें भी दिखाईं। उनके पास पाकिस्तान यात्रा के दौरान मेहदी से मुलाकात की तस्वीरें भी हैं।
उन्होंने बताया कि जब वह पाकिस्तान जाते थे तब भी यही बात होती थी। उनके दिल में मुल्क के टूटने और अपनों से बिछड़ने का गम हमेशा रहा। ताउम्र वह इससे उबर नहीं पाये।
हंसराज हंस ने कहा कि मेहदी हसन साहब अच्छे खाने के शौकीन थे। भारत आने पर उन्होंने हमेशा राजस्थानी लजीज खाना ही पसंद किया। वह बार-बार भारत आना चाहते थे।
गजलों की दुनिया के इस शहंशाह के बारे में उन्होंने बताया, बंटवारे के बाद वह पाकिस्तान चले गए। संगीत से गुजारा मुमकिन नहीं था। बाद में वह साइकिल रिपेयर का काम करने लगे। इसके बाद मोटर मैकेनिक बन गए। इन सब व्यस्तताओं के बावजूद संगीत का रियाज चलता रहा। एक बार उन्हें पाकिस्तान रेडियो पर गाने का मौका मिला उसके बाद फिर सब कुछ आसान होता चला गया।
शास्त्रीय संगीत में रूचि रखने वाले जालंधर निवासी एक बुजुर्ग बी एस नारंग ने बताया कि अंतिम बार जब वह जालंधर आए थे तो गाते गाते उनके सीने में दर्द उठा। वह रुक गए। जांच हुई और जब आराम लगा तो लोगों ने हालचाल पूछा। हसन ने कहा, जाम टकराना छोड़ दिया इसलिए सीने में दर्द उठा है।
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टिप्पणियाँ
टिप्पणियॉ पढ़े(1)
जितनी बेताबी उन्हें सुनने की रही, मिलने की कभी कम नहीं अब संभव नहीं
By Rajesh Pandey (14th-June-2012 07:26:PM)
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