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गुरू के सामने कभी बैठते नहीं थे महेंद्र कपूर
नई दिल्ली, एजेंसी First Published:09-01-13 04:07 PM
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भारत की जीवंत आवाज कहलाने वाले महेंद्र कपूर अपने गुरूओं को बहुत सम्मान देते थे और कभी अपने गुरू के सामने बैठते नहीं थे। अगर कभी बैठना पड़ा तो वह जमीन पर बैठते थे।
   
सुगम संगीत की कलाकार देवयानी झा ने बताया कि पंजाब के अमृतसर में जन्मे महेंद्र कपूर ने मुंबई आकर शास्त्रीय गायकों पंडित हुसनलाल, पंडित जगन्नाथ बुआ, उस्ताद नियाज अहमद खान, उस्ताद अब्दुल रहमान खान और पंडित तुलसीदास शर्मा से शास्त्रीय संगीत सीखा था। पंडित हुसनलाल के पसंदीदा शिष्यों में से एक महेंद्र कपूर की एक खासियत थी, वह अपने गुरू के आगे कभी बैठते नहीं थे और अगर कभी बैठना पड़ा तो वह जमीन पर बैठते थे। वह कहते थे गुरू का दर्जा बहुत उपर होता है। उसके समक्ष बैठने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
   
उन्होंने बताया कि शुरू में महेंद्र कपूर मोहम्मद रफी से प्रभावित थे और उनकी शैली के गाने उन्हें अच्छे लगते थे। बाद में उन्होंने अपनी शैली विकसित की और मेट्रो मरफी की अखिल भारतीय गायन स्पर्धा जीत कर पाश्र्वगायन के क्षेत्र में प्रवेश किया। पाश्र्वगायक के रूप में उनकी पहली फिल्म 1958 में वी शांताराम की नवरंग थी जिसमें उन्होंने आधा है चंद्रमा गीत गया। इसके लिए संगीत सी रामचंद्र ने दिया था। यह गीत आज भी संगीत प्रेमियों का पसंदीदा गीत है।

महेंद्र कपूर बी आर चोपड़ा के पसंदीदा गायक थे। चोपड़ा की फिल्में 'धूल का फूल', 'गुमराह', 'वक्त', 'हमराज', 'धुंध' के गीत आज भी लोकप्रिय हैं और उन्हें संगीत प्रेमी महेंद्र कपूर की खनकती आवाज की वजह से खास तौर पर याद करते हैं। जब बी आर चोपड़ा ने 1988 में छोटे पर्दे पर महाभारत धारावाहिक पेश किया तो उसके शीर्षक गीत के लिए उनकी पहली पसंद महेंद्र कपूर ही थे।
   
इस धारावाहिक में चोपड़ा के पुत्र रवि चोपड़ा के सहायक रहे राजन शिवहरे ने बताया जब बी आर चोपड़ा ने महेंद्र कपूर को बताया कि वह 'महाभारत' पर सीरियल बना रहे हैं और उन्हें (महेंद्र कपूर को) उसमें आवाज देनी है तो महेंद्र कपूर ने चोपड़ा से कोई सवाल नहीं किया और सीधे हामी भर दी। यहां तक कि पारिश्रमिक के बारे में भी महेंद्र कपूर ने चोपड़ा से कुछ नहीं पूछा।
   
वर्ष 1988 से 1990 तक इस धारावाहिक की 94 कड़ियां प्रसारित हुईं और 45 मिनट की प्रत्येक कड़ी की शुरूआत महेंद्र कपूर की खनकती आवाज में महाभारत के उदघोष से होती थी। आज भी शीर्षक गीत के साथ उनके स्वर में निकले गीता के श्लोक 'यदा यदा ही धर्मस्य' लोगों को याद हैं।  
  
हिन्दी फिल्मों के अलावा गुजराती, पंजाबी और मराठी गीतों को भी महेंद्र कपूर ने स्वर दिया था। नौ जनवरी 1934 को जन्मे महेंद्र कपूर ने 27 सितंबर 2008 को अंतिम सांस ली।

 
 
 
 
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