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हिन्दी सिनेमा में फिर लौटी छोटे शहरों की कहानी
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:29-05-12 10:43 AM
महानगर की कहानियों से दूर कई फिल्म निर्माता एक बार फिर भारत के छोटे शहरों की सच्चाई और कहानियों को हिन्दी सिनेमा के माध्यम से दर्शकों के सामने ला रहे हैं।
महानगर की पृष्ठभूमि पर बनी कई फिल्मों के हिट रहने के बाद हबीब फैसल, अनुराग कश्यप, और दिबाकर बनर्जी जैसे निर्देशक प्रांतीय वास्तविकता को दिखाने के लिए दिल्ली और मुंबई से बाहर निकले और 'इशकजादे', 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' और 'शंघाई' जैसी फिल्में बनायी।
मुंबई के काले पक्ष को अपनी अंतिम फिल्म 'दैट गर्ल इन येलो बूट्स' में दिखाने वाले कश्यप ने निर्णय लिया कि वह अपनी नई फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' छोटे शहर धनबाद की कहानी पर बनाएंगे।
अनुराग ने बताया कि वह शहर काफी दिलचस्प है। छोटे शहर में लोग एक-दूसरे को जानते हैं ऐसे में एक गैंग्स्टर अपने द्वारा प्रताड़ित व्यक्ति से कहता है कि चाचा किसी को मत बताना नहीं तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगा। जैसे वह बात करते हैं। मेरी फिल्म में जगह तलाशना और लोगों की मनस्थिति का पता लगाना रोमांचक था।
दिल्ली की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म 'बैंड बाजा बारात' और 'दो दूनी चार' जैसी फिल्में बनाने वाले फैजल अपनी फिल्म 'इशकजादे' से छोटे शहरों की कहानी सामने लाये।
लखनऊ और उसके आसपास के इलाके में अपनी फिल्म की शूटिंग करने वाले फैजल ने कहा छोटे शहर काफी जीवंत और रंगीन है। वहां के लोगों में हास्य को लेकर दिलचस्प भावना है और उनके जीवन में अलग तरह का लय होता है।
हालांकि फैजल का मानना है कि सिनेमा में इस तरह का बदलाव कुछ समय के लिए है और यह हाल ही में लोकप्रिय हुआ है।
फिल्म 'खोसला का घोसला', 'ओए लकी लकी ओए' और 'लव सेक्स और धोखा' में दिल्ली के कुछ नकारात्मक पहलू दिखाने वाले दिबाकर बनर्जी ने अपनी राजनीति पर आधारित फिल्म 'शंघाई' की कहानी के लिए छोटे शहर भरत नगर को चुना।
बनर्जी ने कहा मेरा छोटा शहर काल्पनिक है। यह कहीं और की कहानी है लेकिन मैंने लातूर और बारामती इलाके में इसकी शूटिंग की है और वहां के लोग वास्तव में अच्छे हैं। हम लोग छोटे शहरों में थे जहां पर फिल्म उद्योग नहीं था ऐसे में हमारी फिल्म में कोई अतिरिक्त कलाकार नहीं है। जो भीड़ आप देखते हैं वह शहर के वास्तविक लोगों की भीड़ है। हम लोगों ने असली पुलिसकर्मी, पार्टी कार्यकर्ता और राजनीतिक कार्यालय को फिल्म की शूटिंग में शामिल किया है।
महानगर की पृष्ठभूमि पर बनी कई फिल्मों के हिट रहने के बाद हबीब फैसल, अनुराग कश्यप, और दिबाकर बनर्जी जैसे निर्देशक प्रांतीय वास्तविकता को दिखाने के लिए दिल्ली और मुंबई से बाहर निकले और 'इशकजादे', 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' और 'शंघाई' जैसी फिल्में बनायी।
मुंबई के काले पक्ष को अपनी अंतिम फिल्म 'दैट गर्ल इन येलो बूट्स' में दिखाने वाले कश्यप ने निर्णय लिया कि वह अपनी नई फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' छोटे शहर धनबाद की कहानी पर बनाएंगे।
अनुराग ने बताया कि वह शहर काफी दिलचस्प है। छोटे शहर में लोग एक-दूसरे को जानते हैं ऐसे में एक गैंग्स्टर अपने द्वारा प्रताड़ित व्यक्ति से कहता है कि चाचा किसी को मत बताना नहीं तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगा। जैसे वह बात करते हैं। मेरी फिल्म में जगह तलाशना और लोगों की मनस्थिति का पता लगाना रोमांचक था।
दिल्ली की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म 'बैंड बाजा बारात' और 'दो दूनी चार' जैसी फिल्में बनाने वाले फैजल अपनी फिल्म 'इशकजादे' से छोटे शहरों की कहानी सामने लाये।
हालांकि फैजल का मानना है कि सिनेमा में इस तरह का बदलाव कुछ समय के लिए है और यह हाल ही में लोकप्रिय हुआ है।
फिल्म 'खोसला का घोसला', 'ओए लकी लकी ओए' और 'लव सेक्स और धोखा' में दिल्ली के कुछ नकारात्मक पहलू दिखाने वाले दिबाकर बनर्जी ने अपनी राजनीति पर आधारित फिल्म 'शंघाई' की कहानी के लिए छोटे शहर भरत नगर को चुना।
बनर्जी ने कहा मेरा छोटा शहर काल्पनिक है। यह कहीं और की कहानी है लेकिन मैंने लातूर और बारामती इलाके में इसकी शूटिंग की है और वहां के लोग वास्तव में अच्छे हैं। हम लोग छोटे शहरों में थे जहां पर फिल्म उद्योग नहीं था ऐसे में हमारी फिल्म में कोई अतिरिक्त कलाकार नहीं है। जो भीड़ आप देखते हैं वह शहर के वास्तविक लोगों की भीड़ है। हम लोगों ने असली पुलिसकर्मी, पार्टी कार्यकर्ता और राजनीतिक कार्यालय को फिल्म की शूटिंग में शामिल किया है।
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