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फिल्म रिव्यू: फिल्मिस्तान

फिल्म रिव्यू: फिल्मिस्तान

फिल्म का नायक एक दृश्य में हैरानी से पूछता है- क्या मैं पाकिस्तान में हूं? उधर से जवाब आता है- तुम्हें अब पता चला? नायक जवाब देता है- पता कैसे चलेगा! सबकी शक्लें एक-सी है, खाना एक-सा है। इस फिल्म का मूल विषय यही है कि बंट जाने के बावजूद भारत और पाकिस्तान की विरासत एक ही है। दोनों मुल्कों के लोगों को जोड़ने में बॉलीवुड, संगीत और क्रिकेट अहम भूमिका निभाते हैं। बॉलीवुड फिल्में पाकिस्तान में भी उतनी ही लोकप्रिय हैं। पाकिस्तान के फनकार भी भारत में उतने ही लोकप्रिय हैं। और दोनों में क्रिकेट की दीवानगी का तो आलम ही मत पूछिए।

सुखविंदर अरोड़ा उर्फ सन्नी (शारिब हाशमी) एक्टर बनना चाहता है। हिंदी फिल्में उसकी रग-रग में बसती हैं। वह ‘एक्टिंग की बारीकियां’ सीखने के लिए असिस्टेंट डायरेक्टर बन जाता है। कुछ अमेरिकी नागरिकों के साथ डॉक्यूमेंटरी बनाने के लिए वह राजस्थान जाता है। अपनी मांगें मनवाने के लिए अमेरिकी नागरिकों का अपहरण करने आए कुछ पाकिस्तानी आतंकवादी गलतफहमी में  सन्नी का अपहरण कर लेते हैं। वे उसे सीमा के पास बसे पाकिस्तानी गांव में आफताब (इनामुल हक) के घर पर रखते हैं। आफताब बॉलीवुड फिल्मों की पाइरेटेड डीवीडी/सीडी का धंधा करता है। इसके बाद शुरू होते हैं कुछ दिलचस्प घटनाक्रम।

इसमें सरहद पार के आतंकवाद का भी उल्लेख है, साझी संस्कृति और विरासत का भी बयान है, बॉलीवुड की लोकप्रियता की झलक है और मनुष्यता के प्रति विश्वास का बखान है। सबसे बड़ी बात कि यह सब कुछ गड्डमड्ड नहीं है, बल्कि सारी परतें साफ और अलग-अलग नजर आती हैं। यह फिल्म हंसाती है तो आंखों में नमी भी भरती है, कुछ सवाल खड़े करती है तो कई सवालों के जवाब ढूंढ़ने की कोशिश भी करती है, लेकिन कहीं भी बोझिल नहीं होती। फिल्मिस्तान लंबाई के लिहाज से एक छोटी-सी फिल्म है, लेकिन इसका संदेश बड़ा है।

फिल्म के दोनों मुख्य कलाकारों- सन्नी के रूप में शारिब हाशमी और आफताब के रूप में इनामुल हक का अभिनय बेहतरीन है। दोनों ने एक-एक सीन में अपनी छाप छोड़ी है। निर्देशक की कल्पना को उन्होंने पूरी तरह साकार किया है। महमूद भाई के रूप में कुमुद कुमार मिश्र और जव्वाद के रूप में गोपाल दत्त भी असर छोड़ते हैं। हबीब आजमी का रोल बहुत छोटा है, लेकिन हकीम साहब के रूप में वह भावुक कर जाते हैं। बाकी कलाकार भी अच्छे हैं। कुल मिला कर फिल्म की कास्टिंग बहुत अच्छी है।

निर्देशक नितिन कक्कड़ ने अपनी सारी बात महज दो घंटे में बहुत ही असरदार तरीके से कह दी है। बतौर निर्देशक उनकी यह पहली फिल्म है, लेकिन एक संवेदनशील विषय को उन्होंने बहुत रोचक और प्रभावी ढंग से पेश किया है। गीत-संगीत भी फिल्म के विषय और मूड के अनुसार है। सुनने में अच्छा लगता है। इस फिल्म को देख कर जब आप बाहर निकलेंगे तो यकीन मानिए, इसके प्रभाव से बाहर आने में आपको वक्त लगेगा। इस फिल्म को नेशनल फिल्म अवॉर्ड सहित जितने भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं, यह उसके काबिल है। अगर सिनेमा से प्यार करते हैं तो यह फिल्म जरूर देखिए। सही मायनों में यह बॉलीवुड को एक ट्रिब्यूट है।

कलाकार: शारिब हाशमी, इनामुल हक, कुमुद कुमार मिश्र, गोपाल दत्त, हबीब आजमी, सरोज शर्मा, संजय मेहता, रवि भूषण, वसीम खान, तुषार झा, मनोज बख्शी, साग्निक चक्रबर्ती, कविता थपलियाल, पुनीत निझावन, नीला गोखले
स्क्रीनप्ले-लेखक-निर्देशक: नितिन कक्कड़
निर्माता: श्याम श्रॉफ, बालकृष्ण श्रॉफ, सुभाष चौधरी, शैला तन्ना, सिद्धार्थ रॉय कपूर
बैनर: सेटेलाइट पिक्चर्स प्रा. लि., श्रृंगार फिल्म्स प्रा. लि. और यूटीवी मोशन पिक्चर्स
संगीतकार: अरिजीत दत्ता
गीतकार: रविंदर रंधावा

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