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Film Review: और खूबसूरत हो सकती थी 'बेगम जान'

Film Review: और खूबसूरत हो सकती थी 'बेगम जान'

1/4Film Review: और खूबसूरत हो सकती थी 'बेगम जान'

एक कहानी सुनी थी। एक बच्चे के लिए दो माएं झगड़ रही थीं। दोनों इंसाफ के लिए न्यायप्रिय राजा के पास गईं। राजा ने फैसला दिया कि बच्चे के दो टुकड़े कर आधा-आधा दोनों को दे दिया जाए। असली मां इस फैसले से दहल गई। उसने कहा-बच्चे को काटा न जाए, दूसरी औरत को दे दिया जाए। बच्चा कम-से-कम जिंदा तो रहेगा। राजा ने बच्चा असली मां को सौंप दिया। 1930 और 40 के दशक में कुछ लोग मां के बंटवारे के लिए लड़ पड़े। हालांकि यह लड़ाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन इस दौर में यह चरम पर पहुंच गई। इस बार राजा बड़ा धूर्त और क्रूर था। उसने इंसाफ के नाम पर मां का बंटवारा कर दिया और बच्चे भी मान गए।
  
भारत और पाकिस्तान का बंटवारा सिर्फ सरहदों का बंटवारा नहीं था, बल्कि लाखों जिंदगियों का बंटवारा था। भारत और पाकिस्तान की सरहदों को तय करने के लिए सिरिल रेडक्लिफ की खींची लाइन ने लाखों जिंदगियों को तकसीम कर दिया। किसी का जिस्म सरहद के इस पार था और रूह उस पार। किसी का घर इधर छूट गया, किसी के खेत उधर छूट गए। किसी का कारोबार उधर छूट गया, किसी का परिवार इधर छूट गया। इतिहास में मानव निर्मित ऐसी त्रासदी कोई और नहीं है। महेश भट्ट निर्मित और श्रीजित मुखर्जी निर्देशित ‘बेगम जान’ इसी दौर की कहानी है। इसमें बेगम जान का किरदार आम कोठों की मालकिनों जैसा ही है, बस फर्क है कि ये कोठा मालकिन अपने हक के लिए लड़ने का फैसला लेती है। 

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  • Web Title:vidya balan begum jaan review