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FILM REVIEW: फिल्म देखने से पहले पढ़ें 'कहानी 2' का रिव्यू

FILM REVIEW: फिल्म देखने से पहले पढ़ें 'कहानी 2' का रिव्यू

कहानी 2: दुर्गा रानी सिंह

सितारे: विद्या बालन, अर्जुन रामपाल, नैशा खन्ना, जुगल हंसराज, तोता रॉयचौधरी, खरज मुखर्जी, कौशिक सेन, मानिनि चढ्ढा 
निर्देशक: सुजॉय घोष
निर्माता: सुजॉय घोष, जयंतीलाल गड़ा
संगीत: क्लिंटन सीरिजो 
गीत: अमिताभ भट्टाचार्य
कहानी-पटकथा: सुजॉय घोष, सुरेश नायर, रितेश शाह
संवाद: रितेश शाह 
रेटिंग: 2.5 स्टार 

किसी भी सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म की जान होती है उसका रहस्य। ऐसी कहानी और पटकथा भी जिसके बारे में न तो कोई कयास लगाया जा सके न ही किसी तरह का पूर्वानुमान। इस संबंध में आमिर खान की एक फिल्म 'तलाश' (2012) का जिक्र याद आता है। ये फिल्म देखने के बाद बहुत से लोगों ने फेसबुक पर पहले शो के बाद ही ये राज जाहिर कर दिया था कि फिल्म में करीना कपूर एक आत्मा है, जो एक के बाद एक कत्ल करती है। ऐसा करने वालों को बहुतेरों ने ब्लॉक कर दिया और कईयों ने मुंह तक तोड़ देने की धमकी तक दे डाली थी। आमिर के फैन्स उनकी ये फिल्म बिना सस्पेंस खोले देखना चाहते थे। 

तो फिर आज 'कहानी 2' की स्टोरी लाइन क्यों बयां की जाए? इसमें भी तो सस्पेंस है। राज की कई परते हैं। अगर आप पहले ही इसकी स्टोरी जान लेंगे तो फिल्म देखने में क्या मजा आएगा, इसलिए रहस्यों से बहुत ज्यादा पर्दा न उठाते हुए इस फिल्म की स्टोरी की कुछ खास बातों पर ही बात करते हैं। 

साल 2012 में आई विद्या बालन की सुजॉय घोष निर्देशित 'कहानी' को न केवल शानदार व्यावसायिक सफलता मिली थी, बल्कि दर्शकों को विद्या के साथ-साथ नवाजुद्दीन सिद्दिकी और बॉब बिस्वास (शाश्वत चटर्जी) का किरदार भी बहुत पसंद आया था। बाकी फिल्म का सस्पेंस और प्रेजेंटेशन तो शानदार था ही। तो क्या इसका सीक्वल भी उतना ही शानदार और रोमांचक है? 

कोलकाता से कुछ दूर चंदन नगर पुलिस स्टेशन में नए-नए तैनात हुए सब इंस्पेक्टर इंद्रजीत सिंह (अर्जुन रामपाल) को एक महिला के एक्सीडेंट की खबर मिलती है। महिला का नाम विद्या सिन्हा (विद्या बालन) है, जो इंद्रजीत के गले नहीं उतर रहा। वो तो इसे दुर्गा रानी सिंह के नाम से जानता है। विद्या की एक 14 साल की बेटी है मिनी (नैशा खन्ना) जो एक्सीडेंट के बाद से गायब है। इंद्रजीत को विद्या के घर की तलाशी के दौरान उसकी एक डायरी मिलती है, जिससे उससे पता चलता है कि वह आठ साल पहले कलिमपॉन्ग (पश्चिम बंगाल में) के एक स्कूल में काम करती थी। यहां उसकी मुलाकात मिनी से हुई थी, जो इलाके के प्रतिष्ठि एवं प्रभावशाली दीवान परिवार से ताल्लुक रखती थी। डायरी में किसी अरुण (तोता रॉयचौधरी) नामक व्यक्ति का भी जिक्र बार-बार आता है, जिससे विद्या की नजदीकियां बढ़ रही थीं। 

इंद्रजीत की परेशानी इस बात को लेकर है कि मिनी, विद्या की बेटी बन कर कैसी रह रही है और उसने दुर्गा से अपना नाम विद्या क्यों रखा। विद्या अब भी कोमा में है और इसी दौरान इंद्रजीत को अपने वरिष्ठ अफसर हलधर (खरज मुखर्जी) से पता चलता है कि एक बुर्जुग महिला की हत्या और एक बच्ची के किडनैप के सिलसिले में कलिमपॉन्ग से दुर्गा रानी सिंह नामक एक महिला आठ सालों से वांटेड है। वांटेड महिला की फोटो देख कर इंद्रजीत चौक जाता है। ये तो विद्या है। ये कातिल कैसे हो सकती है? उधर, कोमा में पड़ी विद्या को जल्द से जल्द होश में आना है, क्योंकि मिनी को किसी ने एक्सीडेंट के बाद किडनैप कर लिया है और उसके बाद से एक अनजान साया लगातार विद्या पर नजर रखे हुए है। कौन है ये साया? कहीं इसका ताल्लुक उसके अतीत से तो नहीं है? या उसका संबंध दीवान परिवार से है? 

इतना तो विश्वास है कि इतनी भर कहानी से आप 'कहानी 2' के मेन प्लाट का पूर्वानुमान तो नहीं लगा सकेंगे। इससे ये भी पता नहीं चलता कि दुर्गा, विद्या क्यों और कैसे बनी। उसने मिनी को किडनैप क्यों किया और इंद्रजीत से उसका क्या रिश्ता था। 
पहली बात तो ये कि 'कहानी' से 'कहानी 2' का कोई सीधा ताल्लुक नहीं है। ये एक बिल्कुल अलग फिल्म है। दूसरी बात ये कि इंटरवल तक की फिल्म काफी प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत की गई है। फिल्म शुरू होने के मात्र 5-7 मिनट बाद किरदार अपना काम करना शुरू कर देते हैं। पात्रों को लेकर उत्सुकता बढ़ने लगती है और असरकारक पाश्र्व संगीत दिल की धड़कनें भी बढ़ा देता है। दो घंटे नौ मिनट की इस फिल्म का पहला सवा घंटा उधेड़बुन में कब गुजर गया पता ही नहीं चला। लेकिन इंटरवल के बाद की स्टोरी धीरे-धीरे फिल्मी लगने लगती है। कई सीन्स और घटनाक्रम ऐसे दिखते हैं, जिनका पूर्वानुमान आसानी से लगाया जा सकता है। इंद्रजीत का विद्या को उसी के घर से आसानी से धर दबोचना और फिर विद्या का इंद्रजीत को गन प्वाइंट पर लेकर आसानी से भाग जाना एक ऐसा ही सीन है, जिसके पीछे की मंशा का पूर्वानुमान लगाना आसान है। मोटे तौर पर इंटरवल के बाद की स्टोरी में ‘कातिल कौन’ और क्यों एवं कैसे जैसी बातें कमजोर पड़ती दिखती हैं। विद्या बालन का किरदार फिल्मी स्टाइल में दांव खेलता दिखता है, इसलिए यह फिल्म ‘कहानी’ के मुकाबले थोड़ी कमजोर दिखती है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि सुजॉय घोष ने एक बढ़िया प्रेजेंटेशन के साथ फिल्म को बुना और काफी हद तक उसमें दर्शक से जुड़े रहने की गुंजाइश भी पैदा की। लेकिन दुर्गा रानी सिंह का किरदार अपने नाम की तरह जोरदार नहीं लगता। यह एक डरी-सहमी महिला की कहानी है, जो वक्त पड़ने पर अपने जैसी मुसीबत झेल रही एक बच्ची की मदद के लिए आगे आती है। वो हिम्मत दिखाती है और विजयी होती है।

बाल शोषण जैसे गंभीर मुद्दे को फिल्म में प्रभावशाली ढंग से उठाया गया है। यह एक व्यापक संदश की तरह असर करता दिखता भी है। लेकिन फिल्म की विषय-वस्तु और उसकी आत्मा के साथ ये संदेश मेल खाता नहीं दिखता, बल्कि फिल्म की ताकत को कमजोर करता है। ये फिल्म का एक हिस्सा हो सकता था, आधार नहीं। 

अभिनय भी पहले के मुकाबले काफी साधारण है। विद्या बालन को आप पहले भी ऐसा अभिनय करते देख चुके हैं। इस बार चौंकाने वाले तथ्यों का अभाव है। अर्जुन रामपाल का किरदार ठीक है, लेकिन उन्होंने इस किरदार को उठाने के लिए नवाजुद्दीन की तरह कोई खास प्रयास नहीं किया है, इसलिए यह औसत से बस थोड़ी बेहतर सस्पेंस फिल्म बन कर रह गई है। सुजॉय घोष ने इस कहानी पर चार साल मेहनत की है। पात्रों के चयन में भी कई बार फेरबदल किए गए। लेकिन लंबे इंतजार के बाद आई इस कहानी में 'वाऊ' फैक्टर की कमी है, जिसके बल पर कभी विद्या बालन को लेडी खान तक कहा जाने लगा था। 

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