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Movie Review: फिल्म देखने से पहले पढ़ें 'इरादा' का रिव्यू

नई दिल्ली, ज्योति द्विवेदी First Published:17-02-2017 03:11:53 PMLast Updated:17-02-2017 06:01:07 PM
Movie Review: फिल्म देखने से पहले पढ़ें 'इरादा' का रिव्यू

भटिंडा (पंजाब) में एक कैंसर ट्रेन चलती है, जिसमें बैठ कर कैंसर के मरीज सस्ते इलाज के लिए बीकानेर जाते हैं। इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कैंसर का प्रकोप है, जिसकी वजह है कीटनाशकों का भारी मात्रा में इस्तेमाल और फैक्ट्रियों के कचरे के जानबूझ कर किए गए गलत निस्तारण से पीने के पानी का प्रदूषित होना। अपर्णा सिंह निर्देशित फिल्म 'इरादा' दूसरी वजह पर फोकस करती है। पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़े इस तरह के मुद्दे को थ्रिलर के रूप में पेश करना चौंकाता है और बांधे भी रखता है। पर 'ईको थ्रिलर' और 'ईको टेररिज्म' जैसे जुमलों से अपनी मार्केटिंग कर रही इस फिल्म की अपनी कमजोरियां भी हैं, जिनकी वजह से यह समीक्षकों के हाथों से सितारे छीन कर ले जाते-जाते रह जाती है। ऐसा लगता है कि इसे बनाने से पहले रिसर्च तो काफी किया गया होगा, पर फिल्म के स्क्रीनप्ले और निर्देशन में कमी रह गई।

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है इसका विषय। हॉलीवुड में इस तरह के विषय पर जूलिया रॉबट्र्स की 'एरिन ब्रॉकविक' सहित कई फिल्में बन चुकी हैं। इस तरह के विषयों को और भी हिन्दी फिल्मों में भी उठाया जाना चाहिए, क्योंकि जिस तेजी से प्रदूषण लोगों की जान ले रहा है, उसे देखते हुए फिल्में इसे लेकर जागरूकता फैलाने के मामले में अहम भूमिका निभा सकती हैं। कैंसर के मरीजों से भरी ट्रेन में इंश्योरेंस एजेंटों के लच्छेदार बातें करने जैसे दृश्य डराते हैं और अंदर तक झकझोरते हैं।

नसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी की जादुई केमिस्ट्री 'इश्किया' और 'डेढ़ इश्किया' के बाद इस फिल्म में एक बार फिर देखने को मिलती है। नवाज देवबंदी के 'जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है!' जैसे शेर नसीर की जुबां में एक अलग ही असर जगाते हैं और बहुत कुछ कह जाते हैं जिनके मतलब तलाशना एक अलग रोमांच का एहसास कराता है। बेटी को फाइटर पायलट बनाने के लिए ट्रेनिंग दे रहे रिटायर्ड फौजी और उसकी मौत के बाद एक रहस्यमय लेखक के किरदार को नसीर ने उसी सहजता के साथ निभाया है, जिसकी उनसे उम्मीद थी।

वहीं अरशद ने भी एक मनमौजी इंस्पेक्टर की अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है। इतनी गंभीर फिल्म में हल्के-फुल्के पलों की गुंजाइश कम ही थी, पर अरशद का किरदार इन्हें एकदम सधे हुए अंदाज में लेकर आता है। फिर चाहे उनका क्राइम सीन में एक्वेरियम की मछलियों के साथ खेलना हो या अपने साथी पुलिसवाले के 'समाज में चेंज लाने' के जवाब में 'तुम्हारे पास 500 रुपए का चेंज है?' पूछना।

मुख्य खलनायक के रूप में शरद केलकर और दिव्या दत्ता भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करते नजर आते हैं। पत्रकार बनीं सागरिका घाटगे की फिल्म में एंट्री तो अच्छी है, पर इसके बाद उनकी भूमिका में कोई दम नजर नहीं आता। अपने प्रेमी, जो एक आरटीआई एक्टिविस्ट था, उसकी हत्या का बदला लेने की उनकी आतुरता से आप बहुत कम मौकों पर जुड़ पाते हैं। साक्ष्य जुटाने के लिए उनका ड्रोन कैमरे से वीडियो बनाने वाला सीन अच्छा बन पड़ा है। राजेश शर्मा और रुमाना मोला ने अच्छी एक्टिंग की है। फिल्म का संगीत औसत है। 'चांद रजाई ओढ़े' गीत सुनने में अच्छा लगता है और फिल्म देखने के बाद याद रह जाता है।

रेटिंग- 2.5

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