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ब्ल्यू माउंटेंस: टूटते सपनों की हल्की कहानी

ब्ल्यू माउंटेंस:  टूटते सपनों की हल्की कहानी

रिएलिटी शो स्टार बनने का सपना आज जाने कितने बच्चों की आंखों में पलता है, पर क्या होता है जब यह सपना टूटता है, यही सवाल उठाती है यह फिल्म। पर इस गहरे विषय को यह फिल्म बस छूकर निकल जाती है। गहरे नहीं उतरती।

संगीत पर आधारित फिल्मों की सफलता का दारोमदार काफी हद तक इनके संगीत पर होता है। पर अगर इनका संगीत कमजोर हुआ, तो इन फिल्मों की बाकी कमियां और भी ज्यादा उभर कर सामने आने लगती हैं। पिछले साल रिलीज हुई फिल्म ‘रॉक ऑन 2’ इसका के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था और यह दुर्भाग्य है कि फिल्म ‘ब्ल्यू माउंटेंस’ भी इस कमी का शिकार नजर आती है।

इससे पहले संगीत आधारित फिल्मों में हमें कई बार शास्त्रीय संगीत की बंदिशों का खूबसूरत इस्तेमाल देखने को मिल चुका है, जैसे राग पूरिया धनाश्री की बंदिश पायलिया झनकार (रंगीला), राग अहिर भैरव की बंदिश अलबेला सजन (हम दिल दे चुके सजन), राग गुर्जरी तोड़ी की बंदिश भोर भई (दिल्ली 6) आदि। फिल्म ब्ल्यू माउंटेंस में भी राग यमन की ‘ए री आली’ जैसी पुरानी और जानीमानी बंदिश को गिटार के साथ पेश कर कुछ नया करने की कोशिश की गई है। पर इस प्रयोग से इस बंदिश की खूबसूरती खत्म हो गई है। ‘चितचोर कारे बदरा’ फिल्म का इकलौता गीत है जो लोगों को पसंद आ सकता है।

वैसे संगीत ही नहीं, इस फिल्म के बाकी पहलू भी किसी न किसी रूप में कमजोर रह गए हैं। भारत में ज्यादातर फिल्में युवावर्ग को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, पर इनमें से अधिकांश 18-19 साल से अधिक उम्र वाले युवाओं के लिए होती हैं। 13-19 आयुवर्ग के दर्शकों को ध्यान में रखकर बहुत कम फिल्में बनती हैं। यह फिल्म इस कमी को पूरा कर सकती थी पर यह अपने उद्देश्य से भटक गई है जिसका सबसे बड़ा कारण नजर आता है रिसर्च की कमी। फिल्म उन किशोरों की बात करती है जो रिएलिटी शो स्टार बनने का सपना आंखों में लिए ऑडिशन देने जाते हैं पर किसी न किसी स्तर पर खारिज कर दिए जाते हैं। इसके बाद उनकी जिंदगी में क्या होता है, यही इस फिल्म में दिखाया गया है। पर फिल्म न तो ऐसे किशोरों का दर्द महसूस कराती है और न ही इस दर्द का कोई समाधान बताती है।

फिल्म कई गलत बातों का समर्थन करती भी नजर आती है, जैसे फिल्म के किशोर हीरो सोम शर्मा (यथार्थ रत्नम) की मां (ग्रेसी सिंह) का बार-बार यह कहना कि उन्होंने अपने परिवार के लिए अपने म्यूजिक करियर की कुर्बानी दे दी थी। साथ ही फिल्म कहीं न कहीं ग्रूमिंग और स्टेज प्रेजेंस जैसे गुणों पर जरूरत से ज्यादा फोकस करती है, जो गैर-जरूरी लगता है। ग्रेसी सिंह न तो अच्छी दिखी हैं, न ही उनकी एक्टिंग में कोई दम नजर आया है। रणवीर शौरी का काम ठीकठाक है। आरिफ जकारिया जैसे अच्छे कलाकार की प्रतिभा को इस फिल्म में जाया किया गया है। यथार्थ किसी-किसी दृश्य में प्रभावित करते हैं। पहाड़ी दूधवाले के रोल में राजपाल यादव ने अच्छा काम किया है।

स्टार- 1.5  

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  • Web Title:movie review of blue mountains
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